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‘ये बच्चे हैं, रिमोट से चलने वाले खिलौने नहीं’

किताब पढ़ते बच्चे

औपचारिक रूप से छह साल की उम्र में किसी बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला होता है। बहुत से बच्चों के लिए यह औपचारिक शिक्षा की पहली सीढ़ी होती है। इस कक्षा में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे इससे पहले अपने घर और गाँव में पूरी आज़ादी के साथ दिनभर घूमते, दौड़ते, खेलते और विभिन्न गतिविधियों में सहजता से शामिल होते हैं।

ऐसे बच्चे खुद से ही चीज़ों को जानने-समझने की कोशिश करते हैं। वे बहुत से सवाल पूछते हैं और चीज़ों को जानने की अपार जिज्ञासा से भरे होते हैं। हर बच्चे का अपना व्यक्तित्व होता है और उनका अलग-अलग स्वभाव भी होता है। सबकी अलग पहचान होती है। कोई भी बच्चा किसी और की फोटो कॉपी नहीं होता। वे मौलिक रूप से एक-दूसरे से अलग होते हैं। संक्षेप में कह सकते हैं कि पहली कक्षा बच्चों के औपचारिक सामाजीकरण के शुरुआत की पहली सीढ़ी होती है।

चेहरा पढ़ लेते हैं बच्चे

कई बार ऐसे बच्चों को पता भी नहीं होता कि शिक्षक उनके बारे में क्या राय रखते हैं। वे उनको किस नज़रिये से देखते हैं। लेकिन इंसानी भावनाओं की उनको अच्छी परख होती है। वे बड़ों के हाल-भाव और बात करने के अंदाज से समझ लेते हैं कि किससे डरना चाहिए और किसके साथ वे सहजता से अपनी बात रख सकते हैं। ऐसे छोटे बच्चे ‘मनमौजी’ होते हैं यानि जो उनके मन में आता है तुरंत करते हैं।

बच्चों की ऐसी छोटी-छोटी बातों से शिक्षकों और अभिभावकों को बड़ी परेशानी होती है। क्योंकि बच्चों की बहुत सी बातें बड़ों की सामाजिक मान्यताओं और अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरते। तो आइए जानते हैं उन मान्यताओं के बारे में जिसके कारण हमारा व्यवहार बच्चों के लिए एक खास तरीके से संचालित होता है।

1. ‘बच्चों को कितना भी समझाओ, ये तो आपस में बात करते रहते हैं।’ यानी बच्चे रिमोट से संचालित होने वाले उन खिलौनों की तरह नहीं होते जो रिमोट का इशारा पाते ही चलते हैं, शोर मचाते हैं और रिमोट का बटन दबाते ही ख़ामोश हो जाते हैं।

मगर बच्चों के आपस में बात करने वाली बात से शिक्षकों को अक्सर शिकायत होती है, कई बार उनकी बात सही भी होती है। संभवतः ऐसे शिक्षक उन रणनीतियों को लेकर काम नहीं करते जो बच्चों की सार्थक भागीदारी हासिल के लिए जरूरी होती हैं। वहीं बच्चों के स्वभाव को जानने-समझने और उनकी बातों को सुनने की कोशिश करने वाले शिक्षकों का व्यवहार और बच्चों के बारे में नज़रिया काफी अलग हो जाता है। यहाँ एक बात ध्यान देने वाली है कि बच्चों के आपसी बातचीत को भी सीखने की एक प्रक्रिया के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

2. ‘इसको कल ही पेंसिल दी थी। आज फिर गुमा दी।’ यह बात शायद आपने भी माता-पिता को यह बात अक्सर कहते हुई सुनी होगी या खुद भी किसी बच्चे के लिए ऐसी बात कही होगी। इस बात के पीछे शायद एक सोच है कि बच्चों को बड़ों की तरह हर चीज़ संभालकर रखनी चाहिए। ताकि रोज़मर्रा के जीवन का सुगम तरीके से संचालन हो सके। मगर बच्चे तो स्वतःस्फूर्त ढंग से तात्कालिक चीज़ों से प्रभावित होते हैं। इसलिए उनके भूलने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। बड़ों को चाहिए कि वे धैर्य के साथ उनको समझाने और उससे पहले उनको समझने की कोशिश करें। आप बच्चों को उनका स्कूल बैग व्यवस्थिति करने में खुद से ध्यान रखने के लिए धीरे-धीरे आदत डलवा सकते हैं।

‘बच्चे खुद से सीखते हैं’ क्या?

3. बच्चों को तो हर बात बतानी पड़ती है। ऐसे में यह बात सही कैसे हो सकती है, “बच्चा खुद से सीखता है।” इस बारे में यही कहा जा सकता है कि स्कूल आने से पहले बच्चा सैकड़ों-हज़ारों शब्द जानता है, अपनी बात आसानी से कह पाता है, बहुत सी चीज़ों को पहचानता भी है। उसको जो कुछ पता है वह उसे किस-किस ने सिखाया, ऐसा कोई आँकड़ा जुटाना मुश्किल है। क्योंकि बच्चे अवलोकन से, चीजों को देखकर, सुनकर और अनुकरण करके सीख रहे होते हैं।

4. “अनुकरण बच्चों के सीखने का एक प्रमुख तरीका है।” बच्चे किसी नई भाषा को दोहराकर और उसका अनुकरण करके सीखते हैं। एक शिक्षक के रूप में ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे स्वतः सीखते हैं। खुशी-खुशी सीखते हैं। गंभीर होकर भी सीखते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि हम उनको खुद से करने का जितना ज्यादा से ज्यादा मौका संभव हो जरूर दें और जहाँ उनको सहयोग की जरूरत हो वन-टू-वन मोड में सपोर्ट भी करें।

‘बच्चे तो किताबें फाड़ देते हैं’?

