नई पहलः बच्चों के लिए सीखने का जरिया बना ‘द एक्सप्लोरर’ का डिजिटल संस्करण

नानकमकत्ता पब्लिक स्कूल

     नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के स्टूडेंट्स ने कोविड-19 के दौर में ‘द एक्सप्लोरर’ का डिजिटल संस्करण निकालने का फैसला किया। (तस्वीर कोविड से पहले की है।)

चिड़ियाओं की गुफ़्तगू, लहरों की बातें, छोटे-छोटे कीड़ों की शरारत, हवा की सरसराहट को “The Explorer” के तीसरे डिजिटल संस्करण में समेटा गया है। मॉनसून के मौसम के बाद तो ऐसा लगता है मानो निर्जीवों में भी जान आ जाती है। हर तरह के पेड़-पौधे, कीड़े-मकौडे़, जीव-जंतुओं को देखकर तो यूं लगता है कि सभी पूरे साल की मस्ती इन्हीं दिनों कर लेना चाहते हैं। इन ही छोटी-छोटी शरारतों को कैमरे में कैद करने का ख़्याल आया।

हम, जो भी देखा उसे कलम से कागज़ पर उतारने की आदत के आदि हो चुके थे। कभी सोच ही ना सके कि बिना लिखे भी अपनी बात कही जा सकती है। दीवार पत्रिका के 6 और हमारे अखबार The Explorer के 3 संस्करण निकालने के बाद मानो हमारा यह प्रयास थम सा गया। कोरोना संकट के कारण अख़बार प्रकाशित करना तो दूर, संपादकीय मंडली की मीटिंग भी नहीं हो पा रही थी। कई साथियों की रचनात्मकता को प्लेटफॉर्म ही नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में नानकमत्ता पब्लिक स्कूल के स्टूडेंट्स ने कोविड-19 के दौर में ‘द एक्सप्लोरर’ का डिजिटल संस्करण निकालने का फैसला किया। इस बारे में रिया चंद लिखती हैं, “जब हमें डिजिटल पत्रिका प्रकाशित करने का सुझाव मिला तो ऐसा लगा मानो कोई अंधेरा कमरा रोशनी की एक किरण से जगमगा उठा है, ठीक वैसे ही हम भी विचारों से भर उठे।”

जैवविविधता पर केंद्रित है ‘द एक्सप्लोरर’ का तीसरा अंक

पहले और दूसरे डिजिटल संस्करण पर काम करने के बाद कुछ अलग करने का विचार आया। आज तक हम अपने अनुभवों को लिखकर उन्हें अपनी आवाज़ देते थे। लेकिन तीसरे संस्करण में हमने अपने विचारों को बोलकर ही व्यक्त करने का निश्चय किया। कुदरत की खूबसूरती को अपने कैमरे में कैद कर उसे लोगों को समझा पाना हमारा उद्देश्य रहा। हमारी पत्रिका “The Explorer” का यह तीसरा संस्करण “Biodiversity” यानी जैव विविधता पर केंद्रित है। साथियों ने अलग-अलग आयामों से अपने आस-पास की जैव विविधता को देखा और उस पर काफ़ी रिसर्च भी की।

 “The Explorer” के तीसरे संस्करण के लिए इस लिंक पर क्लिक करेंः “Biodiversity” यानी जैव विविधता

हम सभी साथियों ने इस कोरोना संकट को एक अवसर के रूप में पाया। हमारे प्रयासों को पाठकों ने सराहा भी और बेहतर करने के सुझाव भी दिए। पूरी संपादकीय मंडली हमेशा पाठकों की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार करती है। इस वीडियो को जरूर देखें और बच्चों के प्रयासों को प्रोत्साहित करें।

