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बाल दिवस: ‘फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते’

20151212_154908हर साल 14 नवंबर को भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह तारीख़ स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन भी है। कहा जाता है कि जवाहर लाल नेहरू को बच्चों द्वारा प्यार से चाचा नेहरू कहकर बुलाया जाता था। बच्चों के साथ उनके इन स्नेह और अपनेपन को रेखांकित करने और याद करने का दिन भी बन गया ‘बाल दिवस’। अपनी एक शायरी में बशीर बद्र साहब कहते हैं, “उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते “

बच्चे सवाल करते हैं

बच्चों की ज़िंदादिली जीने का हौसला देती है। उनका कौतूहल बताता है कि दुनिया बड़ी खूबसूरत है, बस इसकी सुंदरता को ग़ौर से देखने-समझने और जीने की जरूरत है। बच्चे बेफिक्र होते हैं, मगर वे चिंता भी करते हैं। उन्हें अपने दोस्तों की फ्रिक्र होती है, ख़ुद को मिलने वाले शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से वे भी कमज़ोर पड़ते हैं, आँसुओं से भरी आँखों से सवाल करते हैं। अगर किसी पर वे भरोसा करते हैं, तो उसके साथ वे इस बात को साझा भी करते हैं।

Shopping-pictureबाल दिवस के दिन अगर हम बच्चों को विश्वास दिला सकें कि हम उनका भरोसा करते हैं। उनके विचारों का सम्मान करते हैं। उनको बच्चा समझकर उनकी छोटी-मोटी ग़लतियों को नज़र-अंदाज करते हैं। उनकी परेशानियों में उनके साथ हर पल खड़े होंगे तो यह वर्तमान समय में बहुत बड़ी बात होगी।

बच्चों की सुरक्षा का सवाल आस-पड़ोस से लेकर, स्कूलों की सरहद के भीतर तक जा पहुंची है। ऐसे समय के लिए बच्चों को तैयार करने की जरूरत है ताकि वे किसी भी ख़तरे वाली स्थिति में अपने मन का हाल हमसे बग़ैर डरे हुए कह सकें।

बच्चों के बीच न होने दें भेदभाव

बच्चों के बीच जेंडर वाला भेदभाव हम अपनी परवरिश, सीमित समझ और परिवेश के दबाव में अक्सर लाद देते हैं। इससे बचने की जरूरत है। छोटी बच्चियों को रोटी बेलना और सेंकना सिखाकर हम कौन सा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं? क्या खाना बनाना और साफ़-सफ़ाई करना सिर्फ बच्चियों का काम है। क्या उनके साथ बचपन से शुरू होने वाला यह भेदभाव उनके आत्मविश्वास को खा जाने वाला नहीं है? ऐसे सवाल हमें ख़ुद से पूछने चाहिए और जीवन के सवालों का सामना आगे बढ़कर करने के लिए उनको तैयार करना चाहिए।

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यह हम बड़ो की जिम्मेदारी है कि बच्चों के लिए भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक रूप से सुरक्षित माहौल बनाने में अपने-अपने स्तर पर योगदान करें। ताकि बच्चों को एक अच्छा माहौल मिल सके, जिसमें उनका बचपना सलामत रहे। वे रोज़मर्रा के जीवन की छोटी-छोटी ख़ुशियों का आनंद ले सकें। बच्चों को उनके हिस्से की ख़ुशी देने, उनको आत्मविश्वास से परिपूर्ण करने और छोटी-छोटी चुनौतियों का सामना करने का हौसला देने में हम सहयोग कर सकें, यही इस बाल दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।

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