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बच्चों की दुनियाः ‘अपना मॉनिटर ख़ुद बनो’

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कहानी सुनने के दौरान सवालों के जवाब देते बच्चे।

बच्चे, बच्चों के सीखने के बारे में क्या सोचते हैं। इस पोस्ट में हम उनके अनुभवों की बात करेंगे। इसके साथ ही चर्चा होगी ‘मॉनीटर’ के एक ने नये मायने पर भी।

सातवीं कक्षा के बच्चों से एक ऐसे सवाल पर बात हो रही थी जो शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का पसंदीदा सवाल है। बच्चे कैसे सीखते हैं? पहला जवाब आया कि बच्चे बड़े होने के साथ-साथ सीखते जाते हैं।

दूसरे बच्चे का जवाब था कि बच्चे अपने पैरेंट्स को देखकर सीखते हैं। तीसरे ने कहा कि बच्चे बड़ों से सीखते हैं। इसके बाद एक बड़ा रोचक सा जवाब आया कि बच्चे जब ठान लेते हैं कि कोई चीज़ सीखनी है तो सीख ही जाते हैं।

बच्चे कैसे सीखते हैं?

जवाबों के बीच कुछ सवाल भी आ रहे थे कि अगर बड़े न सिखाएं तो क्या बच्चे नहीं सीखेंगे। तो बच्चों का जवाब था कि वे बाकी बच्चों को देखकर सीखेंगे। माँ बच्चे की पहली पाठशाल होती है, यह बात भी आ गई। बच्चे पापा से नहीं सीखते क्या? जवाब था कि बच्चे पापा से भी सीखते हैं। आसपड़ोस के लोगों से भी सीखते हैं। उनके सीखने का सिलसिला लगातार चलता है, वे बहुत सी चीज़ों को ख़ुद करके सीखते हैं। भाषा वे सुन करके या लोगों की कही बातों का दोहरान करके सीखते हैं। वे दूसरों की नकल करते हैं। उनका अनुकरण करके सीखते हैं।

इस बातचीत के दौरान पाँचवीं कक्षा के बच्चों का शोर जारी था। वे थोड़ी देर पहले लायब्रेरी से मनपसंद कहानी की किताबें पढ़कर और एक कहानी पर रोचक चर्चा से लौटे थे। जाहिर है उनके पास बात करने के लिए काफी मशाला था, इसलिए वे बड़े जोर-शोर से अपनी बातों से सिलसिले को जारी रखना चाहते थे। उनसे मैंने सवाल पूछा कि आप लायब्रेरी में गये थे। उन्होंने कहा। आपने अपने मन की किताब पढ़ी, जवाब था हाँ। तो मैंने पूछा कि बाकी क्लास के बच्चों से भी बात करनी चाहिए तो उनमें से ज्यादातर का जवाब हाँ था।

‘अपना मॉनीटर ख़ुद बनो’

मगर कुछ बच्चे न बोल रहे थे, तो बाकी बच्चों ने कहा कि ये लोग मना कर रहे हैं। तो मैंने कहा कि अगर सातवीं के बच्चे कहते हैं कि मुझे आपकी क्लास में नहीं आना है तो मैं उनकी बात मान लूंगा। आख़िर में बात क्लास का मॉनीटर बनाने को लेकर हुई कि इस क्लास का एक मॉनीटर बन जाए तो सारे बच्चे शांत हो जाएंगे। मैंने कहा कि फलां बच्चे के मॉनीटर बनने से आप लोग शोर मचाना बंद कर देंगे और अपना काम करेंगे। तो उनका जवाब था नहीं। जाहिर सी बात है कि मॉनीटर को लेकर भी उनकी एक पसंद-नापसंद तो होती ही है।

पाबुला, तितली, गरासिया भाषा, बहुभाषिकता, एजुकेशन मिरर, बच्चों की भाषा, घर की भाषामेरे मन में एक आइडिया आया। मैंने पूछा कि कौन-कौन मॉनीटर बनेगा। बहुत सारे लोगों के हाथ ऊपर थे। दूसरों को कंट्रोल करने का इससे सुनहरा मौका भला कहां मिलता होगा, उनसे हाथ नीचे करने के लिए कहने के बाद मैंने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “आप सभी लोग अपने-अपने मॉनीटर हैं। कोई किसी और को नहीं देखेगा। कोई किसी की शिकायत नहीं करेगा। सारे लोग ख़ुद को देखेंगे, अगर इसके बाद भी शोर होता है तो क्लास में आकर सबसे पूछुंगा कि शोर क्यों हो रहा है?”

इसके बाद बच्चे अपने मॉनीटर होने की कल्पना के बारे में सोचने लगे। मैं सातवीं कक्षा में वापस लौटा, पुराने सवाल पर जारी बात थोड़ी देर के लिए रुकी। फिर सवाल बदल दिया गया कि आप कैसे सीखते हैं? आपको इस सवाल का जवाब देना है। मगर बच्चों के बारे में बताने वाली बात ज्यादा आसान थी, इसलिए ज्यादा लोगों के जवाब आ रहे थे। ख़ुद के बारे में जवाब देने वाली या ख़ुद की जवाबदेही तय करने वाली स्थिति तो वाकई मुश्किल होती है। इस दौरान छुट्टी का समय बेहद करीब आ गया।

मैंने उनको पांचवी कक्षा के ‘मॉनीटर’ वाले फॉर्मूले के बारे में बताया। इनमें से बहुत सारे बच्चे पांचवी क्लास को चुप कराने के लिए जाना चाहते थे। मैंने सभी बच्चों से कहा कि दूसरों का मॉनीटर होना बहुत आसान है, हमें अपना मॉनीटर ख़ुद बनने की कोशिश करनी चाहिए। यही आज के दिन का आख़िरी सबक था, उनके लिए भी और मेरे लिए भी।

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