मुझे पूरी उम्मीद है कि यह पोस्ट पढ़ने के बाद अपनी टिप्पणी जरूर लिखेंगे ताकि एक बच्चे को उसके हिस्से का प्रोत्साहन और स्नेह मिले ताकि लिखने का यह सिलसिला उत्साह के साथ जारी रहे। तो फिर पढ़िए आरव की कलम से दिल्ली के चिड़ियाघर विज़िट की डायरी।
दिल्ली के चिड़ियाघर की सैर
हम 12 मार्च 2019 को दिल्ली के जू (zoo) गए थे। ये मेरा बस दुसरा जू है। पहला जू मैंने पुने (पुणे) मे देखा था। उधर बहूत साँप थे। पर मैंने शेर नही देखा, उधर शेर तो था, लेकिन हम लेट हो गए। देखने के लिए शेर नहीं मिला। मैं बहुत खुश था जू जाने के लिएI जब मेरे जू जाने के पिछले दिन के रात को वैभव अंकल और अनामिका दीदी आई थीं, वह भी हमारे साथ जू आ रहे थे। फिर अगली सूबह उन्होंने कैब बूक करवाई। कैब बुक करवाके वो उसमें बैठ कर आए और हम उसमें बैठ गए।
रास्ते मे मूझे नींद आने लगी तो मैं सो गया। पर जब मैं सोया तब मेरे पापा मूझे धक्का लगाके उठा देते और बोलते की बाहर देखो सोओ मत। जब मेरे पापा का ध्यान भटक गया तब मैं सो गया एक मिनट तक उनका ध्यान कहीं और था पर एक मिनट मे मूझे नींद नही आई, फिर मेरे पापा ने मूझे फिर धक्का दिया और मै उठ गया। उसके बाद हम उसके गेट पर पहुँचे। पर हमे लगा कि वह गेट नही है फिर हम आगे गए आगे जाने के बाद हमे बहूत सारे गेट दिखे उन गेटो के उपर डाईरेक्टरस रूम ऐसा कुछ था , तो डाईरेक्टरस रूम के गार्ड से हमने पूछा कि एन्ट्रेन्स गेट कहा है तो उन्होने इशारा करके कहा कि उधर है , तो हम उधर गए तो आपको पता है कि एन्ट्रेन्स गेट कौन सा था , वही वाला जहाँ पे हम पहुंचे थे। तो हम गाड़ी से उतर गएI उतरने के बाद मेरे पापा ने बोला कि हम दोनों टिकिट निकालके लाते हैं।
आईसक्रीम और गार्डन के सुंदर फूल
मैंने सुबह कुछ खा नहीं रहा था तो मेरे पापा ने कहा कि तूम अभी खालो फिर मैं तुम्हे जू में जाकर कुछ खाने को दूँगा। अगर तुमने अभी नहीं खाया तो मै उधर तुम्हे कुछ नही दूँगा फिर मैंने खा लिया। ऐसा मेरे पापा ने सूबह कहा था, फिर मैं, मेरे पापा से कहने लगा की आपने मुझसे कहा था कि अगर मैंने खाया तो आप मुझे कुछ खाने के लिए देंगे तो आप मुझे दे नहीं रहे तो फिर मेरे पापा ने कहा की बाद मे मै तुम्हे दूँगा , तो फिर मै बोलने लगा कि मुझे अभी चाहिए – मुझे अभी चाहिए ऐसे हि बोलते रहने से पापा गुस्सा हो गए तो मुझे उन्होने मार दिया ज्यादा भी तेज नहीं पर मै रोने लगा। फिर मेरे मम्मी ने मूझे पास बुलाया और कहा कि मै तुम्हे आइस्क्रीम खिलाती हूँ।
फिर हम वहा गए जहा पे वैभव अंकल ने और मेरे पापा ने टिकिट निकाली थी वही से हमारी चेकींग हुई और हम जू के गार्डन मे आए। वहाँ पे इतने सुंदर फूल थे की मै बता भी नहीं सकता। उस गार्डन मे एक पाण्डा भी था। फिर मैं उसमे देखते देखते चल रहा था। जब मैंने देखा नीचे तो वैभव अंकल ने कहा कि इसमे एक क्रोकोडाइल है पर तब जू शुरू ही नहीं हुआ था फिर हम चलके आगे गए तो हमे दो लाइन दिखी एक लाइन थी गाड़ी की टिकट के लिए और एक थी जिसने टिकिट ली वो खड़ा होगा गाड़ी के आने के लिए इंतजार करने के लिए। तो फिर हम गाड़ी की टिकिट, लेने की लाइन मे लग गए।
