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जॉन होल्टः ‘बच्चे किसी काम को शुरू करते समय सफलता या असफलता के बारे में नहीं सोचते”

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यह तस्वीर http://www.johnholtgws.com से साभार ली गई है। यह तस्वीर 1983 में खींची गई थी।

प्रस्तुत शिक्षण डायरी के अंश जॉन होल्ट ने 27 मार्च, 1958 में लिखे थे। इसमें उन्होंने असफलता के कारणों का विवेचन किया है।

उन्होंने लिखा, “इस बात पर तो हम सहमत हैं कि सभी बच्चों को सफलता की आवश्यकता होती है। पर क्या इस बात से हम सबका आशय भी एक ही है? मेरा निजी विचार तो यह है कि सफलता न तो सहज प्राप्त होनी चाहिए और न आसानी से ही, और न ही वह हमेशा मिलती जानी चाहिए। सफलता का अर्थ ही बाधा को पार करना होता है। इस विचार के परे भी पहुंचना होता है कि शायद हम सफल न हो सकें। यह ‘मैं नहीं कर सकता’ को ‘मैं कर सकता हूँ’ या ‘लो मैंने कर लिया’ में बदलना होता है।” 

‘हम हमेशा सफल नहीं हो सकते’

यह हमें शुरू से ही सीख लेना चाहिए कि हम हमेशा किसी काम में सफल नहीं हो सकते हैं। बेसबॉल में बल्लेबाजी का बढ़िया औसत 300 माना जाता है, पर ज़िंदगी में बल्लेबाजी का औसत इससे काफी कम होता है।

जीवन में हम सबको जीत से अधिक हार का सामना करना पड़ता है। तो फिर क्या हमें इसकी शुरू से ही आदत नहीं पड़ जानी चाहिए? हमें यह भी सीख लेना चाहिए कि जितनी हमारी पहुंच हो उसके ज्यादा महत्वाकांक्षी हमारा लक्ष्य होना चाहिए। किसी व्यक्ति की चाहत उसकी पकड़ से परे होनी चाहिए, आखिर हम ऐसी उम्मीद किसलिए करें? ताकि जो हम आज नहीं कर सकते, हो सकता है वही हम कल कर दें या कोई दूसरा उसे हासिल करे। यानि हमारी असफलता किसी दूसरे के लिए रास्ता भी बना सकेगी।

हमें बच्चों को इस स्थिति से बचाना चाहिए जहाँ उन्हें लगातार असफलता ही मिलती रहे। असल में हमें असफलता के प्रति अपना नजरिया ही बदलना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि असफलता की भी एक गरिमा होती है, इसका रूप भी सकारात्मक होता है न कि लज्जाजनक। शायद हमें असफलता में भाषाई भेद करना सीखना चाहिए।

‘सफलता-असफलता दोनों वयस्कों के विचार है’

यह विचार हमारे मन को ललचाता है कि असफल बच्चों के लिए हम ऐसी स्थितियां पैदा कर दें जिसमें उन्हें लगे कि वे अधिकतर समय सफल हो रहे हैं। पर यह बात किसी बच्चे से छुपाई तो नहीं जाती न कि उसके हमउम्र, उसकी कक्षा के साथ या दूसरे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे क्या कर रहे हैं? बच्चों को तो केवल इस अहसास की ही आवश्यकता होती है कि वे किसी चीज़ को अच्छी तरह से कर सकते हैं। इतनी अच्छी तरह कि वे बिना किसी दूसरे के बताये स्वयं यह समझ लें कि उन्होंने यह काम बहुत दक्षता से किया है। हो सकता है कि इसके लिए किसी को बाहर से ऐसे उपाय भी करने पड़ें, जिससे उनमें एकाग्रता और संकल्प की कमी पूरी की जा सके।

मुझे केवल इतना ही कहना है कि सफलता व असफलता दोनों ही वयस्कों के बनाए हुए विचार हैं, जो हम बच्चों पर आरोपित करते हैं। वास्तव में सफलता और असफलता दोनों एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह हमेशा साथ-साथ चलते हैं।

यह कल्पना ही असंभव है कि हम बच्चों में ‘सफलता के प्रति प्रेम’ का अहसास, उनमें असफलता के प्रति भय जगाए बिना पैदा कर सकते हैं।

चलना सीखने वाले बच्चे कई बार गिरते भी तो हैं। छह-सात वर्ष के बच्चे साइकिल चलाना सीखते समय कई बार लुढकते और चोट खाते हैं पर गिरते ही वे बच्चे यह नहीं सोचते, “लो देखो मैं फिर से असफलत हो गया।” छोटे बच्चे खुद से बनाई कठिन योजनाओं से जूझते समय केवल यही सोचते हैं, “लो, अभी नहीं हुआ। चलो इसे फिर से करें।”

‘बच्चे अपने प्रयास व रोमांच के बारे में सोचते हैं’

चलते समय या साइकिल चलाना सीखते समय बच्चे यह नहीं सोचते, “वाह, मैं सफल हो रहा हूँ।” चलने या साइकिल चलाने के कारण में ही उनका आनंद निहित है, न कि सफलता के विचार में। संक्षेप में छोटे बच्चे सफलता-असफलता के बारे में सोचते ही नहीं हैं। वे तब केवल अपने प्रयासों और काम से मिलने वाले रोमांच के बारे में सोचते हैं। जब वयस्कों को खुश रखना महत्वपूर्ण बन जाता है, केवल तभी सफलता और असफलता के बीच वह गहरी रेखा उभर आती है।

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Pratibha

बहुत सही। कोई भी कार्य आनंद के नजरिए से किया जाता है तो सुकून और शांति प्रदान करने वाला होता है किन्तु वहीं कार्य यदि सफलता और असफलता से प्रेरित होकर किया जाता है तो प्राय हमारे अहम और भय का पोषक बन जाता है। खास तौर से छोटे बच्चों पर इसे थोपना और अधिक अन्यायपूर्ण है।

Devendra Kumar Gurjar

लेख को पढ़ने के बाद किताब को पढ़ने को आतुर हूँ। इसे अवश्य पढ़ूँगा ।

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