पुस्तक चर्चाः एक शिक्षक के अनुभवों का जीवंत दस्तावेज़ है ‘अध्यापकीय जीवन का गुणनफल’

आज़ाद भारत में स्कूली शिक्षा के प्रसार को समझने के लिए प्रायः शिक्षा आयोगों और नीतिगत दस्तावेज़ों को खंगाला जाता है। बात मुदालियर कमीशन से शुरू होकर कोठारी कमीशन के रास्ते राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षा के अधिकार क़ानून तक पहुँचती है। शिक्षा के प्रसार को देखने का यह एक नज़रिया है जिसमें सबसे ऊपरी मंजिल की खिड़कियों और झरोखों से शिक्षा की ज़मीन की पैमाइश करने की कोशिश होती है। आधुनिक शिक्षा के प्रसार को देखने का एक दूसरा ज़मीनी तरीका भी हो सकता है। अगर शिक्षा की प्रक्रिया में शामिल और इसके जरिए किसी हद तक सामाजिक हैसियत हासिल कर चुके लोग अपने जीवन के अनुभवों को साझा करें तो शायद आज़ाद भारत में शिक्षा के प्रसार की इस प्रकिया का कुछ अंतरंग परिचय मिल सके। इसे हाल में प्रकाशित श्याम नारायण मिश्र की आत्मकथा-‘अध्यापकीय जीवन का गुणनफल’ को इस दृष्टिकोण से पढ़ा जा सकता है।

1947 में जब अपना देश आज़ाद हुआ

वर्ष 1947 में जब श्याम नारायण मिश्र सातवीं कक्षा में थे, तब देश आज़ाद हुआ था और गणेश मिडिल स्कूल, पुपरी, सीतामढ़ी  के संस्थापकों ने विद्यार्थियों के बीच तब मिठाइयाँ बाँटी थीं। 1951-52 में जब उन्होंने मैट्रिकुलेशन का इम्तिहान दिया तब देश में संविधान लागू हो चुका था और देश का पहला आम चुनाव हो रहा था। नागरिक-शास्त्र और इतिहास की किताबें बदल रही थीं और विद्यार्थियों के सपने भी। एल. एस कॉलेज, मुजफ्फरपुर से इंटरमीडियट की परीक्षा पास करने के बाद श्याम नारायण मिश्र ने विज्ञान शिक्षक के रूप में नौकरी शुरू की और अध्यापन में रमते चले गए। बीच में उन्होंने कुछ समय के लिए केंद्र सरकार के डाक-तार विभाग में भी काम किया, लेकिन वहाँ उनका मन नहीं लगा तो डाक-तार विभाग से लौटकर वे फिर से अध्यापन में जुट गए।

वर्ष 1950 के दशक में जब उन्होंने अध्यापक के रूप में काम करना शुरू किया तो वह राष्ट्रनिर्माण और नई संस्थाओं के गठन का दौर था।  वे कौन लोग थे जो तब सुदूर गाँवों और क़स्बों में मिडिल और हाई स्कूलों की स्थापना कर रहे थे? उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक व राजनीतिक अवस्थिति के बारे में हम क्या जानते हैं? हमें पता है कि 1 अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो जाने के बाद भी आज महिलाएँ, दलित, आदिवासी और ग़रीब मुसलमानों की बड़ी आबादी हाई स्कूल तक भी नहीं पहुँच पा रही है, कॉलेज और विश्वविद्यालय की बात तो जानें ही दें।

