अगर बच्चे किसी तरीके से सीख रहे हैं। शिक्षक के सवालों का जवाब दे रहे हों तो एक शिक्षक को काम करने में आनंद आता है और वे अपने काम को बहुत ज्यादा तल्लीनता के साथ करते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने पढ़ाने के तरीके में भी बदलाव करते हैं ताकि अपने काम को ज्यादा बेहतर ढंग से और सुगमता के साथ कर सकें। अगर किसी शिक्षक के मन में यह तस्वीर साफ-साफ बन जाए कि बच्चे सीखते कैसे हैं? क्यों उनके सीखने के तरीके को शिक्षण की तकनीक का हिस्सा बनाना जरूरी है तो बाकी सारी चीज़ों को शिक्षक खुद संभाल लेते हैं।
पढ़ाने वाला भी सीखता है?
इसी संदर्भ में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार कहते हैं, “शिक्षा में दोहरी क्षमता होती है। यह विद्यार्थी को गढ़ने के साथ-साथ अध्यापक को भी गढ़ती है। शिक्षाविज्ञान में यह बात स्वीकार की गई है। मगर इसे कम ही लोग गंभीरता से लेते हैं। यह कहना एक चालू मुहावरा भर रह गया है कि पढ़ने वाले के साथ-साथ पढ़ाने वाला भी सीखता है।”
यह पूरी प्रक्रिया जब एक विपरीत परिस्थिति में हो रही होती है, जहाँ एकमात्र शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए हैं तो आपको शिक्षक के इस जज्बे और हौसले की तारीफ करने का मन होता है। इसी संदर्भ में एक शिक्षक कहते हैं कि स्कूल में सिर्फ पर्याप्त अध्यापकों का होना काफी नहीं है, अगर उन लोगों का शिक्षा और बच्चों को पढ़ाने के प्रति संवेदनशील नज़रिया नहीं है। परिस्थितियों के दबाव को अपने ऊपर से हटाकर काम करने की प्रतिबद्धता एक इंसान को आगे ले जाती है। शिक्षण का कार्य कराने वाले शिक्षकों के बारे में भी यह बात उतनी ही सच है।
