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NEP 2020 वेबिनार: ‘नवाचार और अच्छा काम करने वाले शिक्षकों को मिले प्रोत्साहन – डॉ. रविकांत’

उत्तर प्रदेश में जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान (डायट) सारनाथ, वाराणसी द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर 14 दिवसीय वेबिनार आयोजित किया जा रहा है। इस कड़ी में छठवें दिन की परिचर्चा ‘शिक्षक, पाठ्यक्रम और शिक्षणशास्त्र’ विषय पर केंद्रित रही। इस परिचर्चा में विशेषज्ञ वक़्ता के रूप में सेंट्रल यूनिवर्सिटी, साउथ बिहार के शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. रविकांत, ईश्वर शरण पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज इलाहाबाद विश्वविद्यालय से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. शैलेष यादव, डायट सारनाथ वाराणसी से प्रवक्ता डॉ. लालधारी यादव शामिल हुए। इस वेबिनार का संचालन डायट प्रवक्ता डॉ. हरगोविन्द पुरी ने किया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर केंद्रित इस 14 दिवसीय वेबिनार को डायट सारनाथ, वाराणसी के प्राचार्य उमेश कुमार शुक्ल के नेतृत्व में आयोजित किया जा रहा है।

 

डायट सारनाथ के प्रवक्ता डॉ. लालधारी यादव ने ‘शिक्षक, पाठ्यक्रम और शिक्षणशास्त्र’ विषय पर होने वाली चर्चा की शुरूआत करते हुए कहा, “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में पूर्व प्राथमिक से लेकर 12वीं तक की पढ़ाई को 5+3+3+4 के अनुसार नियोजित करने का प्रावधान किया गया है। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा पर फोकस के कारण शिक्षा के शुरूआत की उम्र अब 6 से घटाकर तीन साल करने का प्रस्ताव रखा जा रहा है ताकि आँगनबाड़ी के माध्यम से ‘स्कूल रेडिनेस’ वाले बिंदु पर भी काम किया जा सके।

इसके साथ ही शिक्षार्थियों के समग्र विकास, रटंत प्रणाली से हटकर ज्ञान व समझ निर्माण, तार्किक चिंतन करने की क्षमता के विकास और 21वीं सदी के कौशल विकास को विशेष महत्व दिया गया है। भाषाओं के संदर्भ में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को महत्व देने की बात भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कही गई है।”

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार बनेगी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF)

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. लालधारी यादव ने कहा कि कला व खेल शिक्षा को भी महत्व दिया गया है। पाठ्यक्रम के बोझ को कम करने और अधिगम की खाई को पाटने को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में विशेषतौर पर रेखांकित किया गया है। माध्यमिक स्तर पर विषयों के चुनाव हेतु बच्चों को स्वतंत्रता देने की बात कही गई है। ताकि वे किसी भी विषय का चुनाव रुचि के अनुसार कर सकें। स्कूली शिक्षा के लिए एक नया और व्यापक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा NCERT द्वारा तैयार करने का भी प्रस्ताव किया गया है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर आधारित होगा।”

ईश्वर शरण स्नातकोत्तर महाविद्यालय,इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज के शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. शैलेश कुमार यादव ने शिक्षक की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा, “भारतीय संविधान में शिक्षा को समवर्ती सूची में रखा गया है। राज्य सरकारों द्वारा चीज़ें तय की जाती हैं और संसद से क़ानून के रूप में पास होने का बाद शेष प्रावधान भी राज्यों में क्रियान्वित होंगे। शिक्षक बनना कठिन होगा, लेकिन जॉब के अवसर पूर्व की भांति होंगे। नर्सरी टीचर्स के लिए काफी सारे अवसर होंगे भविष्य में। तीन साल से लेकर पाँच साल के बच्चों की शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षकों की आवश्यकता होगी। एक ही शिक्षक सारे स्तर पर पढ़ाएंगे, यह अवधारणा भी बदलती हुई दिख रही है। इसमें भी अलग-अलग लेबल पर टीईटी की परीक्षा होगी।”

