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ब्लैकबोर्ड और किताबों से बग़ैर समझे कॉपी में उतारने वाली स्थिति कैसे बदलेगी?

20180728_163130.jpgहम बच्चों की शिक्षा से जुड़े कुछ प्रश्नों पर विचार करें। स्कूलों में बच्चों के सीखने का स्तर अपेक्षाओं से कम क्यों है ? शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद बहुत से बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करने में असफल क्यों होते हैं ? सारे प्रयासों के बाद भी सभी के लिए गुणवत्ता शिक्षा उपलब्ध नहीं हो पा रही है , क्या हमारी समझ में कोई कमी है ? पढ़िए संजय गुलाटी द्वारा लिखित एक जरूरी और समसामयिक आलेख। 

शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं / विशेषज्ञों / शिक्षाविदों के बीच पिछले कुछ वर्षों से यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या स्कूल में उपयोग की जाने वाली भाषा का बच्चों के सफल या असफल होने से कोई संबंध है ? यह प्रश्न भी पूछा जाने लगा है कि सीखने-सिखाने की भाषा बच्चों के दैनिक जीवन में उपयोग की जाने वाली भाषा के कितने करीब है? दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किए गए शोध के परिणाम इस ओर इशारा करते हैं कि यदि बच्चों की भाषा स्कूल में उपयोग नहीं होती है , तो बच्चे स्कूल की गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं लेते , सीखने में कठिनाई महसूस करते हैं और सीखने में पिछड़ जाते हैं।

भाषा और सीखने में क्या संबंध है?

शिक्षाविदों का मानना है कि बच्चों की मातृभाषा या प्रथम भाषा (First Language) का शिक्षा में उपयोग करने से उनकी शैक्षिक सफलता की संभावना सबसे अधिक होती है। यही कारण है कि मातृभाषा-आधारित शिक्षा को बच्चों के सहज और अर्थपूर्ण सीखने के उपाय के रूप में देखा जा रहा है और कई देश इसका क्रियांवयन भी कर रहे हैं।

जैसा कि बताया गया है कि बच्चे उसी भाषा में सबसे अच्छे से सीखते हैं जिस भाषा का उपयोग वे घर में करते हैं । इसका कारण है कि बच्चे अपनी भाषा की नयी जानकारियों को पहले से समझी बातों से जोड़कर दुनिया को समझने का प्रयास करते हैं। बच्चे अन्य (द्वितीय) भाषा को तभी समझ सकते हैं जब वे उस भाषा का अपने दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं । बच्चे अवलोकन और परस्पर चर्चा के जरिए भाषा के व्यवहार में सक्षम बनते हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो केवल स्कूल में उपयोग करके ही बच्चों को द्वितीय भाषा (Second Language) सिखाना एक कठिन कार्य है। स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले पाठों के संदर्भ बच्चों की वास्तविकता से अलग होते हैं , कक्षा में शिक्षक ही अधिक बोलते हैं और बच्चों को भाषा के उपयोग के मौके कम मिलते हैं । इन कारणों से बच्चों की भाषायी-क्षमता का विकास प्रभावित होता है। कुछ शिक्षकों को विशेषरूप से बच्चों में द्वितीय भाषा के अर्जन को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है परन्तु वे पाठ्यचर्या को ही उस भाषा में पढ़ाना प्रारंभ कर देते हैं जैसे कि बच्चे इसे पहले से ही समझते हैं।

संदर्भ का अर्थ-निर्माण के साथ गहरा रिश्ता

स्कूल में जिन बच्चों की शिक्षा उनकी मातृभाषा में न होकर द्वितीय भाषा में होती है , उनसे यह उम्मीद की जाती है कि  दूसरी भाषा में किसी अवधारणा को सीखने के लिए उसे पहले अपनी प्रथम भाषा में सीखी संबंधित अवधारणा से जोड़ें और फिर उपयोग करें । इसके विपरीत उतने ही समय में मातृभाषा में शिक्षण होने पर एक बच्चा विषयवस्तु को अपनी जानी पहचानी भाषा और संदर्भों में समझकर सीखता है। इस प्रकार भाषा बच्चे के लिए अर्थपूर्ण समझ विकसित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब भाषा का उपयोग बच्चे के संदर्भों में नहीं किया जाता है तब उससे अर्थ-निर्माण कर पाना अधिक कठिन होता है।

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द्वितीय भाषा में बच्चों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करना वास्तविकता से परे होगा विशेषकर उस स्थिति में जब वे भूख , कुपोषण , खराब स्वास्थ्य या पालकों द्वारा पढ़ाई संबंधी मदद नहीं कर पाने आदि से भी प्रभावित होते हैं । इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धि स्तर को बढ़ाने के केन्द्र में बच्चा ही है ।