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1 Comment

  1. भास्कर चौधुरी October 19, 2020 at 9:28 am

    एक्सप्लोरर का तीसरा संस्करण मैं आज देख पाया। बायोडायवर्सिटी या जैवविविधता पर केंद्रित यह एक्सटेंशन कई कारणों से यूनीक है। आमतौर पर हम शिक्षकों, शोधार्थियों या वैज्ञानिकों को विषय की इतनी गहराई में जाकर बातें करते सुनते हैं पर यहाँ कक्षा छटवीं या सातवीं से लेकर दसवीं तक के बच्चों ने अपनी प्रस्तुतियों में जैवविविधता की तरह अद्भुत विविधता दिखाई है। संपादकद्वय राधा और रिया ने सीड डिस्पर्सल के द्वारा अपने आप उगे पेड़ों गुठेल या बिलोड़ा, कोकलबड़ या सामान्य जलकुंभी और कुछ अन्य पौधों की रोचक जानकारी दी जिनमें पौधों के वैज्ञानिक नाम एवं पारम्परिक औषधीय उपयोग भी शामिल है। सच है कोई भी चीज अपने आप में परफेक्ट या पूरी नहीं होती यह बात प्रकृति और हम पर पूरी तरह से लागू होती है।
    *अगली पेशकश में साहिल ने समतल क्षेत्र में स्थित नानी के घर से लेकर पहाड़ पर घर जहाँ वह माता-पिता के साथ रहता है की दिलचस्प यात्रा करवाई। साल, सागवन, चीड़ आदि की ऊंचाई, मजबूती से लेकर औषधीय गुणों की बहुत सुंदर ढंग से चर्चा की…
    *रेडियो वॉयस की धनी दीपिका ने अपने गाँव के बारे में बड़ी अच्छी बात बताई – ” यहाँ लोगों की नींद घड़ी वाले अलार्म से नहीं बल्कि चिड़ियों की आवाज़ – नेचुरल अलार्म से खुलती है। वाह! घिनौरी – गौरय्या का दूसरा नाम मुझे नया और सुंदर मालूम पड़ा, गुगुति, मैंना और कुछ अन्य पक्षियों के बारे में जानकर, उनका गान सुनकर सचमुच मज़ा आ गया।
    *अर्थवर्म के बारे में आँचल की चिंता में हमारी सरकारें शामिल होतीं तो आज सैकड़ों एकड़ ज़मीन हर रोज़ बंजर न होते… सच बहुत ही ज़रूरी विषय उठाया है तुमने आँचल। बधाई तुम्हें। इसी तरह गोबर के छोटे से ढेर की अलग दुनिया के बारे में, मृत जानवरों के डिकम्पोजीशन में माइक्रोऑर्गेनिज़्म के रोल के बारे में, काई जैसे बिना जड़ों की उपयोगिता के बारे में, लताओं, फंगाई और फूलों के बारे में राधा, रिया, कृति, अमृतपाल, हर्षिका, करमवीर, रोहित और दीपांशु ने बहुत महत्वपूर्ण और ज़रूरी जानकारियाँ साझा की।
    *निधि राणा ने थारू समुदाय से जुड़ी कांस पौधे से झाड़ू के बनाने की विधि का वर्णन कर हमें समृद्ध किया साथ ही आगाह भी किया कि किस तरह बदलते समय और समाज में बाजार के प्रभाव में जहाँ आमजन प्राकृतिक रूप से उपलब्ध चीजों से बने ज़रूरत के घरेलू सामानों की जगह कृत्रिम चीजों को तरजीह देने लगे हैं।
    *खुशमन ने पर्ल फार्मिंग के बारे में अपने पिता के व्यवसाय से जोड़कर जो बातें बताई वह मेरे लिए बिल्कुल नई और बेहद दिलचस्प थीं।

    डाक्यूमेंट्री देखने-सुनने के साथ साथ मैंने कुछ नोट्स भी बनाए। मुझे लगा काश नानकमत्ता स्कूल का एक विद्यार्थी मैं भी बन जाऊं और राधा, रिया, साहिल, दीपिका, आँचल, कृति, अमृतपाल, हर्षिका, करमवीर, रोहिल, दीपांशु, निधि और खुशमन के साथ मैं भी खुशी खुशी प्रकृति की गोद में उठूँ- बैठूँ, खेलूं-कूदूं, स्कूल पढ़ने जाऊँ।

    *सम्पूर्ण डाक्यूमेंट्री के दौरान उपयोग किए गए बहती नदी का संगीत और कुछ अन्य धुनों ने मन मोह लिया।

    दि एक्सप्लोरर के बच्चों की पूरी टीम और इससे जुड़े साथियों को हार्दिक बधाई और अनंत अशेष शुभकामनाएँ।

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