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बातचीत की प्रक्रिया में ‘सुनने’ का क्या महत्व है?

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हमारे सबसे अच्छे दोस्त वो सहपाठी होते हैं जो हमें सुनते हैं।

प्रभावशाली वक्ता कैसे बनें? इस सवाल के जवाब में सैकड़ों आलेख और किताबों लिखी गयीं। मगर इसका सबसे आसान सा जवाब है कि एक अच्छा श्रोता होना। एक अच्छे श्रोता में चीज़ों को ग्रहण करने की सामर्थ्य या क्षमता का विकास स्वभाविक ढंग से होता है। मगर वक्त बनने की एक जरूरत उस मनोवैज्ञानिक डर को भी पार करने की होती है, जिसे ‘पब्लिक फियर’ कहते हैं। इससे पार पाने के बाद व्यक्ति अपनी बात को ज्यादा सहज ढंग से कह पाता है।

शिक्षा और संवाद

शिक्षा के साथ संवाद का गहरा रिश्ता है। एक शिक्षक का अपने छात्रों के साथ निरंतर होने वाली बातचीत बेहद जरूरी है। इससे शिक्षक और छात्रों के बीच का रिश्ता मजबूत होता है। इस संवाद की एक अहम कड़ी है सुनना। छात्र, अपने उस शिक्षक को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं जो उनकी बात सुनते हैं। उनके पक्ष को समझने की कोशिश करती हैं। उनके सवालों को प्रोत्साहित करते हैं। उनकी जिज्ञासा को बाहर आने के लिए प्रेरित करने वाला माहौल बनाते हैं।

दोस्ती और सुनना

आमतौर पर कहा जाता है कि एक शिक्षक को अपने छात्रों का दोस्त होना चाहिए। दोस्ती का यह रिश्ता माता-पिता व बच्चों के बीच भी होना चाहिए। ऐसे रिश्ते की बुनियाद में निरंतर संवाद और एक-दूसरे को सुनने की आदत का विकास एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी आवाज़ के प्रति सजग होना मात्र ही सुनना नहीं है।

सुनने का वास्तविक अर्थ है कि सुनी हुई बात की व्याख्या या उसके संदर्भ तक पहुंचना, इसके जरिए ही किसी बात के मर्म या अर्थ तक पहुंचा जा सकता है। यानि सुनना वास्तव में तभी होता है जब हम किसी बात को उसके संदर्भ में पकड़ पाते हैं या समझ पाते हैं। शायद ऐसे ही किसी लम्हे में एक किरदार दूसरे से कहता होगा, “सही पकड़े हैं।” यानि एक वक्ता अपने श्रोता का शुक्रिया कहता है कि आपने सही समझा है।

प्रभावशाली तरीके से कैसे सुनें?

बहुत सारी समस्याओं की बुनियाद में सामने वाले व्यक्ति को प्रभावशाली ढंग से न सुन पाना ही होता है। किसी को समझने का सबसे आसान तरीका है। उसको सुनने। उसकी कही हुई बातों के पैटर्न को समझना। क्योंकि हर किसी के अपनी बात को कहने का या सलीका अलग-अलग होता है। आमतौर पर भाषायी कौशलों के चार प्रकार बताए जाते हैं सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना। इसमें एक का जिक्र नहीं है, उसे सोचना या चिंतन करना कहते हैं। इसके जरिए ही हम किसी की बात सुनकर समझ पाते हैं। इसके अनुरूप उसको जवाब देते हैं। किसी की लिखी बात को पढ़कर समझना और किसी को लिखकर जवाब देना भी भाषायी कौशलों के विकास की प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

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