चिड़ियाघर में हमने बाघ देखा
टिकिट लेने के बाद हम जब दूसरी लाइन मे लगे तो एक जू वाले आदमी ने कहा कि जिनके पास टिकिट है वो आगे आ जाओ। हमारे पास चार पेपर की बैंड थी एक बैगनी और चार सफ़ेद, सफ़ेद वाली बड़ो के लिए थी और बैगनी बच्चों के लिए फिर हम गाड़ी मे बैठ फिर हम आगे गए।
जब हम आगे गए तब हमे पेड़ो के पीछे वाले बंदर दिखे। उसके बाद हमें एक बड़ा सा चिपांजी दिखा। और आगे तो हमें हिरन दिखने लगे जहा पे हमने एक बाघ देखा उधर जहा पे हम खड़े थे उसके ठीक पीछे मुझे हिरन दिखने लगे पर वो जंगल था मत्लब पेड़ थे और उसके पीछे नेट और नेट के पीछे हम थे। जब हमने हिरन देखा तो मुझे लगा की बारासिंगा था पता है मुझे क्यों लगा की वो बारासिंगा है क्योंकि उसमे कोई एक बच्चे हिरन के सींग आठ थे। जू वालो की गलती हो गयी होंगी जब वो बारासिंगा एकदम छोटा सा बारासिंगा होगा तब उसे सिंग नहीं होंगे इसलिए उनकी गलती हो गयी होगी। उसके बाद हमने एक नील गाय देखी वो नीली नहीं है, पर वो उसका नाम है। उसके बाद हमने वो गाड़ी पकड़ी।
चिड़ियाघर में फ्रूटी पीते बंदर भी दिखे
गाड़ी पकड़ने के बाद उस गाड़ी के ड्राईवर ने कहा की इधर राइनोसोर है और उधर हायना और हिप्पो पोटैमस है। तो हम राइनोसोरस के यहाँ गए। वो विशालकाय भारतीय राइनोसोरस था उसका सिंग थोडा सा छोटा सा था उसकी खाल उसके खाल की लेयर्स अच्छी थी। वो एक बहुत बड़े यार्ड मे अकेला था और उसने अपनी पूरी तरह से अपनी बोडी दिखाई और पता है की उसने कैसे परफोर्म किया। उधर बहुत सारे पेड़ थे और वह थोड़ी देर के लिए आगे आया फिर वो धीरे धीरे पीछे गया, वहाँ से वह तेजी से आया जिस जगह से उसने भागना शुरू किया वहा पर मुझे एक पेड़ की डाली टूटकर नीचे गिरते हुए देखी और सुनी। फिर हम हायना वाले रास्ते से गए जब हम उस रास्ते पे गए तब हमें हायना दिखा , जब हम उसे देखने आये तो तब वो निचे चला गया फिर वो दुसरे रास्ते से आया , जब तक वो हायना दुसरे रास्ते से आता तब तक हमने फ्रूटी पीते हुए बंदर दिखे।
‘क्रोकोडाइल मरा हुआ सा लगा’
पहले उसने राउंड लिया फिर वो अपने केज के पास खड़ा हुआ मत्लब वो केज के दरवाजे के पास बैठा था फिर खड़े होकर वही पर उसने एक राउंड लगाया फिर एक लडके ने केज का दरवाजा खोला और वो भी केज के अंदर से और शेर ने भी कुछ नहीं किया मत्लब वो शेर ट्रेन्ड होगा I फिर हमने एक इंडिकेटर देखा फिर हमने उसपर देखा की उधर सांपघर है और इधर बबून और जागूआर है फिर हमने एक जागूआर का पिंजरा दिखा लगता है की वो अपने घर मे चला गया हो फिर हम आगे गए हमे एक बबून का एरिया दिखा बस खाली एक रूम और एक नदी के आकार जितना गोल और गोल के पास एक बिल्ली थी वो गोल उस मैदान के चारो तरफ से घिरे हुए होते है और वो बिल्ली उस गोल के एक दम कार्नर पे थी वो निचे देखकर म्याऊं म्याऊं कर रही थी I
मेरा जू जाने का सपना पूरा हो गया
