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भारत में शिक्षाः कितना सही है सिंगल टीचर स्कूल का आइडिया?

भारत में अकेले शिक्षक के भरोसे चलने वाले स्कूलों में प्रायमरी स्कूल जाने वाले तरीबन 12 फ़ीसदी छात्र पढ़ते हैं। कुल प्रायमरी स्कूलों में से तकरीब 19 फ़ीसदी स्कूल ऐसे हैं, जो सिंगल टीचर स्कूल यानी एक शिक्षक वाले विद्यालय है। लेकिन इनकी स्थिति की तरफ किसी की नज़र नहीं जाती। आख़िर एक शिक्षक 80-90 बच्चों को कैसे संभाल सकता है? उनके पढ़ाई-खाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कैसे उठा रहा है। इस पोस्ट में पढ़िए आख़िर कितना प्रासंगिक है सिंगल टीचर स्कूल का आइडिया। वह भी ऐसे देश में जो आबादी के लिहाज से दुनिया में नंबर दो है।

दिल्ली

आबादी की दृष्टि से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।

आबादी के हिसाब से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। लेकिन इसी देश में सिंगल टीचर स्कूल जैसा कांसेप्ट भी चल रहा है। यानी एक शिक्षक पहली से पांचवी तक के 70, 100, 150 बच्चों को अकेले पढ़ाएगा। भला एक शिक्षक इतने बच्चों को कैसे पढ़ा सकता है। शिक्षक कितनी भी मेहनत क्यों न कर लें, उनका कोई न कोई अधूरा बचा ही रहेगा।

एक शिक्षक बताते हैं, “छोटे बच्चों को संभालन बहुत मुश्किल है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि पागलखाने में भर्ती होने की नौबत आ जाएगी। सर दर्द की गोली खानी पड़ेगी, ऐसा हालत हो जाती है छोटे बच्चों में बीच में।” गाँव के अंदरूनी इलाक़ों में अकेले पढ़ाने वाले शिक्षकों की बातों में उनका दर्द झलकता है।

‘हमारी सेलरी आधी कर दो, मगर स्टाफ दे दो’

एक शिक्षक कहते हैं, “अधिकारी जो हमारे संरक्षक हैं, अगर उनसे कहो कि हमारे स्कूल में स्टाफ कम है। दो का स्टाफ कर दीजिए तो कहते हैं कि यह तो सरकार के स्तर की समस्या है, हम कुछ नहीं कर सकते। इसके विपरीत ऐसे प्रायमरी स्कूल भी हैं जहां चार का स्टाफ भी उनको कम लगता है।”

सिंगल टीचर स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने कहा, “हमारी सेलरी आधी कर दो। मगर स्कूलों में स्टाफ दे दो। इससे भले ही हमको कम वेतन मिलेगा पर काम का बोझ तो कुछ हल्का होगा। पढ़ाई के साथ-साथ और भी इतने सारे काम हैं कि करते रहो। करते रहो। कोई न कोई काम अधूरा छूट ही जाता है, जिसके लिए अधिकारियों की डांट खाने वाली स्थिति सदैव मौजूद रहती है।”

कुछ दिन पहले ही यूपी के एक टीचर का वीडियो चर्चा में था। जिसमें एक जिलाधिकारी महोदय शिक्षक से बहुत अच्छे सवाल पूछ रही थीं। लोग उनके सवालों की दाद दे रहे थे। जिस व्यवस्था के प्रशासक के बतौर व स्कूल में उपस्थित थीं, उसी व्यवस्था में ऐसे स्कूलों को संचालित करने का रास्ता निकाला जाता है। यह एक सच्चाई है कि ऐसी नीतियों के निर्माण में विदेश से आने वाले फंड का दबाव है कि शिक्षकों के वेतन पर होने वाले खर्च में कटौती की जाए।

शिक्षा के बजट में कटौती

बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता और स्तर के अनुसार ही पैसा खर्च किया जाये। अपने देश में बच्चों को पढ़ाने के लिए बजट नहीं है। कभी एमडीएम के बजट में कटौती की खबर आती है तो कभी प्राथमिक शिक्षा के बजट को सीमित करने का प्रयास होती है। सारी कोशिशें एक ऐेस देश का भविष्य लिख रही हैं, जहां पढ़े-लिखे निरक्षरों की फौज होगी। जो देश की सेना से भी ज्यादा बड़ी होगी। मगर इस बात की परवाह किसे है?

शिक्षक कहते हैं कि नेता जानते हैं कि पढ़े-लिखे लोग उनके पीछे नहीं चलेंगे। उनसे सवाल पूछेंगे। उनके मन की बात नहीं सुनेंगे। अपने मन की बात से निकले सवाल पूछेंगे। जिनका जवाब उनके पास न आज है और न कल होगा। समस्याएं दिनों-दिन गंभीर हो रही हैं और समाधान की कोशिशें भोथरी हो रही है। ऊपरी तौर पर दिखाने की कोशिश की जा रही है, शिक्षा को लेकर सरकार बहुत चिंतित है। पर वास्तविक स्थिति तो कुछ और ही कहानी कहती है।

क्या कहते हैं आँकड़े

29 जनवरी 2014 को द हिंदू में केरल से जुड़ी एक ख़बर प्रकाशित हुई थी कि सिंगल टीचर स्कूल अपना आखिरी अध्याय पढ़ेंगे। यानी इसके बाद इन स्कूलों को प्रायमरी स्कूलों में बदलने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। यानी वहां पर क्लास के हिंसाब से शिक्षक होंगे ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सके। इस ख़बर को प्रकाशित हुए एक साल होने को हैं, मगर बहुत से अन्य राज्यों के संदर्भ में यह मुद्दा ज्यों का त्यों बना हुआ है।

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में बहुत से ऐसे स्कूल हैं जो सिंगल टीचर स्कूल हैं। यूनिसेफ के एक आँकड़े के मुताबिक भारत में कुल प्रायमरी स्कूलों में से तकरीबन 19 फीसदी स्कूल सिंगल टीचर स्कूल हैं। 2014 के डाइस डेटा (District Information System in Education या DISE) के अनुसार प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले कुल बच्चों में से लगभग 12 फ़ीसदी बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ने के लिए जाते हैं।

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