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न आने वाला कल : मोहन राकेश

सफ़र के कुछ लम्हों, एक रतजगे और एक दिन में इस साल की पहली किताब मुकम्मल हुई। मोहन राकेश की लिखी पुस्तक ‘न आने वाला कल’ एक मोड़ पर अनिश्चितता के साथ ही ख़त्म होती है। इसके बाद पाठक स्वतंत्र होता है अपने तरीके से उपन्यास की यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए।

एक पठनीय किताब

स्कूल की नौकरी से इस्तीफ़े के बाद उपन्यास का नायक कहता है, “अपने अतीत,वर्तमान और भविष्य तीनों से मैं अपने को एक साथ मुक्त महसूस कर रहा था। अब फर्श की दरी या दरवाज़ों के पीछे पड़े परदों पर पड़ी किसी और छाप से मुझे वास्ता था, न अपनी छाप से। इतने दिन वहाँ रह चुकने के बाद मैंने अपने को फिर से कोरा कर लिया था।”

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