लेकिन एक समय ऐसा भी था जब तथाकथित ऊँची जाति के छोटे और मझोले किसान परिवार के लड़कों के लिए भी प्राथमिक कक्षा से आगे बढ़ने का रास्ता आसान नहीं था। उन परिवारों के  लिए बच्चों को प्राथमिक कक्षा से आगे पढ़ना ‘डिफ़ॉल्ट चॉइस’ नहीं हुआ करता था जैसा कि आज है।आज़ादी के आसपास इन परिवारों से कुछ छिटपुट लडके हाई स्कूल तक पहुँचने लगे और इन्हीं सामाजिक समूहों के अपेक्षाकृत प्रभावशाली लोगों ने गाँवों में हाई स्कूल और कॉलेजों की स्थापना शुरू की। भारत में शिक्षा के प्रसार की यह कहानी लिंग, जाति और वर्ग निरपेक्ष कहानी नहीं है, बल्कि लिंग जाति और वर्ग सापेक्ष कहानी है, फिर भी विमर्श के स्तर पर इसने सावर्जनिक शिक्षा का एक आख्यान खड़ा किया जिसमें सैद्धांतिक और कुछ हद तक व्यवहारिक स्तर पर भी समावेशन की गुंजाइश थी।  नीचे श्याम नारायण मिश्र की आत्मकथा से एक अंश प्रस्तुत है।

सब धरती कागज करूँ

मेरा गाँव चन्दौना अब कॉलेज और रेलवे हाल्ट के कारण जाना जाता है। मेरे बचपन में यह दरंभगा जिले के उत्तरी-पूर्वी कोने में बसी हुई एक छोटी सी बस्ती थी। गाँव में प्रायः सभी जातियों के लोग रहते थे और मुख्य पेशा खेती-किसानी ही था। गाँव में प्रायः छोटे और कुछ मझोले किसान थे। यह रैयतों का गाँव था। इस गाँव के जमींदार नेपाल से सटे सुरसंड में रहते थे जिसे उन दिनों सुरसंड इस्टेट के नाम से जाना जाता था। लगान वसूली की सुविधा के लिए गाँव के ही एक मझोले किसान परिवार को जेठ रैयत नियुक्त कर दिया गया था। कुल मिलाकर चन्दौना जमींदारी ठसक वाला नहीं, किसानी सहजता वाला गाँव था। लोगों में आमतौर पर मेलजोल और प्रेम था। कच्ची सड़कें, फूस और मिट्टी के बने घर, घर से खेत और खेत से सड़क तक निकलती पगडंडियाँ, लोगों के दलान में चारा खाते मवेशी आदि गाँव के जीवन को एक सहज गति देते थे।

गाँव का स्कूल भी, गाँव के इसी सहज जीवन से जुड़ा था। मिट्टी की दीवारें और और फूस की छत से बना स्कूल का कमरा। विद्यालय में महावीर जी का एक झंडा था। प्रत्येक शनिवार को स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे घर से गुड़ और चावल लेकर आते। महावीर जी की पूजा होती थी, उनकी सामूहिक प्रार्थना की जाती थी और उसके बाद गुड़ और चावल का प्रसाद बँटता था। स्कूल में एक ही मास्टर साहब थे जो योग्य और लगनशील शिक्षक थे। स्कूल में आसपास के गाँव के किसान परिवारों के बच्चे पढ़ने आते थे। प्रायः चौथी-पाँचवीं तक बच्चों को पढ़ना-लिखना, हिसाब-किताब आ जाता था। उसके बाद वे स्कूल छोड़कर किसानी में लग जाते थे।

उन दिनों स्कूल में अक्षर ज्ञान करवाने की ख़ास पध्दति थी| सबसे पहले नीचे ज़मीन पर ही गाविस मिट्टी से लिखना होता था। गाविस एक प्रकार की सफेद चिकनी मिट्टी होती थी जिससे चाक जैसा काम लिया जाता था। भूरी या धूसर ज़मीन पर चिकनी गाविस मिट्टी से लिखने पर अक्षर उभर आता था। गाविस मिट्टी से जमीन पर लिखते हुए जब कुछ अभ्यास हो जाता था तो काठ की पाटी पर लिखने की शुरूआत होती थी। मेरे घर वालों ने भी लकड़ी की एक पाटी बनवा कर दिया जिसे मैं स्कूल लेकर जाता था। पाटी को पहले स्याह रंग से रंगा जाता था और फिर उसपर भट्ठे से लिखा जाता था। स्लेट-पेंसिल, ब्लैकबोर्ड, चाक यह सब आगे की चीज थी।

