Trending

‘दिल्ली जैसे शहरों में भी मिड डे मील की जरूरत है’

मिड डे मील खाते बच्चे

राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में व्यस्थित ढंग से बैठकर भोजन करते बच्चे।

आमतौर पर सरकारी विद्यालयों में छात्रों को “मिड डे मिल” बाँटने के वक़्त आपस में धक्का-मुक्की करते देखकर किसी के भी मुंह से यही बातें निकलती है, “कैसे खाने के लिए लड़ रहे हैं, पता नहीं पढने आते हैं या खाने?”

दिल्ली की गर्मी सामान्यतः मार्च महीने से ही अपने तरकश के सभी तीरों को पैना करने की कोशिश शुरू कर देती है। यह इस बात का संकेत होता है कि मई-जून का महीना चिलचिलाती धूप का होगा।

गर्मी के इन्हीं शुरूआती दिनों में दिल्ली के MCD स्कूलों में छोटे-छोटे बच्चों को दोपहर के वक़्त विद्यालय जाते देखने पर एक अलग ही भाव मन में आतें हैं। यहां आने वाले अधिकांश बच्चों की पोशाकें देखकर हीं  यह लग सकता है कि ये विद्यालय की ओर उन्मुख हैं अन्यथा बिना विद्यालयी वर्दी में इन छात्रों को अगर कोई देख ले तो उसके लिए यह समझना मुश्किल होगा कि ये वाकई विद्यालयी छात्र हैं।

‘बच्चे की मासूमियत कहीं छिप सी गई थी’

ऐसी ही गर्मी के शुरूआती दिनों में मैंने एक छात्र को दोपहर के वक़्त विद्यालय जाते देखा। उसकी उम्र तकरीबन छः या सात वर्ष रही होगी। गंदे और अजीब ढंग से पहने उसकी विद्यालयी वर्दी का रंग बेहद ही बदरंग सा हो चुका था। साथ ही धूल-धूसरित शरीर और उलझे लिपटे बालों में उस बच्चे की मासूमियत भी कहीं छिप सी गई थी।

उस बच्चे की पीठ पर काले रंग का बस्ता था, जिसकी चेन टूटी होने के कारण उसमें से एक कॉपी बाहर की ओर झांक कर दिल्ली के रास्ते को टकटकी लगाये देख रही थी। बस्ते का काला रंग भी मानो गन्दगी से हार कर आत्मसमर्पण कर चुका था। बच्चे ने पैरों में जूते पहन रक्खे थे जो न जाने कितने समय से उन पैरों की सेवा करते-करते चिथड़े बन चुके थे अब ये जूते  केवल विद्यालयी वर्दी का हिस्सा भर रह गए थे।

पढ़िएः मिड डे मील खाने के बाद बच्चों की मौत पर उठते सवाल

बच्चा ठेले पर छोले-चावल क्यों खा रहा है?

सरकारी विद्यालयों के अधिकांश बच्चों की तरह यह बच्चा भी ऐसा अलग और आकर्षक नहीं लग रहा था, जो किसी राह चलते व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करे। मेरा ध्यान आकर्षित करने कारण भी बच्चे के हाथों में थमा पत्तों का वह छोटा सा दोना था जिसमें चावल-छोले और एक दो प्याज की कतलियाँ दिख रहीं थी। दोपहर के इस वक़्त कायदे से उसके हाथों में यह छोटा सा दोना नहीं होना चाहिए मैंने यह सोचा कि अभी दोपहर के समय यह बच्चा क्यूँ ठेले पर का सामान खरीद कर खा रहा है वह भी चावल-छोले जबकि यह वक़्त ऐसा है की कोई भी बच्चा बिना खाना खाए घर से चला नहीं होगा फिर इसे बर्फ के गोले ,कुल्फी या अन्य किसी सामग्री ने क्यों आकर्षित नहीं किया?

quality-education-india

सरकारी स्कूलों में दोपहर को मिलने वाले भोजन को मिड डे मील कहते हैं।

यही सोचते-सोचते मैं उस बच्चे से थोड़ा आगे निकल आया परन्तु बार-बार यह प्रश्न मन में आ रहा था कि मैं उससे पूछूं पर सड़क पर एक अनजान बच्चे से ये बात पूछने रुकूँ भी तो कैसे ? काफी देर इसी उहापोह की स्थिति में रहा पर मन नहीं माना मैं रुका और पीछे फिरकर बच्चे की ओर देखा वह तन्मयता से चावल-छोले खाता सड़क पर बढ़ा आ रहा था वह मेरे पास आ गया और अब मैं उसके पीछे-पीछे चला जा रहा था।

‘भूख तो लगी थी न’

अब उसकी प्लेट में चावल-छोले अब थोड़े हीं रह गए थे मैंने आस-पास देखते हुए बिलकुल हीं  बेतक्कलुफी से उससे पूछ बैठा, “इस वक़्त चावल-छोले क्यूँ ख़रीदा ये तो छुट्टी समय खरीदते, क्या अभी-अभी भूख लग गई? बच्चे ने लकड़ी की आइसक्रीम वाली चम्मच से चावल उठाते हुए कहा-हाँ, भूख लगी थी न।

