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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

गरासिया, हिंदी और मारवाड़ीः क्या कहते हैं बच्चे?

सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों ने बताया कि अगर उनकी मातृभाषा में किताबें होतीं तो उनके लिए पढ़ना-समझना आसान होता। हिंदी की मुश्किलों को भी वे बड़ी बेबाकी से सामने रखते हैं। तो आइए 'बच्चों की दुनिया' में आज रूबरू होते हैं बच्चों की लिखावट से।

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गरासिया सिरोही ज़िले के आदिवासी अंचल में में बोली जाने वाली एक भाषा है।
गरासिया सिरोही ज़िले के आदिवासी अंचल में में बोली जाने वाली एक भाषा है।

गरासिया सिरोही ज़िले में बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा है। इसके शब्द हिंदी भाषा से काफी अलग हैं। हिंदी व गरासिया के बारे में अपने अनुभव बताते हुए  बच्चों ने कहा, “हिंदी भाषा से हमें डर लगता है क्योंकि हमें हिंदी पढ़ने, समझने और बोलने में परेशानी होती है। हमारे गाँव में तो लोग गरासिया बोलते हैं। अगर हमारी किताबें इसी भाषा में होती तो बहुत आसानी से समझ आतीं।”

मगर इन बच्चों की आवाज़ कौन सुनता है?

सातवीं और आठवीं कक्षा के बच्चों ने अपनी स्थानीय भाषा, मारवाड़ी और हिंदी के आपसी संबंधों के बारे में लिखा, “हम अपने घर पर गरासिया भाषा बोलते हैं। जब पहली कक्षा में आए थे तो स्कूल में भी गरासिया भाषा ही बोलते थे। जब हम दूसरी कक्षा में पहुंचे तो हमको मारवाड़ी थोड़ी-थोड़ी समझ में आने लगी थी। हम अपने घर पर कभी-कभी मारवाड़ी और हिंदी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं।”

अपना उदाहरण बनाते हुए बच्चे लिखते हैं, “हम घर जाकर मेढक बोलते तो हमको घर वाले कहते कि मेढक क्या होता है? हम गरासिया भाषा में समझाते ‘डेडका’ को हिंदी में मेढक कहते हैं। अब हमको हिंदी भाषा भी समझ में आ जाती है। हिंदी बोलने में दिक्कत होती है तो डर लगता है। हमको पढ़ना-लिखना आ जाता है तो हम हिंदी भाषा समझ में आ जाती है। हम हिंदी भाषा में तोते कहते हैं और उसे गरासिया में टुइटो कहते हैं।

एक बच्चा लिखता है, “हम घर जाकर कहते कि मैं भैंस लेने जा रहा हूँ तो घर वाले पूछते कि भैंस क्या होती है? हम समझाते हिंदी भाषा में भैंस कहते हैं और गरासिया भाषा में इसे डोबी कहते हैं।”

वे लिखते हैं, “अगर हमारी किताब गरासिया भाषा में होती तो हमको जल्दी पढ़ना आ जाता। हमको हिंदी पढ़ना अच्छा लगता है और हम समझ भी पाते हैं।”

अगले उदाहरण में आठवीं कक्षा के धनाराम लिखते हैं, “हमने घर जाकर पूछा झार (पेड़) को हिंदी में क्या कहते हैं? उनको मालूम नहीं है। गरासिया भाषा में पेड़ को झार कहते हैं। हम कभी-कभी अंग्रेजी का भी उपयोग करते हैं। हम हिंदी में स्कूल को विद्यालय कहते हैं। हम अंग्रेजी में विद्यालय को स्कूल कहते हैं। हमारे विद्यालय के चारो ओर पर्वत हैं। हम गरासिया भाषा में अध्पाक को मारशा कहते हैं। हमारे विद्यालय में बच्चे थोड़ी-थोड़ी हिंदी बोल लेते हैं।”

एक अन्य छात्र लिखता है, “अंग्रेजी भाषा में लिखी किताब को पढ़ना मुश्किल होता है। और यदि मारवाड़ी भाषा में किताबें लिखी जातीं तो लिखना कठिन होता।” आठवीं कक्षा की छात्रा सुनीता लिखती हैं, “हमें अंग्रेजी पढ़ना नहीं आता। हमें अंग्रेजी बोलना भी नहीं आता। हमें अंग्रेजी समझ में नहीं आती। गरासिया भाषा में किताब लिखी होती तो हम सब उसे पढ़ पाते।” पढ़ने वाले सवाल के बारे में लिपि का सवाल उठाया जा सकता है कि उसकी लिपि तो हिंदी वाली ही होती। लेकिन ध्वनि जागरूकता वाले नज़रिये से देखें तो स्थानीय भाषा में लिखी किताबों को पढ़ पाने का उनका आत्मविश्वास ग़ौर करने लायक है।

एक अन्य छात्र लिखता है, “मेरे घर वाले गरासिया बोलते हैं। मैं उनसे घर पर गरासिया भाषा में बात करता हूँ। हम स्कूल में सब गरासिया भाषा में बोलते हैं। मुझे मारवाड़ी बहुत अच्छे से आती है।”

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