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शिक्षा क्षेत्र की सुर्ख़ियों पर एक नज़रः2013

साल 2013 को शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों के लिए याद किया जाएगा. प्राथमिक शिक्षा की अगर बात करें तो जाने वाला साल 2013 काफ़ी बुरा रहा. नर्सरी स्कूलों के लिहाज से बीती साल जाते-जाते ख़ुशियों की सौगात दे गया. दिल्ली के उप-राज्यपाल नजीब जंग ने नर्सरी स्कूलों में मैनेजमेंट कोटा समाप्त करने समेत कई अहम बदलाव किए.

इससे दिल्ली वासियों को नए साल के पहले का तोहफा कहा जा सकता है. उच्च शिक्षा में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए. दिल्ली विश्वविद्यालय में बैचलर डिग्री तो तीन साल से बढ़ाकर चार साल करने का फ़ैसला किया गया ताकि इसे विश्वस्तरीय बनाया जा सके. हालांकि हड़बड़ी में लिए गए निर्णय से विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर समेत छात्रों की तरफ़ से भी अपनी-अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई गई थी.

बीए पास की चर्चा:   इस साल की फ़िल्म बीए पास सुर्ख़़ियों में रही. लेकिन उससे भी पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा बैचलर डिग्री कोर्स के समय को बढ़ाने पर विवाद खड़ा हो गया था. लोगों का कहना था कि ग़रीब परिवार के बच्चों के लिए यहाँ पढ़ना, अतिरिक्त पढ़ाई का बोझ उठाना संभव नहीं होगा. लड़कियों के सामने भी तमाम तरह की मुश्किलें आ सकती हैं. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के कोर्स को चार साल का बनाने का विवादित फ़ैसला ख़बरों में रहा. लोगों का कहना था कि तीन साल के बीए से लोग क्या नहीं कर पा रहे थे, जो चार साल की बीए डिग्री से तीर मार लेंगे.

इस कोर्स पर विचार-विमर्श-बहस और विवाद का सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा. अंततः इस फ़ैसले को हरी झंडी मिलने के बाद लागू कर दिया गया. इस फ़ैसले से भविष्य में उच्च शिक्षा में महत्वपूर्ण बदलाओं के संकेत मिलते हैं. उच्च शिक्षा में प्रोफ़ेसनलिज़्म की कमी, पुस्तकालयों का अभाव, रिक्त पदों पर संविदा शिक्षक लगाने, शोध के ऊपर ध्यान न देने जैसे तमाम सवाल उठाए जाते हैं. उच्च शिक्षा संस्थानों में होने वाली राजनीति और गुटबाज़ी की ख़बरें भी आए दिन सुर्ख़ियों में रहती हैं. इनको उच्च शिक्षा के लिए बेहतर संकते कतई नहीं माना जा सकता है.

राजधानी दिल्ली में हर साल उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र पढ़ाई करने और जीवन में कुछ करने का सपना लेकर आते हैं. लेकिन अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली के विश्वविद्यालयों में कुछ फ़ीसदी सीटें दिल्ली के लोगों के लिए आरक्षित करने की बात हो रही थी ताकि यहाँ के लोगों को उच्च शिक्षा के लिए कहीं और न जाना पड़े. इस फ़ैसले का दिल्ली से बाहर के लोगों ने काफ़ी विरोध किया कि इसका मतलब है कि दिल्ली है दिल्ली वालों की और बाकी सारे लोग कहाँ जाएंगे. राज्यों के विश्वविद्यालयों का स्तर बढ़ाया जाना चाहिए. संयुक्त प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करनी चाहिए. मेरिट के आधार पर जिसको जहाँ प्रवेश मिले, पढ़ाई का अवसर देना चाहिए. हर क्षेत्र में आरक्षण से उन लोगों के जीवन में खुलने वाली बेहतरी की खिड़की बंद हो जाएगी, जिनकी डीयू, जामिया, जेएनयू में पढ़ना एक सपना होता है.

दोपहर के खाने में बँटती मौतः 

बिहार के सारण ज़िले के मसरख ब्लॉक में विषाक्त भोजन परोसे जाने के बाद 23 बच्चों की मौत के बाद पूरे देश में मध्याह्न भोजन (एमडीएम) योजना को लेकर काफ़ी तेज़ बहस शुरू हो गई थी. इसके ऊपर प्रिण्ट, इलेक्ट्रॉनिक और बेब मीडिया में काफ़ी चर्चा हुई. देश के विभिन्न हिस्सों से एमडीएम के संचालन और दोपहर के भोजन की जिम्मेदारी शिक्षकों के ऊपर डालने की कड़ी आलोचना हुई. इस पर विभिन्न चैनलों पर बहसों का आयोजन भी किया गया. इसके कारण बिहार के अलावा अन्य राज्यों में भी सतर्कता बरतने के आदेश दिए गए थे.