हमने एक हाथी भी देखा था। वो ज्यादा भी बंद नहीं थे। वो बस दिख रहे थे एक था मेल और एक थी फिमेल मेल ज्यादा अन्दर था। फिमेल थोड़ी बाहर तो सबसे अच्छी फिमेल दिख रही थी। फिर हम एग्जिट गेट पर आ गए वहा पे हम फूलो के पास बैठे थे हमने बहुत सारी फोटो निकाली। फिर हम बाहर निकले हमने अपनी बैग्स लिए और आगे गए और जू के आगे रेस्ट्रोरेन्ट मे गए। हमने मेनू कार्ड देखा मैंने एक बर्गर माँगा, पापा और मम्मी ने पाव भाजी मांगी और वैभव अंकल और अनामिका दीदी ने छोले भटूरे मांगे। तो मै और मेरे पापा खाना लेके आए मैंने खाना खा लिया तो मै मेरे पापा से मांगने लगा तो फिर मेरे पापा ने कहा कि तुम्हे भूख लगी है तो मै तुम्हे क्या लाऊं। तो फिर मैंने डोसा माँगा और लस्सी। मै डोसा छुपा के खा रहा था। हमारा खाना, खाना हो गया था फिर हमने फोटोस खिचे और फिर हम घर वापस आ गए।
घर आकर भी मैंने बैंड नहीं निकाले। आज मेरा जू जाने का सपना पूरा हो गया पता है। मैं आज तक जू क्यों नही जा पाया हूँ क्योंकि हर शनिवार को मेरे पापा सोते रहते या कहीं गए होते है या वो करते है या ये करते है पर ज्यादातर सोते ही हैं। मैंने कभी सोचा भी नहीं था की इस जू (zoo) मे इतने बड़े-बड़े एनिमल्स होंगे। इस जू में पता है वो प्राणी होते है जो कभी हम देख ना सके पुने (पुणे) मे तो शेर नहीं था, राइनोसोरस भी नहीं था और हिप्पो पोटैमस भी नहीं। पर ये जू मूझे बहूत अच्छा लगा।
आरव के लेखन के सिलसिले को प्रोत्साहन कैसे मिला
आरव राउत का जन्म 25 जुलाई 2010 मे हुआ। आरव शुरू से ही प्रिंट रिच वातावरण मे पला बढ़ा, यही वजह थी की उसका पढ़ने और लिखने की तरफ एक रूझान विकसित हुआ। आरव की मातृभाषा मराठी है। हिंदी सेकंड लैंग्वेज है , जो उसने दिल्ली आकर सुननी और पढ़नी शुरू की जब उसके पापा महाराष्ट्र से दिल्ली ट्रान्सफर हुए , आरव उस वक्त सिर्फ 6 साल का था , छोटी उम्र मे बच्चे भाषा जल्दी सिख जाते है, सो आरव ने भी सीख ली।
लिखने की यात्रा के दौरान कभी भी उसे टोका नहीं गया किसी गलती के ऊपर , बस चाहते यह थे की वह लिखता जाये बिना किसी व्याकरण में अटके। यही बात उसे लिखने के लिए हौसला देती क्योंकि उसे पता था की मम्मी कुछ नहीं कहेगी अगर कुछ गलत हो जाये तो। आरव किसी एक टॉपिक के बारे मे एक पेज या कई पेज लिखता है बहुत ही डिटेल के साथ ।
उसके लिखे हुए टॉपिक देखे जाये तो उसमें काफी विविधता है जैसे कि – जानवरों का मेला, मैंने देखा हुआ सपना, आज का दिन, मेरा प्रिय खेल , मेरी छुट्टिया , आम, ग्लोब, मेरी रेल यात्रा बडनेरा से दिल्ली , मेरी दिल्ली की पहली फिल्म , बैडमिंटन , स्कूल का पहला दिन , पेड़ के पत्ते, पत्थर , मैप्स, एयर कंडीशनर , एअरपोर्ट म्यूजियम, दीवारों का इस्तेमाल , समुंदर के पत्थर , माय बर्थडे, मेरा घर, पेन, रक्षाबंधन , लाइट , किताब, स्वतंत्रता दिन, दही हांड़ी , धरती , जस्ट चिल्ल वाटर एंड फन पार्क , भूतनी का सपना, फनी स्कूल , इस बार की दिवाली , फ्रिज , मेरे खिलोने , साइंस म्यूजियम , लोह चुम्बक का खेल , गार्डनिंग , मोबाइल , आज के स्कूल का दिन , टॉय लैंप , ब्लैंकेट , मै , प्लास्टिक का अंडा , अ बोउन्सिंग बॉल , सर्कस , बॉल और बैट , भूल भुलैया की किताब , साइकिलिंग और चोर पुलिस , किताबे, मेरा पसंदीदा फल, मेरा राकेट क्यों नहीं उड़ा , पौधे का जन्म , अक्षरधाम, लैपटॉप , बाल भवन की सैर , शिमला की ट्रिप, दिल्ली का जू , चोखी ढाणी इत्यादि।
