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बच्चे बोले, “गुरूजी हीरो मत बना करो…”

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संदीप सैनी पिछले चार सालों से प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।

जैसे ही मैने गाँव में प्रवेश किया तो देखा की आज कच्ची सड़क पर पहले से ज्यादा पानी भरा हुआ था और गड्ढे पहले से ज्यादा गहरे हो गए थे। पहले प्रयास में नहीं निकल सका तो मैने स्कूटी को पीछे हटाया। फिर प्रयास किया।

काफी कोशिशों के बावजूद नहीं निकल पाया तभी एक आवाज मेरे कानों में पड़ी, ” मास्टर जी दूसरे वाले रास्ते से निकल जाओ स्कूल पहुँच जाओगे।” इस वाक्य ने मानो मेरी जान में जान डाल दी।” मुझे ऐसा लगा मानो कानों से होते हुए ये शब्द सीधे दिल तक पहुंच गये हों।

‘मजा आ गया’

मै स्कूटी घूमाने लगा तभी सुनील वहां भाग कर आया। उसके हाथ खाने में सने हुए थे। और मुँह में खाना लगा हुआ था। मुझे देखकर वह जोर से चिल्लाया, “मजा आ गया और उसके मुँह से खाना बाहर निकल पड़ा।” पास में खड़ी महिला जोर से हँसने लगी। वो भाग कर वापस घर में चला गया और वो महिला हँसती रही।

School Child

एक स्कूली बच्चा मिट्टी के खिलौने बनाते हुए।

 मैं उससे जानना चाहता था कि वो आज स्कूल क्यों नहीं गया ? लेकिन वो बिना कुछ कहे चला गया मै उससे बात करना चाहता था लेकिन मैने पहले स्कूल पहुंचने का निर्णय लिया क्योंकि उसकी आँखे मुझसे कुछ कह गयीं थी। मैं स्कूल पहुंचा सभी से मिला, सभी का एक ही सवाल था क्या हुआ ? और मेरा जवाब भी एक ही था –चोट लग गयी ।

सुबह की सभा शुरु हुई। मैं भी सभा का हिस्सा बना। जैसे ही सभा समाप्त हुई सभी बच्चो ने गुरु जी (प्रधानाध्यापक) से पूछा कि मेरे हाथ को क्या हुआ ? तो गुरु जी ने मुझसे कहा कि बच्चे जानना चाहते हैं कि आपके हाथ को क्या हुआ ? उत्तर वही था लेकिन इस बार पूरे वर्णन के साथ की मेरा एक्सिडेंट हो गया।

‘हीरो मत बना करो गुरूजी’

इसके बाद बच्चे कक्षाओ में जाने लगे और मेरा एक नया पाठ शुरु हुआ –गुरु जी ध्यान से चलाया करो। रफ़्तार कम रखा करो। हैलमेट लगाया करो। मोड़ पे ध्यान से मोड़ा करो आदि आदि।  हद तो तब हो गयी जब कक्षा 5 के दिलबाग ने आकर कहा, “गुरूजी कोई बात नहीं हाथ पे ही चोट लगी है ठीक हो जाएगी, दूध में हल्दी मिला के पी लेना।” इतना कहने के बाद वह मुस्कुराकर चला गया। ऐसा लगा मानो उसने मुझे दुनिया का वो ज्ञान बताया हो जो किसी को नहीं पता है। और मुझे बताना उसका फर्ज बनता हो।

मै कुछ भी तो नहीं कह पाया दिलबाग से।  सिर्फ एक विचार मेरे दिमाग में आया ये बच्चे हैं ? 10 मिनट बाद मै गुरुजी के साथ कक्षा में गया जिसमे 1 से 3 तक के बच्चे एक साथ बैठेते हैं। अरे ये क्या ! सुनील तुम तो घर पर थे ना। सुनील ने जवाब दिया, ” हाँ, आज मै नहीं आने वाला था खेत में सरसो कट रही है।”

इससे पहले कि मैं कुछ कहता उसने पूछा आपके हाथ को क्या हुआ ? मेरा उत्तर वाही था और उसका पाठ भी। उसने बाकी बातों के साथ जोड़ा, ” तो इतना तेज चला के हीरो मत बना करो गुरूजी। उसके इस जवाब पर मैं, गुरूजी और सारे बच्चे हँसने लगे।  अन्य अध्यापको के साथ यह बात साझा हुई तो हँसी का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।

उस दिन मै यही सोचता रहा कि बच्चे मुझसे प्यार करते हैं या नसीहत दे रहे थे। ये उनका दुनिया को समंझने और जिन्दगी जीने का अपना तरीका है जिसे स्कूल  में बहुत कम जगह मिलती है।  सुनील स्कूल में मुझसे मिलने आया था या मुझ पर टिप्पणी करने। दिलबाग क्यों चलकर मेरे पास आया ? और उसने क्यों मुझे धीरज बंधाया ? सभी बच्चो को मेरे हाथ के बारे में जानने की इतनी उत्सुकता क्यों थी ? क्या था वो ? मै अभी तक समझने की कोशिश कर रहा हूँ।’

(इस पोस्ट के लेखक संदीप सैनी वर्तमान मे पिरामल फाउण्डेशन में बतौर प्रोग्राम लीडर काम कर रहे हैं।)

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