मैंने थोडा आश्चर्य करते हुए पुनः पूछा-तो क्या मम्मी ने खाना नहीं बनाया था? बच्चे ने निवाला मुंह में रखते हुए जवाब दिया-बनाया था पर आज मैं खेलने चला गया था और जब लौटा तो खाना ख़त्म हो गया था। मैंने पुनः पूछा-तो खाना ख़त्म कैसे हो गया था तुम्हारे लिए नहीं बनाया था उन्होंने? उसने जवाब दिया-नहीं, बनाती तो हैं लेकिन कभी-कभी सब लोगों के खा लेने पर खाना ख़त्म हो जाता है।

मैंने गहरी साँस लेकर कहा-हम्म, फिर तुमने माँ  से और खाना बनाने के लिए नहीं कहा क्या? बच्चे ने जवाब दिया-नहीं, वह घर पर नहीं थी, वह तो खाना बनाने के बाद कारखाने में काम करने चली जाती हैं। मैंने फिर पूछा-फिर तो हमेशा ऐसा होता होगा? बच्चे ने सरलता से जवाब दिया-नहीं जब हम खाना बनाते हैं तो पहले खा लेते हैं।

‘स्कूल में खाना मिलता है, उस टाइम खा लेंगे’

DSC06109

एक सरकारी स्कूल में मिड डे मील खाते बच्चे

छह-सात साल के इस बच्चे के मुंह से ये बात सुनकर मुझे लगने लगा कि लड़का अपनी उम्र से भी ज्यादा परिपक्व है पर फिर भी मैंने पूछा-तो क्या इस थोड़े से चावल से पेट भर जायेगा? क्या स्कूल में भूख नहीं लगेगी? बच्चे ने बड़े हीं शांत भाव से मेरी तरफ देखकर थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा-भूख क्युं लगेगी, स्कूल में खाना मिलता तो है, उस टाइम खा लेंगे। इस आखिरी जवाब को सुनकर मुझे कई प्रश्नों के उत्तर एक साथ मिल गए।

अब मुझे सरकारी विद्यालयों में “मिड डे मिल” के लिए छात्रों के बीच की खींचतान का कारण भी पता चल गया था और यह भी कि “मिड डे मील” के बंटने का समय जो विद्यालयीय कर्मचारियों के लिए बड़ा ही कठिन समय होता है दरअसल वह छात्रों के लिए बहूत हीं महत्वपूर्ण समय होता है

दिल्ली जैसे शहरों में भी ‘मिड डे मील’ की जरूरत है

मेरे जैसे लोग जो यह सोचते थे कि “मिड डे मील” की असली उपलब्धि गावों के विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति सुनिश्चित करनी और नामांकन बढ़ाना है। उनको यह पता चला कि दिल्ली जैसे शहरों में भी ‘मिड डे मीलकी उतनी ही जरुरत है जितनी गाँवों में, क्योंकि गरीब, गरीबी, जरूरत और भूखे लोग तो हर जगह हैं।

अब सरकारी विद्यालयों में छात्र अगर दोपहर के मेनू के बारे में बात करते हैं तो इसके पीछे की मजबूरी भी मेरी नजर में है, अब अगर कोई शिक्षक उन बच्चों को दोपहर के भोजन के लिए धक्का-मुक्की करते देख उन्हें कोई विशेष संज्ञा देगा तो मैं उन्हें इस धक्का-मुक्की का असल कारण बता सकूँगा।

सरकार की “मिड डे मील” की पॉलिसी ने गरीब और मजबूर छात्रों के माता-पिता के साथ-साथ इन छात्रों की दोपहर के भोजन की चिंता को भी दूर कर दिया है।

(इस पोस्ट के लेखक अभिषेक पाण्डेय एक सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। बच्चों को पढ़ाने का उनके पास लंबा अनुभव है। एजुकेशन मिरर के लिए लिखी इस पोस्ट में उन्होंने ‘मिड डे मील’ के महत्व को रेखांकि किया है।)

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

2 Comments
Newest
Oldest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Yogendra Chaubey

संवेदनशील आलेख वाक़ई मिड डे मिल को लेकर एक आम धारणा से पर्दा हटाते हुए ।

Virjesh Singh

योगेंद्र जी, आपने बिल्कुल सही बात कही है। इसका पूरा श्रेय बतौर शिक्षक अभिषेक जी की संवेदनशील नज़रों को जाता है जहां वे खुद को सवालों के बीच खड़ा करते हैं और समाधान के साथ एक निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। सही मायने में रिफलेक्शन यही है कि हम अपने अनुभवों पर विचार करें और उनके सबक लेते हुए आगे बढ़े। यह आर्टिकल एक स्टैंड है मिड डे मील के पक्ष में। आदिवासी अंचल के एक स्कूल में बच्चे मध्याहन भोजन के दौरान प्रार्थना में कहते हैं, “हे भगवान ऐसा भोजन हमें रोज़ देना।” इस स्कूल के शिक्षक बताते हैं कि एक बच्ची स्कूल नहीं आने पर भी खाने के वक्त स्कूल आती थी क्योंकि उसके घर में परिवार के लोग बाहर काम पर चले जाते और उसे बकरियां इत्यादि चराने के लिए जाना होता था ऐसे में खाने का एक ही जरिया था, स्कूल में मिलने वाला मिड डे मील। बच्चे सिर्फ खाने के लिए स्कूल नहीं आते। वे पढ़ने के लिए भी आते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य का समन्वय करने की दृष्टि से संतुलित आहार और गुणवत्ता वाली शिक्षा के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है, इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती है।

2
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x