पहली पंक्ति लिखने से पढ़ना सीखने तक की यात्रा

पाटी पर मैंने भी लिखना शुरू किया – रामा गति देह सुमति। यह प्रार्थना की एक पंक्ति थी। पहली कक्षा के बच्चों को पहले यही लिखने का अभ्यास करना होता था। इस पंक्ति का मतलब था कि हे राम मेरे जीवन को गति दो, मुझे सुमति दो। जब इस बार-बार लिखने के बाद बच्चे को लिखने का अभ्यास हो जाता था तब ‘क वर्ग’, ‘च वर्ग’ आदि का ज्ञान करवाया जाता था। गणित में जोड़ना और घटाना सीखना होता था। जोड़ना और घटाना सीखने के लिए बच्चे को घर से मिट्टी की छोटी-छोटी गोली बनाकर लाना होता था।

इन्हीं गोलियों को जोड़ते और घटाते हुए बच्चे गणित की आरम्भिक चीजें सीख लेते थे। फिर एक से सौ तक की गिनती और पहाड़ा आदि का मौखिक और ज्ञान करवाया जाता था। छुट्टी से ठीक पहले एक से सौ तक की गिनती और पहाड़े को कोरस में बोलना पड़ता था। इसमें सभी कक्षाओं के बच्चे शामिल होते थे। एक बच्चा आगे-आगे बोलता था। बाकी सभी बच्चे उसके पीछे दुहराते थे। बच्चों की आवाज़ में खनक होती थी क्योंकि इसके ठीक बाद छुट्टी मिल जाने का उत्साह होता है। छुट्टी होते ही सभी बच्चे स्कूल से गाँव की पगडंडियों पर दौड़ते-भागते, गिरते-पड़ते नज़र आते।

अपने गाँव के स्कूल मैं लगभग दो साल गया| इस दौरान मुझे लिखना-पढ़ना, जोड़ना घटाना आ गया। दो साल की इस पढाई के बाद मैं माँ के साथ ननिहाल चला गया।

हासिल हुआ जीवन का गुणनफल

उस ज़माने में बेटियाँ जब ससुराल से मायके जाती थीं तो साल-दो साल नहैर में ही रह जाती थीं। बार-बार और कम समय के लिए मायके जाने का रिवाज़ नहीं था। तब ससुराल, नैहर के अलग मायने थे और बेटी और बहू की विदाई से जुड़ी कई सारी प्रथाएँ थीं। मेरी माँ जब अपने नैहर बेहटा गईं तो दो साल के लिए वहीं रह गईं। मैं छोटा था इसलिए मैं भी माँ के साथ गया।

इस तरह गाँव के स्कूल में साल-दो साल पढ़ने के बाद मैं ननिहाल चला गया और अगले दो साल के लिए मैं उसी गाँव के प्राइमरी स्कूल में ही जाने लगा। ननिहाल में गुजारे उन दो सालों की वैसे तो बहुत सारी यादें आज भी स्मृतिपटल पर उभर आती हैं, लेकिन स्कूल से जुड़े एक प्रसंग की याद सबसे गहरी है। हुआ यूँ कि जब मैं बेहटा के विद्यालय में पहुँचा तो गुरूजी गणित में भाग बनाना सीखा रहे थे। अपने गाँव के स्कूल से मैं जोड़ना और घटाना सीखकर तो गया था, लेकिन मुझे गुणा करना और भाग देना नहीं आता था। हालाँकि पहाड़े मुझे सारे याद थे। गुरूजी स्लेट पर भाग का सवाल लिखवा देते थे और सभी विद्यार्थियों को भाग बनाकर गुरूजी को दिखाना होता था। मुझे भाग बनाना तो आता नहीं था, लेकिन इसी बीच स्कूल के एक सहपाठी विन्देश्वर से दोस्ती हो गई। विन्देश्वर भाग बनाना सीख चुका था। वह सवाल हल करता और मैं उसकी पाटी से सवाल उतार लेता।

