Trending

आज नु गुलाब कौन है?

सुबह का समय। 92db0-dscn7926स्कूल की प्रार्थना सभा ख़त्म  हो जाने के बाद रोज की तरह स्कूल की प्रिंसिपल ने पूछा – आज नु गुलाब …? यानि आज का गुलाब कौन हैं? सब बच्चें एक दुसरे का नाम बता कर – नंदिनी , भावेस हैं टीचर।

तभी प्रिंसिपल की नज़र बच्चों की भीड़ में बैठी हुयी अच्छी वेश –भूषा में ,चमकते हुए तीसरी में पढने वाली  तेजल पर गयी और उन्होंने कहा –की तेजल हैं आज का गुलाब।

प्रिंसिपल के इतना कहते ही सारे बच्चों की नजरें तेजल की ओर घूम गयीं। बच्चों के हाथ बस ताली  बजाने  के लिए उठे ही थे कि इतने में बहुत ही चंचलता के साथ तेजल खड़ी  हुई और कहा, “न मारू बाल तो छुट्टो छे टीचर।”

यानि तेजल ने कहा कि मेरे बाल तो खुले हुए हैं, मैं आज का गुलाब कैसे हो सकती हूँ। आज का गुलाब तो किसी और को होना चाहिए। तेजल का जवाब इसलिए ध्यान खींचता है कि हर बच्चे की चाहत होती है कि वह आज का गुलाब बने। जबकि तेजल चाहती है कि आज का गुलाब तो किसी और को बनना चाहिए।

पढ़िएः मछलियां साथ क्यों रहती हैं?

क्या है आज का गुलाब?

गुजरात में म्युनिसिपल स्कूलों में पूरे वेश और साफ-सफाई के साथ आने वाले बच्चों को उस ‘आज का गुलाब‘ बनाया जाता है ताकि बच्चों को भी साफ-सफाई के साथ स्कूल आने की प्रेरणा मिले।

स्कूल में रोज़मर्रा होने वाली इसी प्रक्रिया में जब तेजल को बुलाया गया तो उसने ऐसा जवाब दिया क्योंकि उसके मन में ‘आज का गुलाब’ की ऐसी छवि है कि ऐसी लड़की जो स्कूल में पूरे वेश में आई है और जिसकी चोटी बनी हुई है।

यानि तेजल के मन में भी ‘आज के गुलाब’ की एक ऐसी मानक छवि मौजूद है, जिससे वह कोई समझौता नहीं करना चाहती। इसीलिए वह कहती है, “न मारू बाल तो छुट्टो छे टीचर।” इसका आशय है कि मेरे बाल तो खुले हुए हैं। उनमें चोटी नहीं है।

पढ़िएः अब दूसरा क्या करने का?

राजस्थान कैसे पहुंची ‘मन की बात’?

डाइट प्रिंसिपल आभा मेहता जी से एक मुलाकात

राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले के एक सरकारी स्कूल में एडेप्स कार्यक्रम के दौरान मौजूद डाइट प्रिंसिपल आभा मेहता।

बाद में ऐसी ही पहल राजस्थान के कुछ स्कूलों में प्रयोग के तहत एडेप्स स्कीम के तहत की गई थी। इसके लिए शिक्षकों के एक दल ने गुजरात के स्कूलों का दौरा किया और जिन गतिविधियों को यहां पर लागू किया जा सकता था, उसकी सूची तैयार की थी। इसका नेतृत्व डाइट प्रिंसिपल आभा मेहता जी ने किया।

इसे शुरुआत में प्रयोग के तौर पर डूंगरपुर के 25 स्कूलों में लागू किया गया था। इसके काफी अच्छे परिणाम सामने आए। इसमें ‘आज का गुलाब’ के साथ-साथ मन की बात, खोया-पाया, पंक्षी-परिंदा जैसी अन्य गतिविधियों को भी शामिल किया गया था।

बच्चों की सबसे पसंदीदा गतिविधि मन की बात थी, जिसमें स्कूल के बारे में उनकी लिखी बातों को स्कूल की असेंबली में पढ़ा जाता था और इसका जवाब प्रधानाध्यापक या या कोई शिक्षक देते थे। बाद में इसे पूरे डूंगरपुर ज़िले में बाल मित्र स्कूल के नाम से लागू किया गया। इसमें स्कूल की विभिन्न गतिविधियों में बच्चों को नेतृत्व करने और उनकी भागीदारी बढ़ाने को काफी प्रोत्साहित किया गया था।

पढ़िएः यशस्वी की लिखी कविता ‘रंग देते हैं आज़ादी’

yashswi(लेखक परिचयः यशस्वी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए किया है।इसके बाद उन्होंने गांधी फेलोशिप में दो वर्षों तक गुजरात के सरकारी स्कूलों में प्रधानाध्यापक नेतृत्व विकास के लिए काम किया।

यशस्वी को स्कूली बच्चों से बात करना और उनके सपनों व कल्पनाओं की दुनिया को जानना बेहद पसंद है। )

Advertisements

%d bloggers like this: