बच्चे सवाल करते हैं
बच्चों की ज़िंदादिली जीने का हौसला देती है। उनका कौतूहल बताता है कि दुनिया बड़ी खूबसूरत है, बस इसकी सुंदरता को ग़ौर से देखने-समझने और जीने की जरूरत है। बच्चे बेफिक्र होते हैं, मगर वे चिंता भी करते हैं। उन्हें अपने दोस्तों की फ्रिक्र होती है, ख़ुद को मिलने वाले शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से वे भी कमज़ोर पड़ते हैं, आँसुओं से भरी आँखों से सवाल करते हैं। अगर किसी पर वे भरोसा करते हैं, तो उसके साथ वे इस बात को साझा भी करते हैं।
बच्चों की सुरक्षा का सवाल आस-पड़ोस से लेकर, स्कूलों की सरहद के भीतर तक जा पहुंची है। ऐसे समय के लिए बच्चों को तैयार करने की जरूरत है ताकि वे किसी भी ख़तरे वाली स्थिति में अपने मन का हाल हमसे बग़ैर डरे हुए कह सकें।
बच्चों के बीच न होने दें भेदभाव
बच्चों के बीच जेंडर वाला भेदभाव हम अपनी परवरिश, सीमित समझ और परिवेश के दबाव में अक्सर लाद देते हैं। इससे बचने की जरूरत है। छोटी बच्चियों को रोटी बेलना और सेंकना सिखाकर हम कौन सा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं? क्या खाना बनाना और साफ़-सफ़ाई करना सिर्फ बच्चियों का काम है। क्या उनके साथ बचपन से शुरू होने वाला यह भेदभाव उनके आत्मविश्वास को खा जाने वाला नहीं है? ऐसे सवाल हमें ख़ुद से पूछने चाहिए और जीवन के सवालों का सामना आगे बढ़कर करने के लिए उनको तैयार करना चाहिए।
यह हम बड़ो की जिम्मेदारी है कि बच्चों के लिए भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक रूप से सुरक्षित माहौल बनाने में अपने-अपने स्तर पर योगदान करें। ताकि बच्चों को एक अच्छा माहौल मिल सके, जिसमें उनका बचपना सलामत रहे। वे रोज़मर्रा के जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों का आनंद ले सकें। बच्चों को उनके हिस्से की ख़ुशी देने, उनको आत्मविश्वास से परिपूर्ण करने और छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना करने का हौसला देने में हम सहयोग कर सकें, यही इस बाल दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।

