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डायरीः बच्चे की पसंद और माँ के तर्क के बीच रेफरी की भूमिका में एक लड़की

totto-chanबचपन में क्या कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आप घर के किसी बड़े के साथ बाज़ार गए और आपको वहां कोई चीज पसंद आ गयी। आप उसे बड़े ही मन से खरीदना चाहते थे। रंग देख लिया , प्रिंट देख लिया ,आकार देख लिया , डिजाइन भी देख ली। पूरा मन बना लिया कि अब तो चीज़ मेरे पास होनी ही चाहिए।

तभी आवाज सुनाई देती है , “अरे इसके जैसा ही तो हैं न वो हरी वाली टीशर्ट जो दादा जी लाये थे। और भी बहुत सारी ऐसी बातें। तो चलिए याद करते हैं कि हम लोगों को ऐसी कौन –कौन सी बाते याद आ रही हैं।

बच्चों के फ़ैसले कौन लेता है?

याद करते हैं कि उस जमाने को जब मम्मी ,बुआ , मामा ,मामी ,दादी के पसंद के आगे खुद के पसंद की कोई पूछ भी नहीं होती थी। जब हमारे ऊपर कौन सा कपड़ा अच्छा लगेगा, कौन सी चीज़ हमारे लिए सही होगी जैसी हर बात दुसरे ही तय किया करते थे। हाँ ..कभी –कभी हमारी बातें भी सुनी जाती थीं और मान ली जाती थीं, मगर कितनी बार?

थोडा सा सोचिए कि कैसा लगा था उस वक़्त ? थोड़े ही समय मन बेचैन हुआ हो था मगर हुआ तो था ही।

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बहुत छोटा सा सवाल है कि हम बच्चों की पसंद को कितना महत्व देते हैं।  या उनकी पसंद को हम 10 में से कितने नंबर दे सकते हैं ? हाँ ये बात सच हैं कि हर बच्चा ये नहीं समझ पाता कि जो सामान उसने पसंद किया हैं वो कितने दिन चलेगा ? कितना महंगा –सस्ता है ? कोई विशेष छुट है या नहीं? उसके पास उसी तरह के घर पर और कितने खिलौने ,कपड़े हैं? वो ये सारी बातें नहीं सोचता उस वक़्त ,जब उसे कुछ पसंद आ जाता है। क्योकि हर किसी के लिए पसंद का पैमाना अलग-अलग होता है, है न? यही बात बच्चों के लिए लिए भी लागू होती है।

हम सबके साथ कभी न कभी ऐसा कुछ तो जरुर हुआ ही होगा। चलिए मिलकर याद करते हैं।

फेमली शॉपिंग में रेफरी वाली भूमिका

तो हुआ कुछ यूँ कि अभी कुछ दिन पहले ही मैं एक शॉपिंग मॉल में थी। आराम से घूम रही थी। बहुत भीड़ थी उस दिन। ऐसा लग रहा था कि बच्चों का सारा हुजूम आज वहीं उमड़ आया है और आए भी क्युं न गरमी की छुट्टियाँ जो चल रहीं थी। कोई पापा-मम्मी के साथ , कोई दादा के साथ, तो कोई पुरे परिवार के साथ। सब लोग मशगुल थे खरीदारी करने में। कोई कपड़े देख रहा था , कोई जूते , तो कोई कुछ खाने की चीजें देख रहा और इन सबके बीच मैं , सबको देखते हुए अपना समय बिता रही थी। लोगों को इस तरह से देखना अच्छा भी लग रहा था।

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अचानक से मुझे महसूस हुआ की कोई मेरे पीछे-पीछे आ रहा हैं, या शायद किसी ने आवाज दी। मुड़कर देखा तो समझ नहीं आया। बहुत से लोग थे न। खै़र मैं अपनी दुनिया में खोई हुई थी। तभी किसी ने कहा, “सुनिए ? और मैं जब पीछे मुड़ी तो देखा दो बच्चों के साथ उनकी मम्मी खड़ी थी। काफी परेशान ,हाथों में 5-6 अलग-अलग कपडे़ उनके बच्चों के लिए |

मैंने पूछा – जी ?

