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मिड डे मील योजनाः दोपहर के खाने में डूबती पढ़ाई…

बच्चों का काबिल-ए-तारीफ प्यार.....अगर दोपहर के खाने में पढ़ाई डूब रही है. स्कूल का मिड डे मील खाने के बाद शिक्षक और बच्चे बीमार हो रहे हैं. स्कूल जाने वाले मासूम बच्चों की मौत हो रही है। भयमुक्त माहौल के बनाने का दावा करने वाले स्कूल बच्चों के मन में डर के बीज बो रहे हैं तो क्या इस योजना पर सवाल नहीं खड़े होते? क्या ऐसी योजना को जारी रखना चाहिए जो छात्रों के स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है. मुझे कई बार लगता है कि उन राज्यों में इस योजना को बंद करके बाकी विकल्पों पर विचार करना चाहिए जहां से मिड डे मील के क्रियान्वय में भारी गड़बड़ी के मामले सामने आ रहे हैं.

गाँव के लोगों को आपस में बात करके इस तरह की योजना का कोई समाधान खोजना चाहिए. स्थानीय प्रशासन पर इस योजना को ढंग से लागू न करने की स्थिति में बंद करने की अपील भी की जा सकती है. ऐसी व्यवस्था के बारे में क्या कहा जाए जहां शिक्षक बच्चों को अपने बच्चों की नज़र से न देखते हों, जहाँ अभिभावकों को अपने बच्चों की फिक्र करने के लिए स्कूल जाने की जरूरत न महसूस होती हो. देश के भविष्य के लिए बेहतर होगा स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र बने रहें और अभिभावक अपने बच्चों की बाकी जिम्मेदारी खुद से संभालें. ऐसा करने के लिए जरूरतमंद अभिभावकों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है.

अगर ग़ौर से देखें तो ‘मिड डे मील योजना’ ग़रीबों और ग़रीबी का मजाक उड़ाती है. यह ग़रीब बच्चों के अभिभावकों की परनिर्भरता पर हंसती है. उन पर मुस्कुराते हुए अहसान का भाव थोपती है कि देखो हम तुम्हारे बच्चों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं. स्कूलों में मुफ़्त में पढ़ा रहे हैं और मुफ़्त का खाना दे रहे हैं. हम मुफ़्तखोरी की ऐसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं जो सालों तक तुम्हें सरकार के आगे हाथ पसारने वाली स्थिति में बने रहने को विवश करती रहेगी. तुम आत्मनिर्भता तो हमारे लिए तमाम मुश्किलें खड़ी करेगी, तुम सवाल पूछोगे और हमारी सरकार की सुख और सुविधाओं की राह में रोड़ बन जाओगे.

हो सकता है कि एक दिन लोग अपने बच्चों को घर से खाना देकर भेजना शुरू करें, या स्कूल जाने से बेहतर घर पर रखना समझें, क्योंकि शिक्षा और भोजन के चक्कर में बच्चे का जीवन दांव पर लगाने की विचार शायद ही किसी संवेदनशील अभिभावक को पसंद आए. गांव का जो अन्नदाता पूरे देश को खिलाने के लिए अनाज दे सकता है, क्या वह अपने गांव-कस्बे के बच्चे को खाने के लिए दो वक़्त की रोटी नहीं दे सकता? यह सवाल देश में खेती के हाल और शिक्षा की बदहाली की हालत बयान करता है. सवाल रोटी का भी है, सवाल तालीम का भी है, सवाल तालीम के आधार पर भविष्य में मिलने वाले रोज़गार का भी है.

देश की यूजीसी जैसी शीर्षस्थ संस्थाओं पर बैठे लोग अगर कहते हैं कि जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते, उनको बैग पैक करके गाँव चले जाना चाहिए. आख़िर जिस व्यवस्था के तमाम अधिकारी इस सोच से संचालित होते हों, वहां की हक़ीक़त समझी जा सकती है कि हासिए पर खड़े या पड़े तमाम लोगों की उनको कितनी चिंता और फिक्र है. भाषा के आधार पर व्यवस्था से लोगों की छंटनी का कार्यक्रम भविष्य के अच्छे दिनों की तरफ़ संकेत करता है, जो लोगों को उनकी असल जगह पर फिट कर देने वाले फार्मुले से संचालित होगी. यह व्यवस्था साठ-पैंसठ सालों से देश में संचालित हो रही है, इस नीति में कोई सार्थक बदलाव न तो अभी आया है और न भविष्य में होने वाला है. क्योंकि भेदभाव व्यवस्था की नीतिगत रणनीति का सदैव से हिस्सा रही है.

बच्चों को घटिया भोजन और दोयम दर्ज़े की शिक्षा देने वाली इस व्यवस्था में संवेदनशील शिक्षक भी पिसने को मजबूर हैं. कुछ-एक शिक्षकों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं जो पहले दिन स्कूल जाकर रो पड़े थे कि ऐसे स्कूल होते हैं क्या? क्या इसी तरीके से पढ़ाई होती है? यहां तो बच्चों के बैठने के बेंच भी नहीं है? स्कूल में शिक्षकों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है. स्कूल में सालों से पढ़ाने वाले शिक्षकों को तो बच्चों की परवाह ही नहीं है.

उनको तो अपने वेतन और सुख-सुविधाओं से ही मतलब है. क्या कारण है कि सरकार शिक्षकों को अच्छा वेतन तो दे सकती है, लेकिन देश का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को उच्च गुणवत्ता का भोजन मुहैया करवाने से परहेज करती है. इसी कारण से कुपोषण समेत तमाम परेशानियों से ग्रस्त भारत का कमज़ोर बचपन, भविष्य के सपनों के दावा करने वाली विषैली धुंध में खो जाने को मजबूर हैं, जिसका कोई हिसाब सरकार और समाज के पास नहीं है.

हमारे देश में भोजन और शिक्षा दोनों की गुणवत्ता गंभीर सवालों के घेरे में है, जिस पर सत्ता में बैठे लोग कोई सवाल नहीं उठाते, न उसमें बदलाव के लिए कोशिश करते हैं. दरअसल एक सीमा के बाद सत्ता यथास्थिति की पोषक बन जाती है. इसीलिए चीज़ें ज्यों की त्यों चलती रहती हैं. स्कूलों को खुले करीब एक महीना होने को है. नए सत्र के दूसरे-तीसरे दिन से मध्याह्न भोजन (मिड डे मील) खाकर बच्चों के बीमार होने की ख़बरें अख़बार और चैनलों में प्रकाशित और प्रसारित हो रही है. सबसे पहले ख़बर आई थी कि देश की राजधानी नई दिल्ली के एक स्कूल में चार जुलाई को मिड डे मील खाने के बाद सात से 13 साल की उम्र के 22 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसके बाद से अभी तक देश के विभिन्न राज्यों से इस तरह की ख़बरों का सिलसिला जारी है.

ऐसी शिक्षा व्यवस्था में मानवीय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का भाव भरने की जिम्मेदारी किसकी है? अगर दोपहर के खाने में पढ़ाई और बच्चों की ज़िंदगी की रौशनी खो रही है तो उसको लिए सरकार अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं लेती और समाज की आँखों पर पट्टी बांधने की जगह कोई बेहतर पहल क्यों नहीं करती?

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