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छत्तीसगढ़ः बलरामपुर ज़िले के कलेक्टर ने सरकारी स्कूल में कराया बेटी का नामांकन

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बलरामपुर के ज़िलाधिकारी अवनीश कुमार शरण सरकारी स्कूल में अपनी बेटी का दाख़िला करवाते हुए।

विभिन्न राज्यों में सरकारी स्कूलों में बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए अभियान चल रहा है। इस अभियान की कहानियों में सबसे रोचक कहानी छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले से आयी।

इस ज़िले के कलेक्टर अवनीश कुमार शरण ने अपनी बेटी वेदिका शरण का नामांकन यहीं के एक सरकारी स्कूल प्रज्ञा शाला, बलरामपुर में कराया।

इस ख़बर को देश के विभिन्न अख़बारों की वेबसाइट्स और सोशल मीडिया साइट्स पर शेयर किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के साथ-साथ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश में शिक्षक भी ह्वाट्सऐप पर साझा कर रहे हैं।

सरकारी स्कूल में बेटी का दाखिला, कर्तव्य का पालन है

कलेक्टर अवनीश शरण ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर स्कूल ड्रेस में बेटी वेदिका की यह तस्वीर साझा की है। इसपर लोगों ने उनकी पहल की तारीफ की है।

इस बारे में अवनीश कुमार ने कहा कि मैं अपने कर्तव्य का पालन भर कर रहा हूँ ताकि लोग सरकारी स्कूलों की शिक्षा से जुड़ें। निःसंदेह सरकारी स्कूलों की छवि को बेहतर बनाने में ऐसे प्रयास मील का पत्थर साबित होंगे। 

इससे सरकारी स्कूलों के बारे में लोगों की सोच बदलने की दिशा में होने वाले प्रयासों को गति मिलेगी। शिक्षकों की आलोचना करने की बजाय, जो भरोसा शिक्षकों की क्षमता पर बलरामपुर के ज़िला अधिकारी ने जताया है, ऐसा विरले ही देखने को मिलता है। इसलिए ऐसे प्रयास की सराहना होनी चाहिए।

पढ़िए  पोस्टः सरकारी स्कूलों के बारे में अच्छी बात क्या है?

इस घटना से ज़िले या राज्य के अन्य स्कूलों में शिक्षा के स्तर पर क्या असर पड़ेगा, इसके बारे में कोई भविष्यवाणी करना तो बहुत जल्दबाजी होगी, क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले बदलाव की गति धीमी होती है। ऐसे बदलावों को आकार लेने में वक्त लगता है।

पढ़िएः अगर शिक्षक चाह लें तो सरकारी स्कूलों में बदलाव संभव है

इस बारे में शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल ने कपिल सिब्बल द्वारा 100 दिन की योजना लागू करने के मौके पर भोपाल ने कहा था कि शिक्षा के क्षेत्र में सौ दिन की कोई भी योजना सफ़ल नहीं हो सकती है। यानि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के लिए लंबा वक्त लगता है, इसके लिए धैर्य के साथ तैयारी करने और ज़मीनी स्तर पर प्रभावशाली क्रियान्यवय करने की जरूरत होती है।

साल 2015 और इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला

भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में चर्चाओं का दौर शुरू करने वाल साल था 2015। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले ने सरकारी नौकरी पेशा लोगों और नौकरशाहों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने का आदेश दिया था। इसके साथ ही ऐसा न करने पर जुर्माने का प्रावधान किया था। इस फ़ैसले को प्राथमिक स्कूलों की स्थिति को सुधारने की दिशा में मील के पत्थर के रूप में देखा जा रहा था, मगर अगले शैक्षिक सत्र 2016-17 से इसका क्रियान्वयन नहीं हो सका।

इस फ़ैसले पर शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने बीबीसी हिंदी के लिए लिखे अपने एक लेख में कहा था, “इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सभी जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ने को अनिवार्य बनाने का आदेश दिया है। यह सपना सुंदर और सुखद है मगर जिस नींद में शिक्षा व्यवस्था सोई हुई है, वह ज़्यादा दुखद है।”

 

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