सजग नागरिक बनाने वाली शिक्षा है जरूरी
ग़ैर-मुद्दों को मुद्दा बनाने की कोशिशें कामयाब कैसे होती हैं? यह एक बेहद अहम सवाल है। बतौर नागरिक जब हम खुद सोचते नहीं, अपने अनुभवों पर चिंतन नहीं करते, अपने फैसले खुद नहीं लेते, अपनी हिस्से की परेशानियों को सहने और उनका समाधान करने के लिए आगे नहीं आते, हमारी स्थिति एक परनिर्भर और कभी-कभी तो परजीवी वाली स्थिति में जीने वाले किसी जीव जैसी होती है। यह स्थिति हमें यथास्थिति को कोसने व उसमें ूबदलाव की हसरत के बावजूद एक निष्क्रिय स्थिति में बनाए रखती हैं, जहाँ वास्तव में कोई बदलाव नहीं होता। सिर्फ बदलाव की बातें और चर्चाएं होती है फिर लोग अपनी-अपनी रूटीन की दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं।
लोकतंत्र में संभावनाओं का बना रहना बेहद जरूरी है। ताकि उम्मीद की रौशनी आती रहे। इसी उम्मीद और आकांक्षा के कारण इतनी बड़ी संख्या में जनता अपना वोट देती है। अपने चुनाव को गुप्त रूप से एक सार्वजनिक सहमति की तरफ ले जाती है। इन पंक्तियों को लिखते हुए एक सवाल सामने आ रहा है, “क्या जनमत को प्रचार के जोर से बदला जा सकता है? क्या आक्रामक प्रचार का जनता के निर्णय पर सकारात्मक असर पड़ता है? क्या लोगों के निर्णय तात्कालित परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं? क्या डर का जनता की निर्णय प्रक्रिया पर एक ख़ास तरह का असर पड़ता है, जिसके कारण जनता विवेकपूर्ण फैसले न लेकर सुरक्षित चाल चलने की कोशिश करती है। जिसका फ़ायदा डर का कार्ड खेलने वाले राजनीतिक दल को होता है। यह सारे सवाल राजनीति विज्ञान का सवाल होने के साथ-साथ रोज़मर्रा की जिंदगी के सवाल भी हैं।
देश की एकता को मजूबत बनाती है ‘बंधुत्व की भावना’
पिछले 8-10 सालों से मेरा मानना रहा है कि दुनियाभर में दक्षिणपंथी विचारधारा के उभार का समय है क्योंकि पश्चिमी देशों में इसी तरह की प्रवृत्तियां उभर रही हैं। अमरीका में ट्रंप की जीत ने भी इस बात पर एक मुहर सी लगाई थी कि वहाँ की जनता के फैसले भी इसी दिशा में जाते हुए दिख रहे हैं। राष्ट्रवाद एक विचार के रूप में लोगों को गोलबंद करने और ख़ास दिशा में राजनीतिक फैसले करने के लिए प्रेरित करता है, यह बात सार्वजनिक सत्य है।
लेकिन एक जीवंत लोकतांत्रिक देश के लिए विचारों और सोच की विविधता के साथ-साथ अपने समाज में बंधुत्व की भावना को बनाये रखना जरूरी है। बंधुत्व की भावना के बग़ैर कोई देश मधुमक्खी के उस छत्ते के समान होगा, जिसमें शहद नहीं है। यानि उस देश और समाज की जीवनीशक्ति का नष्ट हो जाना होगा, जिसके कारण ही लोकतंत्र या कोई समाज जीवंत बना रहता है।
कौन है चौकीदार?
ऐसे माहौल में एक सजगता जरूरी है कि हम नारों की पुकार में चल देने वाली भीड़ न बनें। जैसे 16 मार्च को twitter पर दिनभर टॉप ट्रेंड में #MaiBhiChowkidar बना रहा। रात को 11.30 पर भी यह चौथे नंबर पर बना रहा। इस ट्रेंड के बारे में शाम को अपने एक दोस्त से बात हो रही थी कि कैसे एक आभासी दुनिया को वास्तविक जिंदगी के समानांतर लाकर खड़ा कर दिया जाता है, जिसमें जिंदगी के असली सवाल विला या खो से जाते हैं। यह ग़ैर-मुद्दे को मुद्दा बनाने की कोशिश का एक उदाहरण भी है। क्या आपने सोचा कि इस चौकीदार की भूमिका में कोई महिला भी हो सकती है? या चौकीदारी की भूमिका का निर्वाह एक पुरुष ही करेगा। जेंडर का सवाल भी इस ट्रेंड पर सवाल खड़ा करता है कि हमारी सोच कितनी मर्दवादी है। जो ऐसे प्रतीकों से सहज ही बाहर झांक उठती है।
देश को ऐसे लोगों की भी जरूरत है जो अपनी स्वतंत्र राय रखते हों और सत्ता-विपक्ष सरकार व किसी तरह के दबाव को दर-किनार रखते हुए अपनी बात को आज़ादी और दमदारी के साथ कहने का माद्दा रखते हों। हमारा देश क्या किसी की कोई निजी संपत्ति है, जिसे चौकीदार की जरूरत है। इस तरह की उपमाएं देश की परिभाषा को सीमित बनाती हैं, हमें एक व्यापक नज़रिये और गहरी समझ की जरूरत है ताकि हम अपने देश के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान देने की भावना के साथ अपना बेहतर दे सकें। इस देश को बेहतरी की राह पर आगे बढ़ने में एक सजग भारतीय नागरिक की तरह सोच-विचार कर सकें और अपने कर्मों को उस दिशा में ले जाने का सफल प्रयास कर सकें।
