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बच्चे बारहखड़ी ‘रट लें’ तो वे हिंदी पढ़ना सीख जाएंगे!!!

भारत में शिक्षाछोटे बच्चों को हिंदी पढ़ना कैसे सिखाएं? बहुत से शिक्षकों के पास इस सवाल का जवाब पहले से मौजूद है। तो कुछ शिक्षक इस सवाल को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदी पढ़ना कैसे सिखाएं? इस सवाल को तोड़ा जा सकता है। इसे आसान बनाते हुए कहा जा सकता है कि बच्चों को कैसे सिखाएं? हम जैसे ही इस सवाल पर पहुंचते हैं, हमारे सामने यही सवाल नए अर्थों के साथ हाजिर होता है।

यह सवाल बहुत पुराना सवाल है कि बच्चे सीखते कैसे हैं? इस सवाल का बहुत से लोगों के पास ‘रेडीमेड जवाब’ पहले से मौजूद है। लेकिन वास्तविक परिस्थिति को समझने में वह बहुत ज़्यादा मददगार नहीं है। हर स्कूल के बच्चों की अपनी परिस्थिति है। अपना परिवेश है। सीखने का अपना तरीका है। शिक्षकों का अपना नज़रिया है। हर माहौल में बच्चे सीखते ही हैं। इससे बच्चों की क्षमता वाला पहलू विशेषतौर पर रेखांकित होता है।

बहुत से स्कूलों में हिंदी पढ़ना सिखाने का एक हिट फॉर्मूला है कि पहले बच्चों को वर्णमाला रटा दी जाए और उसके बाद बच्चों को बारहखड़ी सिखा दी जाए।

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बारहखड़ी को हिंदी पढ़ना सिखाने का अचूक फॉर्मूला माना जाता है।

कुछ शिक्षक कहते हैं, “अगर बच्चे बारह खड़ी सीख जाएं तो उनके लिए पढ़ना आसान हो जाएगा।” इस जवाब के बारे में सबसे ध्यान देने वाली बात है कि वर्णमाला की पहचान और बारह खड़ी सीखने मात्र से बच्चों के लिए पढ़ना आसान हो जाता तो शायद हिंदी पढ़ने में बच्चों को इतनी मुश्किल पेश नहीं आती।

ऐसी भी मान्यता है कि हिंदी के वर्णों की पहचान के पहले उनको लिखना आना जरूरी है। मगर स्कूल में पाँचवी कक्षा के बच्चों को दिनभर पासबुक (गाइड बुक) से पाठ को उतारता हुआ देखने के बाद मन में यही बात आयी थी कि अगर इन बच्चों को पढ़ना आता तो शायद उतारे जा रहे शब्दों में उनके लिए भी कोई अर्थ होता। कोई मायने होता।

मगर हर साल बहुत से ऐसे बच्चे बिना पढ़ना-लिखना सीखे स्कूली शिक्षा की औपचारिकता पूरी करके निकल रहे हैं। पढ़ना सिर्फ़ वर्णमाला और बारहखड़ी सीख लेने का खेल नहीं है। यह एक प्रक्रिया है जिसमें धीरे-धीरे हम अक्षरों, शब्दों और किताबों की दुनिया से एक अर्थपूर्ण रिश्ता बनाने का मौका बच्चों को देते हैं और बच्चे अपने तरीके से पढ़ना-लिखना सीखते हैं। एक बार पढ़ना सीखने के बाद वे अपने तरीके से इस सफ़र को आगे ले जाते हैं। वे किसी के ऊपर निर्भर नहीं होते। डिकोडिंग की स्किल से शुरू हुआ सफ़र समझने की दिशा में आगे बढ़ जाता है।

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बलबीर सिंह

बच्चों को हिन्दी पढ़ना सिखाने का यह प्रयास सराहनीय है बारहखड़ी के द्वारा बच्चे जल्दी हिन्दी पढ़ना सीखते हैं

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