गुरूजी सख्तमिजाज थे। सवाल हल करने में गलती हो जाए तो पिटाई भी होती थी। इसलिए जब मैं विन्देश्वर की पाटी से सवाल उतार लेता तो वह अकसर मुझे पहले गुरूजी के पास भेजता। सवाल का हल अगर सही हो तब विन्देश्वर बाद में गुरूजी के पास अपनी पाटी लेकर पहुँच जाता। अगर हल करने में गलती निकल आती तो कई बार मेरी पिटाई भी हो जाती थी। यह क्रम कुछ समय तक चलता रहा। फिर एक दिन हम दोनों अपनी-अपनी पाटी पर सवाल का हल लिखकर बैठे थे। विन्देश्वर उस दिन भी मुझे गुरूजी के पास जाने के लिए उकसा रहा था, लेकिन मैं गुरूजी से पिटने के डर से हिलने के लिए तैयार नहीं था। अन्त में हारकर विन्देश्वर गुरूजी के पास गया।

सवाल में थोड़ी गलती थी तो गुरूजी विन्देश्वर को बताने लगे। मैं चुपचाप गुरूजी के पीछे जाकर खड़ा हो गया। गुरूजी को सवाल हल करते हुए देखा तो एक बात तो समझ में आ गई कि भाजक की तुलना में शेष को कम होना चाहिए। गुणा करना नहीं आता था, लेकिन यह मैंने अंदाज लगा लिया कि भाजक को तबतक बार-बार जोड़ते जाना है जबतक वह भाज्य से बड़ा नहीं होने लगे। ये दो बातें समझ में आ गईं तो मैं थोड़ा समय लेकर भाग के सवाल हल करने लगा। भाजक को बार-बार जोड़ते हुए यह भी थाह लग गया कि बार-बार जोड़ने के बदले पहाड़े भी पढ़े जा सकते हैं। पहाड़े सारे याद थे। एक से बीस तक के पहाड़े तो याद थे ही, डयोढा, सवैया सब याद थे। गाँव के स्कूलों में तब पहली-दूसरी कक्षा तक बच्चों को पहाड़े आदि याद हो जाते थे क्योंकि रोज छुट्टी के पहले इन्हें समूह में एक साथ बोलना होता था।

जब स्कूल में जैसे-तैसे मैंने भाग बनाना शुरू कर दिया तो एक दिन मैंने अपने मामा से कहा कि मुझे गुणा करना सिखा दीजिए| मेरे उस मामा को गाँव में गणित का अच्छा विद्यार्थी माना जाता था| उन्होंने मुझे आसानी से गुणा करना सीखा दिया| एक बार गुणा करना आ गया तो गुणा-भाग के सवाल हल करने में मेरा मन लगने लगा। धीरे-धीरे मैं गणित का अच्छा विद्यार्थी बन गया। बाद में स्थिति ऐसी भी आई जब कभी-कभी विन्देश्वर मेरी पाटी से हल किया हुआ सवाल उतारने लगा। मेरा आत्मविश्वास बढ़ा| आगे अपने ननिहाल बेहटा गाँव के विन्देश्वर चौधरी से मेरी आजीवन मित्रता रही।

पुस्तक के बारे में संक्षिप्त जानकारी

पुस्तक का नामः अध्यापकीय जीवन का गुणनफल- श्री श्याम नारायण मिश्र

संपादन – मनोज कुमार

प्रकाशनः अनन्य प्रकाशन दिल्ली

कुल पृष्ठ सँख्या – 190 , मूल्य – 250

यह रोचक किताब अमेज़न पर उपलब्ध है, जिसे इस लिंक पर क्लिक करके मंगा सकते हैं। इस किताब को पढ़ने के बाद अपने अनुभव जरूर साझा करें।

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1 Comment

  1. पुरानी शिक्षा पद्धति की उपयोगिता आज भी बरकरार है , समय बदला , लोग बदले , शिक्षा के मायने भी विस्तृत हुए , लेकिन मूल भावना आज भी वहीं नैतिकता , इंसानियत । अनुभवों की एक अमूल्य पोथी है ये बुक । बहुत बहुत बधाई सर जी ।

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