बिहार में तो शिक्षकों और हेड मास्टर्स की आपात बैठक बुलाई गई थी ताकि इस तरह की घटना दोबारा न दोहराई जाय. बिहार के शिक्षकों की शिकायत थी कि मध्याह्न भोजन के लिए आने वाले अनाज की गुणवत्ता में कमी की शिकायत की कोई सुनवाई नहीं होती. शिक्षा  से जुड़ें अधिकारियों में कमीशन खाने की होड़ मची रहती है. कोई काम करो न करो, स्कूल में पढ़ाई हो न हो अधिकारियों को कोई परेशानी नहीं होती है, लेकिन अगर कमीशन न मिले तो अधिकारी 25 कमियां निकालकर शिक्षकों को प्रताड़ित करते हैं. इस घटना के बाद से अभिभावकों में आक्रोश व्याप्त हो गया था कि हम अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं. उनको जान से मारने के लिए थोड़ी भेजते हैं.

इस घटना के बाद से बिहार के गाँवों में शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए थे. लेकिवन हालात में बदलाव की फ़ौरी कोशिशों के बाद मामला फिर से शांत हो गया है. पूरे घटना की जिम्मेदारी महिला शिक्षिका के ऊपर डालने के बाद स्कूलों की स्थिति अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई है.

गुणवत्ता के सवाल से घबराहट क्यों? 

शिक्षा के अधिकार क़ानून 2009 के तहत लोगों को शिक्षा तो मिल रही है, लेकिन एक किलोमीटर के दायरे में सरकार केवल शिक्षा दिलवाने का आश्वासन देती है. शिक्षा के गुणवत्ता के सवाल पर पूरी ख़ामोशी है. केवल मिनिमस लर्निंग लेवल की बात होती है. जबकि शिक्षा का सवाल तो जीवन की गुणवत्ता और बच्चों के मौलिक अधिकार से जुड़ा सवाल है. उसको इतना हल्का बनाने की कोशिशों से प्राथमिक शिक्षा के सरकारी उपेक्षा की बात सामने आती है. दोपहर के भोजन में पढ़ाई डूबती है तो डूबे, लेकिन उनको कोई परवाह नहीं है. बहुत सारे लोगों का मानना है कि ग़रीबों के बच्चे स्कूल में सिर्फ़ दोपहर का भोजन खाने आते हैं. शिक्षा के अधिकार और लोगों की भूख का इससे बड़ी मजाक नहीं हो सकता है.

स्कूलों में न तो शिक्षा के गुणवत्ता की गारंटी है और न भोजन के गुणवत्ता की गारंटी है. मानो हम स्कूल की बज़ाय किसी फ़ैशन स्टोर की चर्चा कर रहे हों, जहाँ लिखा होता है कि फ़ैशन के इस दौर में गारण्टी का जमाना नहीं. फ़ैशन स्टोर में लोगों के पास चुनाव का विकल्प होता है. लेकिन यहाँ पर तो चुनाव के बेहत सीमित विकल्प हैं. पड़ोस के सरकारी स्कूल में एडमीशन लो या फिर किसी निजी स्कूल के 25 फ़ीसदी कोटे में जगह बनाने के लिए प्रयास करो. अगर संयोग से आप किसी दूर-जराज़ के गाँव में रहते हैं तो फिर सरकारी की गारंटी एक किलोमीटर के दायरे के भीतर शिक्षा उपलब्ध करवाने की है. बड़े बच्चों के लिए यह दायरा थोड़ा बढ़ जाता है. लेकिन स्थिति में बहुत ज़्यादा सुधार की संभावनाएं हैं, जिसकी तरफ़ अमूमन लोगों का ध्यान नहीं जाता है.

भारतीय संविधान में अगर शिक्षा को बच्चों का हक़ माना गया है तो उसकी गुणवत्ता की भी बात होनी चाहिए. बच्चों को अधिकतम अधिगम स्तर (मैक्सिमम लर्निंग लेबल) या औसत अधिगम स्तर तक पहुंचाने के लिए योजना बनाने और लागू करने की कोशिश होनी चाहिए. प्राथमिक शिक्षा में न्यन्तम अधिगम स्तर (मिनिमम लर्निंग लेबल) की बात तो किसी दृष्टिकोण से स्वीकार करने योग्य नहीं है. जीवन की गुणवत्ता से जुड़े भोजन और शिक्षा को बिना गुणवत्ता के कैसे स्वीकार किया जा सकता है?

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