बच्चे की मम्मी ने बिना रुके एक सांस में बोलीं, “आप बताईये न इन दोनों में से कौन सी टी-शर्ट ज्यादा अच्छी है ?” इस सवाल के दौरान दोनों बच्चे मेरे चेहरे के भाव पढ़ रहे थे। बड़ा वाला बच्चा तो इस तरह मुझे देखे जा रहा था जैसे मैं उसके लिए कोई बहुत ही बड़ा फैसला करने वाली हूँ| छोटा वाला बच्चा एक हल्की सी स्माइल के साथ और मम्मी की आँखों की बेसब्री साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी।

मैंने कहा अरे …आपको मेरे से पूछने की क्या जरुरत ? जिसके लिए आप ये खरीदना चाहते हो वो तो आपके साथ ही हैं।

भारत में बहुभाषिकताबच्चा ..अभी भी परेशान सा मुंह बनाये हुए था |

मम्मी ने कहा – नहीं आपकी हेल्प चाहिए तभी हम ये फाइनल करेंगे की कौन सा लेना हैं ?

मम्मी मेरे तरफ देख रही थी और मैं बच्चों की तरफ |

हलांकि समझ तो मैं गयी ही थी कि उसे कौन सा टी-शर्ट पसंद आया है |

बच्चे के पक्ष में हुआ फ़ैसला

बड़े आत्मविश्वास के साथ मैंने कहा – ये पीला वाला , स्लीवलेस तो बहुत ही ज्यादा अच्छा लग रहा है|

इतना बोलना था कि बड़े वाले बच्चे ने माँ के हाथ से फुर्ती के साथ से वह टी-शर्ट खींची और बोला – देखो मैं तो पहले ही कह रहा था। आप ही न ?

Shopping-pictureमेरी सवालिया नज़रो को जवाब देते हुए …उस बच्चे ने कहा – दीदी , मम्मी मुझे ये टी-शर्ट नहीं लेने दे रही थीं। क्योकि पीला रंग मेरा फेवरेट हैं और इस रंग के बहुत सारे कपडे़ हैं मेरे पास।

तभी मम्मी  ने बोला – की अरे क्या बताऊ ?

मैंने कहा – देखिये न सच में उसे ये रंग कितना पसंद हैं इसी रंग की टी-शर्ट पहन कर आया है आपके साथ।

बच्चा खुश ,मम्मी भी मिलीजुली खुश और मैं तो बहुत ही खुश।

yashswi

(लेखक परिचयः यशस्वी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए किया है।इसके बाद उन्होंने गांधी फेलोशिप में दो वर्षों तक गुजरात के सरकारी स्कूलों में प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास के लिए काम किया। यशस्वी को बच्चों से बात करना और उनके सपनों व कल्पनाओं की दुनिया को जानना बेहद पसंद है।

यह पोस्ट आपको कैसी लगी, साझा करिए एजुकेशन मिरर के साथ और लिखिए कमेंट बॉक्स में अपनी राय।)

 

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3 Comments on डायरीः बच्चे की पसंद और माँ के तर्क के बीच रेफरी की भूमिका में एक लड़की

  1. अभिजीत // June 23, 2017 at 8:11 pm //

    बच्चों का मन कोमल होता है । किसी पुष्प की तरह । उनके निश्छल मन पर किसी प्रकार का बाह्य आघात दबाब उनके मानसिक तनाव में डाल देती है । उनके विचार को सकारात्मक सांचे में ढालने के लिए उनकी एक बार आवश्य सुना जाना चाहिये ।

  2. अपनी राय साझा करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया अरुण।

  3. Arun ranjan // June 18, 2017 at 6:33 pm //

    बेहद शानदार लेखनी, बच्चे के विचार को जैसे उकेर दिया गया हो।

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