Trending

पढ़ाने के दौरान शिक्षक भी सीखते हैं?

education_mirror-imageकिसी शिक्षक का सीखना कई तरीकों से संपन्न होता है। बहुत से शिक्षक किताबों से पढ़कर अपने काम की सामग्री को क्लासरूम में जीवंत कर देते हैं। तो बाकी शिक्षक बच्चों के साथ निरंतर संवाद की प्रक्रिया में सीखते हैं। इसके अलावा एक तरीका शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले शिक्षक प्रशिक्षकों के साथ संवाद और विचार-विमर्श में भी सीखने की प्रक्रिया संपन्न होती है।

अगर बच्चे किसी तरीके से सीख रहे हैं। शिक्षक के सवालों का जवाब दे रहे हों तो एक शिक्षक को काम करने में आनंद आता है और वे अपने काम को बहुत ज्यादा तल्लीनता के साथ करते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने पढ़ाने के तरीके में भी बदलाव करते हैं ताकि अपने काम को ज्यादा बेहतर ढंग से और सुगमता के साथ कर सकें। अगर किसी शिक्षक के मन में यह तस्वीर साफ-साफ बन जाए कि बच्चे सीखते कैसे हैं? क्यों उनके सीखने के तरीके को शिक्षण की तकनीक का हिस्सा बनाना जरूरी है तो बाकी सारी चीज़ों को शिक्षक खुद संभाल लेते हैं।

पढ़ाने वाला भी सीखता है?

इसी संदर्भ में प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार कहते हैं, “शिक्षा में दोहरी क्षमता होती है। यह विद्यार्थी को गढ़ने के साथ-साथ अध्यापक को भी गढ़ती है। शिक्षाविज्ञान में यह बात स्वीकार की गई है। मगर इसे कम ही लोग गंभीरता से लेते हैं। यह कहना एक चालू मुहावरा भर रह गया है कि पढ़ने वाले के साथ-साथ पढ़ाने वाला भी सीखता है।”

सीखने की प्रक्रिया, बच्चों से बातचीत, शिक्षा में बातचीत की भूमिका, भारत में प्राथमिक शिक्षा, एजुकेशन मिररकिसी ऐसी कक्षा में होने का जीवंत अनुभव जहाँ बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी सीख रहे होते हैं, यह बताता है कि पढ़ने वाले के साथ-साथ पढ़ाने वाला भी सीखता है। ज्यादा तल्लीनता और खुशी के साथ सीखता है। ठीक बच्चों की तरह सीखता है। वह बच्चों के साथ संवाद करता है, उनकी परेशानियों को समझने और उनको सुलझाने की कोशिश करता है ताकि कालांश में सीखने-सिखाने का एक जीवंत माहौल बन सके।

यह पूरी प्रक्रिया जब एक विपरीत परिस्थिति में हो रही होती है, जहाँ एकमात्र शिक्षक बच्चों को पढ़ाने के लिए हैं तो आपको शिक्षक के इस जज्बे और हौसले की तारीफ करने का मन होता है।  इसी संदर्भ में एक शिक्षक कहते हैं कि स्कूल में सिर्फ पर्याप्त अध्यापकों का होना काफी नहीं है, अगर उन लोगों का शिक्षा और बच्चों को पढ़ाने के प्रति संवेदनशील नज़रिया नहीं है। परिस्थितियों के दबाव को अपने ऊपर से हटाकर काम करने की प्रतिबद्धता एक इंसान को आगे ले जाती है। शिक्षण का कार्य कराने वाले शिक्षकों के बारे में भी यह बात उतनी ही सच है।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Anonymous

Useful article

1
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x