5. यह बात को भारत के हर हिस्से में सुनने को मिलती हैं। शायद बच्चों के बारे में हमारी मान्यता होती है कि ‘वे लापरवाह होते हैं।’ किताबें फाड़ देते हैं। कापी फाड़ देते हैं। पेंसिल छिलकर खत्म कर देते हैं। किसी एक जगह पर ध्यान नहीं देते। कोई बात बताओ तो वे जल्दी ही भूल जाते हैं। वे अपनी किताबें बेचकर कुछ सामान खरीद लेते हैं, बड़ी कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के बारे में यह बात सुनी मैंने।

बच्चे तो कॉपी में कहीं भी लिखते हैं। कभी पहले पेज़ पर तो कभी आखिरी पन्ने पर। ये सारी बातें बताती हैं कि बच्चों को देखने-समझने वाला हमारा नज़रिया बड़े लोगों जैसा ही है। बच्चों को उनकी नज़र से देखने की कोशिश करें तो बहुत सारी चीज़ें साफ़-साफ़ समझ में आएंगी।

ऊपर लिखी सारी बातें बच्चों के सीखने के अपने-अपने तरीके को दर्शाती हैं। बच्चों को क्या महत्वपूर्ण लगता है और बड़ों को क्या महत्वपूर्ण लगता है, इन दोनों में काफी अंतर होता है। बड़े होने के नाते आपने अपनी प्राथमिकताएं तय कर ली हैं और बच्चा अभी अपनी प्राथमिकताएं तय करने की दिशा में नन्हे-नन्हे क़दम बढ़ा रहा है। उनकी प्राथमिकताएं बड़ी तेजी से बदलती भी हैं। ऐसे स्वभाव वाले बच्चों को प्रोत्साहन, स्नेह और परवाह की जरूरत है।

बच्चों को दें सुरक्षा का अहसास

बच्चों की जिज्ञासा को बढ़ावा देने और जरूरत के अनुसार शांत करने की जरूरत है। ताकि वे सीखने के लिए एक मजबूत नींव बना सकें बच्चों के भविष्य के लिए।

प्राथमिक कक्षाओं में होने वाली आलोचना, पिटाई और उपेक्षा से बच्चों को उबरने में सालों साल लग जाते हैं। कई बार तो बच्चे स्कूल भी छोड़ देते हैं या पढ़ने को लेकर एक डर उनके मन में बहुत गहरे बैठ जाते हैं। इसलिए उनके प्रति अच्छे व्यवहार को लेकर हमेशा सजग रहेे और उनको व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण होने का आभास दें। उनकी खूबियों और छोटे-छोटे प्रयासों की जरूर सराहना करें ताकि उसे लगे कि वह एक ऐसी जगह है जो उसके लिए भावनात्मक रूप से सुरक्षित है। यहां उसे किसी से डरने की जरूरत नहीं क्योंकि यहां उनका ख्याल रखा जाता है और उनकी बातों को सुना जाता है और उनका जवाब दिया जाता है।

हमें शायद लगे कि ऐसी आदर्शवादी बातें को स्कूल की व्यावहारिक स्थिति में पूरी तरह उतार पाना मुश्किल है। आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं क्योंकि एक स्कूल को ‘अच्छा स्कूल’ बनाना और एक बच्चे को ‘बच्चा’ समझना और उसके अनुसार व्यवहार करना वाकई मुश्किल काम है। मगर ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों में आपको ख़ुशी मिलेगी और बच्चों का अपने शिक्षक के प्रति नजरिया और सोच सकारात्मक ढंग से बदल सकती है, यह बात विश्वास के साथ कही जा सकती है।

आखिर में कह सकते हैं कि बच्च्चों को बच्चों की तरह से देखना एक शिक्षक के रूप में हमारे तनाव को काफी कम कर देगा। अगर हम बच्चों को उनके सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ देखने-समझने की कोशिश करें तो यह बात स्वाभाविक रूप से हमें उनके प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाती है। यह सोचने के लिए प्रेरित भी करती है कि उनके जीवन में क्या नहीं है, जो एक शिक्षक के रूप में हम उनको दे सकते हैं। यही बात हमें बच्चों को कक्षा और विद्यालय में सीखने के विभिन्न अवसरों में सक्रियता से शामिल करने के लिए नये-नये खेल, गतिविधियां और रणनीतियां खोजने की दिशा में आगे बढ़ाएगी, जो हमें अंततः एक बेहतर शिक्षक बनाएगा। जिसे बच्चे सबसे ज्यादा पसंद करते हैं और जिसे अपना रोल मॉडल भी मानते हैं। बच्चों के सकारात्मक व्यवहार और सोचने के तरीके में इस तरह के छोटे-छोटे बदलाव की नींव डालना एक तरह का सामाजिक निवेश है, जिसका रिटर्न बहुत ज्यादा है। हमें अपने जीवन में ऐसे निवेश जरूर करने चाहिए।

(आप एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब पर जुड़ सकते हैं। आप अपने  लेख और अनुभव  भेजें  educationmirrors@gmail.com पर।)

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