प्रोफेसर कृष्ण कुमार कहते हैं,”अच्छी किताबें थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन हमें यह अहसास कराती हैं कि हम मनुष्य हैं और इसलिए मनुष्य होने के नाते हम आजाद हैं।” तो बच्चों की किताबों में ऐसा क्या हो कि वे भी इसी तरह की आजादी के अहसास से गुजर सकें, वे भी कल्पनाओं की दुनिया में खो जाएं और हर तरह के डर,रोक-टोक और दबाव से आजाद हो जाएं।
बाल साहित्य का बच्चों पर असर
वास्तव में साहित्य जीवन को फिर से रचता है और इस पुनर्चना में वह कल्पना की मदद लेता है। यानी यह जीवन की नकल भर नहीं होता बल्कि उसमें कल्पना के आधार पर जीवन की जटिलताओं और संवेदनात्मक पक्षों को बुना जाता है।
इसलिए जब आप कोई कहानी, कविता या उपन्यास पढ़ रहे होते हैं तो जीवन के एक हिस्से को जी रहे होते हैं और अपनी कल्पना से उसे फिर से गढ़ रहे होते हैं जिसमें आपके अपने अनुभव शामिल होते हैं। इसलिए एक ही कहानी पढ़ने के बावजूद उसका असर लोगों के मन पर अलग-अलग होता है और उसके मायने भी लोगों के लिए अलग-अलग होते हैं।
जब बच्चे बाल साहित्य पढ़ रहे होते हैं तो बाल साहित्य उनके साथ भी यही कर रहा होता है। वे अपने जैसे किसी और अनुभव को फिर से जी रहे होते हैं। ऐसी ही किताबें उन्हें ज्यादा पसंद भी आती हैं जैसे कि बच्चे अक्सर बहाना बनाते हैं या अपनी बात के पीछे कोई तर्क देते हैं। तो उन्हें कहानी में ऐसे पात्र पसंद आएंगे जो ऐसा ही करते दिखाई दें।
इसी तरह अगर कोई कमजोर पात्र अपनी चतुराई,साहस या किसी अन्य क्षमता की वजह से खुद को बचा ले या मुसीबत से बाहर निकल आए तो बच्चे ऐसे पात्र को पसंद करेंगे। क्योंकि शायद वह पात्र भी कुछ-कुछ उनके जैसा है और इसके बावजूद विपरीत परिस्थितियों व चुनौतियों से जूझ रहा है। जैसे बुद्धिमान खरगोश की कहानी।
बच्चों की किताबों में क्या हो ?
अगर आप बच्चों के जीवन का ध्यान से अवलोकन करें,उन्हें बात करते और बच्चों के साथ खेलते हुए देखें तो आप इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि अच्छा बाल साहित्य होने के लिए किताबों में क्या-क्या होना चाहिए। इसकी कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हो सकती हैं –
- बच्चों की सहज प्रवृति की झलक उनमें दिखायी दे – कल्पना की उड़ान हो,जिज्ञासा और बाल मनोवृत्तियों की झलक हो।
- बच्चों के अनुभव और उनके आस-पास का परिवेश प्रतिबिम्बित हो
- बच्चों की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करे
- बच्चों के मन में सवालों को जन्म दे व समाधान खोजने के लिए प्रेरित भी करे
- कोई चुनौती दे और चुनौती का सामना करने के लिए तैयार करे
- लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली हो कहानी
बच्चों की किताबों में क्या ना हो ?
- उपदेशपरक कहानियाँ ना हों
- लिंग,जाति,धर्म,रंग व शरीर आधारित भेदभावों को बढ़ावा ना किया गया हो
- तथ्यों और जानकरियों से भरी हुई कहानियाँ जिनका प्रस्तुतीकरण अरुचिकर हो
- विभिन्न किस्म के गैर-लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा ना दिया गया हो जैसे- गैर-बराबरी।
बहुत अधिक हिंसा ना हो - रूढ़ छविया/स्टीरियोटाइप ना हों (जैसे परंपरागत भुमिकाओं में ही पात्र नजर न आएं)। इसका एक उदाहरण ‘पापा की रोटी’ जैसी कविता हो सकती है जो रूढ़ छवियों को तोड़ती है और नये नजरिये से चीजों को देखने का अवसर देती है।
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