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शारीरिक शिक्षकों के लिए क्यों तरस रहे हैं हमारे विद्यालय और बच्चे?

एक शिक्षक

सरकारी विद्यालयों में खेल की गतिविधियों को बढ़ावा देने के सकारात्मक प्रयास भी हो रहे हैं।

वर्तमान समय में शिक्षा बहुत जरुरी है शारीरिक शिक्षा भी सामान्य शिक्षा की तरह उसी का एक अंग है | केवल अंतर इतना ही है कि जहाँ सामान्य शिक्षा साधारणत: कक्षा या प्रयोगशालाओं में ही दी जाती है वहीँ शारीरिक शिक्षा, खेल के मैदानों अथवा शिविरों में अधिक तथा कक्षा में कम दी जाती है।

आज के समय में खेल एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा विधार्थी एक दुसरे के सम्पर्क में आता है और बिना किसी भेदभाव के एक दुसरे के रहन-सहन के ढंग व भाषा आदि को समझते है इससे उनमे आपसी मित्रता बढती है।

शारीरिक शिक्षा की जरूरत और महत्व

शारीरक शिक्षा की अवधारणा का जन्म सभ्यता के विकास के साथ ही प्रारम्भ हो गया था जिसके कारण शिक्षा में शारीरक शिक्षा की अनिवार्यता पुराने समय से लेकर अभी तक बनी हुई है | बच्चों में शारीरिक शिक्षा ना केवल शारीरिक विकास के लिए जरुरी है बल्कि मानसिक विकास के लिए भी बहुत जरुरी है | शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में भी शारीरिक शिक्षा के प्रावधान है जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक कक्षा के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार खेल सामग्री उपलब्ध करवाई जाये, वही बाल अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय खेल संघ यूएन कन्वेंशन के अनुच्छेद 31 में कहा गया है कि खेल शिक्षा का हिस्सा है व औपचारिक शिक्षा प्रणालियों में खेल के माध्यम से पहल, सहभागिता, रचनात्मकता और सामाजिककरण के अवसर प्रदान करें।

लेकिन शारीरिक शिक्षा का इतना महत्व होने के बाद भी वर्तमान में शिक्षा प्रणाली में इस पर कम ध्यान दिया जा रहा है | प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की ताजा रिपोर्ट ‘असर 2018’ में जो स्थिति सामने आ रही है वह सोचनीय है | असर रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में अभी भी कक्षा 1 से 8 के करीब 50 प्रतिशत विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा के लिए अलग से शिक्षक नियुक्त नही है | शारीरिक शिक्षा के लिए खेल मैदान होना अत्यंत आवश्यक होता है वही राजस्थान के प्रारम्भिक शिक्षा वाले विद्यालयों में खेल मैदान की बात की जाये तो 83 प्रतिशत विद्यालयों में ही खेल का मैदान है।

ज़मीनी स्थिति क्या है?

लगभग 65 प्रतिशत विद्यालयों में ही खेल उपकरणों की उपलब्धता है यानि की अभी भी 35 प्रतिशत विद्यालयों में तो किसी भी प्रकार के खेल उपकरण तक उपलब्ध नही है | असर के अनुसार राजस्थान के करीब 66 प्रतिशत विद्यालयों में ही शारीरिक शिक्षा के लिए अलग से सत्र यानि की समय निर्धारित किया गया है | 34 प्रतिशत विद्यालयों में तो शारीरिक शिक्षा के लिए समय तक निर्धारित नही किया गया है | जब राजस्थान के आधे विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा के लिए शिक्षक ही उपलब्ध नही है तो हम कैसे उम्मीद कर सकते है, कि बच्चों का शारीरिक विकास हम ठीक से कर पा रहे है।

अन्य राज्यों की स्थिति :-

राज्य शारीरिक शिक्षा के लिए अलग से शिक्षक की नियुक्त शारीरिक शिक्षा के लिए प्रतिदिन सत्र खेल मैदान उपलब्ध उपलब्ध खेल सामग्री
राजस्थान 51.5 65.8 82.9 65.4
छत्तीसगढ़ 8.5 65.9 88.2 49.6
मध्यप्रदेश 7.0 59.8 82.5 57.4
हरियाणा 29.2 44.6 93.4 61.2
सम्पूर्ण भारत 16.5 62.9 82.8 62.5
यह आंकड़े प्रतिशत में दिए गये है |

इस स्थिति को ध्यान में रख कर बात की जाये तो हमारे पाठ्यक्रम और विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा को आज भी बहुत कम महत्व दिया जा रहा है | हालाँकि सीबीएसई ने हाल ही में जारी अपने सर्कुलर में कहा है, कि 1 अप्रैल से आठवीं तक के विद्यालयों में रोजाना एक सत्र खेलकूद का रखा जायेगा | लेकिन अभी भी राजस्थान ही नही सम्पूर्ण भारत के विद्यालय शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों की कमी से जूझ रहे है।

शारीरिक शिक्षा को ध्यान में नही रखना शायद बच्चों के पढनें के स्तरों को भी प्रभावित कर रहा है | सच तो यह है कि ऐसे ही चलता रहा तो हम धीरे- धीरे एक शिक्षित व स्वस्थ राष्ट्र बननें के लक्ष्य से कोसों दूर होते जायेंगे | हमारें नीति-निर्माताओं को स्कूलों में बेहतर बुनियादी शिक्षण व भौतिक ढांचे को विकसित करने के साथ ही शारीरिक शिक्षा पर भी बहुत काम करने की आवश्यकता है | “खेलेगा इंडिया तो आगे बढ़ेगा इंडिया” का सपना दिखानें वाले भी यह भूल रहे है की जब तक विद्यालयों में खेलों के लिए शारीरिक शिक्षक नही होंगे तब तक कैसे खेलेगा इंडिया और कैसे आगे बढ़ेगा इंडिया।

(नोटः यह जानकारी असर सेंटर के रिसर्च टीम की तरफ से राम कृष्ण चौधरी द्वारा एजुकेशन मिरर के साथ साझा की गई है।)

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