Trending

मध्य प्रदेश: इंदौर के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माहौल कैसा है?

हमने इंदौर के नयापुरा इलाके में जाकर वहां की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और स्कूली शिक्षा को विभिन्न आयामों से देखने-समझने का प्रयास किया। इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है, जिनकी सोच का तरीका परंपरागत है। इसकी झलक लोगों के साथ बातचीत में दिखाई देती है।

लोगों की सोच में बदलाव हो रहा है

यहां आज भी लड़कियों के प्रति भेदभाव वाला नजरिया अपनाया जा रहा है। उनको केवल 10वीं तक ही पढ़ाने की सोच एक स्थायी मान्यता का रूप ले चुकी है। ग़ौर करने वाली बात है कि इसे तोडऩे का प्रयास कुछ एक परिवारों ने किया है। उन्होने अपने परिवार की लड़कियों को ग्रेजुएशन के लिए भेजना और प्रोत्साहित करना शुरू किया है। यह भविष्य के बदलाव की एक धुंधली सी तस्वीर पेश करता है।

सरकारी स्कूलों के बारे में लोगों की राय

यहां के सरकारी स्कूलों की भवनों की स्थिति काफी खराब है। स्कूल के आसपास रहने वाले लोग कहते हैं, “सरकारी स्कूल के अध्यापक पढ़ाने में लापरवाही करते हैं। देर से स्कूल आते हैं। स्कूल में बच्चों से घर का काम करवाते है।” इस क्षेत्र में एक ख़ास बात दिखी कि यहाँ महिलाएं अपने पतियों की तुलना में अधिक शिक्षित हैं।

शादी को मिलती है पढ़ाई पर तरज़ीह

इस क्षेत्र में उन्हीं लड़कियों को दसवीं तक पढऩे का मौका दिया जाता है, जिनकी रुचि अध्ययन में बरकरार रहती है। अथवा जिनके शादी की बात पक्की नहीं हो पाती। यहाँ जिन लड़कियों की शादी देर से होती है उनकी पढाई बंद करवाकर घर के काम-धंधे में लगा दिया जाता है। शादी को शिक्षा पर प्राथमिकता मिलने की बात भी सामने आई। अगर पढ़ाई के दौरान ही घर के लोगों को लड़की के लिए कोई अच्छा रिश्ता मिल जाता है तो लडक़ी की पढ़ाई खटाई में पड़ जाती है। क्योंकि आगे की पढ़ाई के सारे रास्ते शादी के बाद बंद हो जाते हैं।

लड़कों के साथ होता है भेदभाव

लड़कों के शिक्षा की स्थिति इससे ज्यादा गंभीर मिली। वहां रहने वाले अधिकतर परिवारों का खुद का व्यवसाय व कारोबार है, जिसकी जिम्मेदारी लडक़ों को पढ़ाई के साथ ही उठानी पड़ती है। कई लडक़ो को बीच में पढ़ाई छोड़ पैतृक व्यवसाय में उतरना पड़ा।

लोग कहते हैं, “ऐसी पढ़ाई का क्या फायदा जिससे रोजगार या नौकरी न मिले। यहां के बहुत से बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए जाते है। अभिभावकों (या पालकों) का कहना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी नहीं होती, इसलिए वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। वे शिकायती लहजे में कहते हैं, “निजी स्कूलों की फीस महंगी है। इसलिये गरीब परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही जाते है। सरकारी स्कूलों का शैक्षिक माहौल खुशनुमा नहीं है, जो बच्चों के सीखने की रफ्तार को धीमा कर देता है।”

शिक्षकों में प्रेरणा का अभाव है

एक अभिभावक कहते हैं, “सरकारी स्कूलों में एक तरफ तो सुविधाओं का अभाव है। वहीं दूसरी तरफ अध्यापकों में पढ़ाने की प्रेरणा का घोर अभाव है। ऊपर से चुनाव और जनगणना जैसे सरकारी कामों की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी शिक्षकों को उठानी पड़ती है। ऐसे में वहां बच्चों को कैसी अच्छी शिक्षा मिल सकती है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।” ऐसी स्थिति से साफ जाहिर है कि शिक्षा के अधिकार कानून (RTE-2009) और मिड-डे मील जैसी योजनाओं के कारण के कारण बच्चों के नामांकन में तो इजाफा तो हुआ है। लेकिन अधिकांश बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है।

पर सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब तक हम शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं करते, तबतक प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इस स्तर पर तैयार होने वाले ‘बच्चे’ रोजगार के लिए होने वाली की प्रतियोगी परीक्षाओं में सुविधासंपन्न शहरी स्कूलों से पढ़कर आने वाले बच्चों के आगे कहां टिक पाएंगे। ऐसे में बदलाव लाने के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक प्रयास करने की जरुरत है जो बच्चों को शिक्षा के लिए एक बेहतर माहौल मिले और उनका सीखना भी सुनिश्चित हो।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x