इसलिए बेहतर होगा कि शिक्षण-व्यवस्था इस प्रकार की हो जो बच्चों के लिए सीखने को सहज बनाए न कि उनके लिए कठिनाई के स्तर को बढ़ाएं। इसी तरह द्वितीय भाषा में आकलन करने से बच्चे की क्षतमाओं और कौशलों के वास्तविक स्तर के बारे में भी भ्रामक जानकारियां मिलने की संभावना होती है। इस प्रकार के आकलन से केवल यही जानकारी मिल सकती है कि बच्चा द्वितीय भाषा में कितना अच्छा प्रदर्शन कर सकता है।

ब्लैकबोर्ड और किताबों से पाठ को बगैर समझे उतारने वाली स्थिति

स्कूल में पढ़ना और लिखना सिखाने की भाषा यदि बच्चे के लिए नयी होती है तब साक्षरता शिक्षण चुनौतीपूर्ण हो जाता है। बोले / पढे गए शब्दों के विचारों को लिखने से जोड़ने की प्रक्रिया की साक्षरता के रूप में व्याख्या की जा सकती है। एक बच्चा शब्द से जुड़े विचार को उसके लिखित रूप से जोड़कर साक्षर होने की शुरूवात करता है। एक अनजान भाषा में होने के कारण यदि बच्चा किसी शब्द का अर्थ नहीं समझ पाता है,तब उस शब्द को ‘पढ़ना और लिखना सीखना’ साक्षरता के अंतर्गत नहीं आता , यह केवल दोहराना (उच्चारण या डिकोडिंग) होता है। इस बात की आशंका है कि लाखों बच्चे स्वयं की पठन और लेखन क्षमताओं को विकसित किए बिना ब्लैकबोर्ड और किताबों से पाठ को उतारना और दोहराना सीख रहे हैं।

अर्ली लिट्रेसी, एजुकेशन मिरर, सरकारी बनाम निजी स्कूल, पठन कौशल का विकास, पढ़ना कैसे सिखाएंस्कूल के प्रारंभिक वर्षों से ही बच्चों को द्वितीय भाषा के कौशलों से परिचित कराना संभव है और यह एक सार्थक कदम भी है। यदि शुरूवात जल्दी की जाए तो छोटे बच्चों में भाषायी कौशल अच्छी तरह से विकसित हो सकते हैं।

हालांकि , द्वितीय भाषा की शब्दावली और ढांचे से परिचय तभी कराया जाना चाहिए जब बच्चे अपनी प्रथम भाषा में संबंधित अवधारणा को समझ चुके हों । यह बच्चों को द्वितीय भाषा में अर्थ निर्माण करने में मदद करता है । बच्चों को स्कूल के शुरूवाती वर्षों से ही धीरे-धीरे द्वितीय भाषा का परिचय देते हुए इस कार्य को कार्य कक्षा-5 तक लगातार जारी रखना चाहिए । उसके बाद ही द्वितीय भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

मातृभाषा से दूसरी भाषा की तरफ कैसे बढ़ें?

चूँकि बच्चे विचारों और भाषा को जोड़कर ही अर्थ निर्माण करते हैं , स्कूली भाषा में अचानक बदलाव करने से सीखना बाधित होता है। बच्चों के द्वारा समझी जाने वाली भाषा से बिल्कुल अलग किसी भाषा में शिक्षण किए जाने से बच्चों का ध्यान भटकता है और वे भ्रमित हो जाते हैं।स्कूल में भाषाओं के उपयोग का योगशील नजरिया (additive approach) एक अच्छा अभ्यास है जिसमें द्वितीय भाषा को दिया जाने वाला समय क्रमश: बढ़ता है और सीखने – सिखाने की प्रक्रिया में प्रथम भाषा लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

शिक्षक भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि बच्चे अपरिचित / नयी भाषा से संघर्ष करते हैं । बच्चों की मदद करने के लिए वे बच्चों की भाषा और स्कूली भाषा के बीच अनुवाद करने का प्रयास करते हैं।यह कार्य समय लेता है जिसकी भरपाई करने के लिए पाठ्यक्रम को कम करना होता है। यह बच्चों में दोनों भाषाओं को जोड़ने की क्षमता बढ़ाने के स्थान पर उन्हें भ्रमित कर सकता है ।

ये सभी बिन्दु उन बच्चों की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं जो ऐसे समुदायों में रहते हैं जो मुख्यत: स्थानीय भाषा बोलते हैं और जिनके पास द्वितीय भाषा के संसाधनों तक की पहुँच नहीं है। उन बच्चों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जो अपनी शिक्षा में गरीबी , भेदभाव , कठिन परिस्थितियों में रहना या पालकों की अशिक्षा जैसी विषम परिस्थितियों का सामना करते हैं।

(संजय गुलाटी शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 21 सालों से काम कर रहे हैं। आपके पास 15 सालों का शिक्षण अनुभव है। अभी आप शिक्षकों के प्रोफेशनल डेवेलपमेंट को लेकर काम कर रहे हैं।) 

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