शिक्षण के लिए ख़ुद को अपडेट रखने व नया सीखते रहने को दें प्राथमिकता

डॉ. शैलेश कुमार यादव ने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भाषा शिक्षण के ऊपर काफी जोर दिया गया है। इसकेलिए अलग से टीईटी की परीक्षा भाषा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए भी हो सकती है। अपडेट रहना और नई चीज़ों को सीखते रहना भविष्य में शिक्षा प्रोफ़ेसन के लिए काफी जरूरी होगा। शिक्षण के जॉब में बने रहने के लिए समय के साथ खुद को अपडेट करने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का संचालन किया जायेगा। क्षेत्रीय व राजभाषाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों की नियुक्ति को महत्व देने की बात भी कही गई है। दूरस्थ क्षेत्रों में काम करने वाले शिक्षकों के वेतन व भत्ते में बढ़ोत्तरी के साथ-साथ आवासीय सुविधाएं देने को भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में विचार के तौर पर रखा गया है। अच्छा प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को शैक्षिक प्रशासन में भी शामिल किया जायेगा और उनको बेहतर वेतन जैसे प्रावधान का भी जिक्र राष्ट्रीय शिक्षा नीति में किया गया है।”

सेंट्रल यूनिवर्सिटी साउथ बिहार के शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. रविकांत ने परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा,”हम सभी ने एक साल का बीएड किया है। इसके बाद दो वर्षीय बीएड की पढ़ाई शुरू हुई। एनसीएफ़-2005 को बने हुए भी 15 साल हो गये है। एक ऐसी स्थिति बन गई है कि जब तक एनसीईआरटी हमें कुछ नहीं देगी, हम अपने स्तर पर कुछ नहीं करते। एक समय पर एनसीईआरटी ने वैल्यू एजुकेशन को काफी प्रमोट किया। इसके बाद संरचनावाद को लेकर एनसीईआरटी ने चर्चा शुरू की। लेकिन हम अभी भी वहाँ पर अटके हुए हैं। नीति में जितनी भी चीज़ें हैं सब पुरानी हैं, शब्दों का चुनाव नया हो सकता है। नवाचार जैसी चीज को भारतीय परंपरा में स्वीकार करना बेहद मुश्किल हैं।“

‘प्राथमिक शिक्षा के फाउण्डेशन को मजबूत करेगी राष्ट्रीय शिक्षा नीति’

डॉ. रविकांत ने कहा कि हमारे पास साधन संपन्न और साधन विहीन दोनों तरह के स्कूल हैं, लेकिन दोनों स्कूलों के लिए एक तरह की नीति है। सबसे पहली जरूरत है कि सरकार पहले दोनों जगहों को बराबर करे। पटना के डीपीएस स्कूल की तुलना गया के सरकारी स्कूल से कैसे होगी? शिक्षक और पेडागॉजी निजी स्कूलों में आते ही बदल जाती हैं। जब तक सरकारी स्कूलों में बराबर संसाधन नहीं होते, तबतक तुलना करना सही नहीं है। शिक्षा व्यवस्था में दो तरह के शिक्षक हैं चुनाव और अवसर वाले, बॉय चांस व च्वाइस वाली स्थिति अन्य प्रोफ़ेशन में नहीं है, लेकिन दुर्भाग्यवश शिक्षक प्रोफ़ेशन में ऐसा हुआ। बीएड के इंटीग्रेटेड कोर्स में क्यों आए, इस सवाल के जवाब में स्टूडेंट्स कहते हैं कि सर तीन साल के बीए के साथ एक साल में बीएड की डिग्री मिल रही है। लेकिन तीन साल के बीए के बाद दो साल का बीएड करना होता है।”

डॉ. रविकांत ने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 प्राथमिक शिक्षा के फाउण्डेशन को मजबूत करेगी, यह एक बेहद अच्छी बात है। मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान को प्रमुखता देने की जरूरत वर्तमान दौर में है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ जैसी संस्था ने कोविड-19 के दौर में ऑनलाइन शिक्षा को लेकर काफी अच्छे प्रयास किये। इसका एक कारण संसाधनों की उपलब्धता और अनुमति के इंतज़ार में लगने वाला कम समय भी है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि नवाचार करने वाले शिक्षक और लोग शिक्षा व्यवस्था में हतोत्साहित न हों। अच्छा काम करने वाले शिक्षकों के कारण ही शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा काम है। उत्तराखंड में आँगनबाड़ी और प्राथमिक विद्यालय एक ही कैंपस में हैं ऐसे उदाहरणों का अन्य राज्यों में भी विस्तार करना होगा।”

डायट सारनाथ, वाराणसी के प्रवक्ता डॉ. हरगोविन्द पुरी ने सभी प्रतिभागियों व लाइव वेबिनार का हिस्सा बनने के लिए जिले के सभी शिक्षकों व एआरपी व एसआरजी का धन्यवाद करते हुए छठवें दिन की परिचर्चा का समापन किया।

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