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शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

चर्चा:शिक्षकों को ‘आदेश की चाभी’ से चलने वाला खिलौना न बनाएं

सीतापुर की घटना पर शिक्षक क्या सोच रहे हैं?

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अमर उजाला में प्रकाशित एक ख़बर के मुताबिक, “सीतापुर में पिसावां विकासखंड के एक स्कूल में शादी की दावत देना दो शिक्षकों को महंगा पड़ गया। एमडीएम डीसी की जांच में विद्यालय में पनीर की सब्जी व पूड़ी बनने का पता चला है। इस पर बीएसए ने प्रधानाध्यापक व सहायक अध्यापक को निलंबित कर दिया है। मामले की जानकारी होने के बावजूद उच्चाधिकारियों को सूचना नहीं देने पर बीईओ को नोटिस दिया गया है।”

इस आशय में होने वाली विभागीय कार्यवाही का पत्र सार्वजनिक होने के बाद विभिन्न जिलों के व्हाट्सऐप समूह में शेयर हो रहा है। शिक्षकों के बीच चर्चा हो रही है कि इतनी कठोर क़दम उठाने की जरूरत नहीं थी। उनका यह भी कहना है कि शिक्षकों के बीच आपसी एकता न होने के कारण यह स्थिति है। एक शिक्षक लिखते हैं, ”

इस लेख में
  1. शिक्षकों की राय क्या है?
  2. शिक्षकों की बात सुनी जानी चाहिए
  3. शिक्षकों को ‘आदेश की चाभी’ से घूमने वाला खिलौना न बनाएं

शिक्षकों की राय क्या है?

इस खबर के कारण शिक्षक समुदाय काफी दुखी है और नाराज भी। शिक्षकों के इस दर्द से एजुकेशन मिरर की टीम पूरी सहानुभूति रखती है। जहां भारत का भविष्य बन रहा है, वहाँ भी अगर किचन में क्या पक रहा है, मात्र इसकी चिंता होती रही तो सुधार और बदलाव के बड़े-बड़े प्रयास छोटी-छोटी लड़ाइयों में उलझकर रह जाएंगे।

इसलिए आप सभी से गुजारिश है कि अपनी सकारात्मक ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दें। अपनी बात जरूर कहें। शिक्षकों को निशाना बनाने और उनके स्वाभिमान का दमन करने के हर तरीके का विरोध होना चाहिए।

शिक्षकों की बात सुनी जानी चाहिए

स्कूल भी एक समुदाय है, यह बच्चों व शिक्षकों का दूसरा घर है तो खुशी और ग़म साझा करने का स्पेश होना चाहिए। आपस में मिलने जुलने और खाने-पीने का ही तो कार्यक्रम रखा गया था, किसी राजनीतिक दल की रैली का आयोजन तो नहीं हो रहा था।

एक पुकार पर जो शिक्षक मन की बात के लिए रेडियो और टीवी का जुगाड़ कर देता है, आज की व्यवस्था में उसी का आवाज़ अनसुनी हो रही है। दुनिया के जितने भी विकसित देश हैं, सब जगह शिक्षकों का सबसे ज्यादा सम्मान होता है, उनके काम को राष्ट्रीय महत्व के जरूरी काम की तरह देखा जाता है।

शिक्षकों को ‘आदेश की चाभी’ से घूमने वाला खिलौना न बनाएं

शिक्षक को हम शिक्षक ही रहने दें, हमारी तरफ से बहुत बड़ा योगदान होगा। उसे अगर हम आदेश की चाभी से घूमने वाले खिलौने की तरह पेश आने लगेंगे तो फिर शिक्षा, शिक्षा न होकर, एक उत्पाद बन जायेगी। छात्र/छात्राओं व शिक्षक/शिक्षिका के रिश्ते लेन-देन वाले विचार की बुनियाद पर शिफ्ट हो जाएंगे।

जो उन बच्चों के विकास के लिए बाधक है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, संसाधन विहीन हैं और निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा का बोझ नहीं उठा सकते। इस घटना का अपवाद बना रहना एक उम्मीद है और उदाहरण बन जाना पूरी व्यवस्था की हार है,जिसको टालने की हर मुमकिन कोशिश जरूर होनी चाहिए।

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संतोष
संतोष
8 years ago

ऐसे अधिकारियों को तो एक शिक्षक ही अधिकारी बनाया है । शिक्षक से बड़ा अधिकारी हो ही नहीं सकता , भले शिक्षक से वेतन बड़ा अधिक खाता हो ।

एक शिक्षक इतना बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता है और सजा भुगत रहा है । मुझे बड़ा अफसोच है । ऐसे प्रशासन के विचारों से ही शिक्षा का स्तर नीचे चला जा रहा है ।
परंतु उस शिक्षक को हिम्मत नहीं हारना चाहिए । जीत उसी की होगी । समाज और देश को बनाने वाले की हार हो ही नहीं सकता ।

rachnayadav
8 years ago

पता नही ऐसा क्यों हो रहा है, जहां तक मेरा ज्ञान है समुदाय में जब भी कोई भोज होता है तो भी निमंत्रण पर स्कूल से बच्चे खाना खाने के लिए भोज में भेजे जाते है। और यह एक सामान्य बात है इसलिए मैं समझती हूं स्वीकार्य भी होगी तो फिर स्कूल में बच्चो को अपनी ख़ुशी को सेलिब्रेट करते हुए भोज देना गलत क्यों हो गया? क्या भोजन की quality का कोई issue hai.

लेखक

वृजेश सिंह

संस्थापक-संपादक, एजुकेशन मिरर

Founder of EducationMirror.org and education leader with 10+ years of experience driving impactful FLN and system-level reforms, combining field insights and program expertise from organizations like Piramal Foundation, STIR Education, Tata Trusts, Room to Read, BBC Hindi, and Azim Premji Foundation.

Through EducationMirror.org, I aim to bridge the gap between classroom realities and scalable solutions by curating practitioner-driven insights, strengthening foundational literacy and numeracy (FLN), and amplifying voices from the field to influence practice and policy.

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