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ऑनलाइन शिक्षा: तनाव में क्यों हैं बच्चे और अभिभावक?

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कोविड-19 के कारण भारत के विभिन्न हिस्सों में मार्च के तीसरे सप्ताह से स्कूल और कॉलेज बंद हैं।

वैश्विक महामारी कोविड-19 ( कोरोना) की वजह से सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक इत्यादि पहलुओं से समाज की स्थितियों में बहुत बदलाव आ गया है। जिस वक़्त पहले लॉकडाउन की तैयारी जनता कर्फ़्यू के साथ हो रही थी। उसी समय बच्चों की वार्षिक परीक्षाएं हो रही थी या होने वाली थी। गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों में लगभग परीक्षाएं पूरी हो गई थीं। प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में परीक्षाएं नहीं हो पाई थी। ख़बर आई कि स्कूल खुलने पर सभी बच्चों को पास करके अगली कक्षा में प्रवेश दे दिया जायेगा। लॉकडाउन के दौरान ही लगभग मध्य अप्रैल से ही बच्चों के माता पिता के पास संस्थागत स्कूलों की ओर से फ़ोन आने लगा कि वो अपने बच्चों की फीस जमा करे और अगली कक्षा की किताब-कॉपी भी दुकानों से खरीद लें।

दूसरे लॉकडाउन के बाद लगभग 45 दिन गुज़र गया था। जिससे कई परिवारों में पैसों की किल्लत शुरू हो गई थी। अभी कब तक लॉकडाउन खुलने के साथ पहले जैसी स्थितियाँ होगी। इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता था। फिर जो पैसे है उससे परिवार के लिए राशन पानी का बंदोबस्त किया जाये या बच्चों की पढ़ाई कराई जाए। जैसे-तैसे परिवार ने कॉपी किताब का इंतज़ाम कराया और स्कूलों की ऑनलाइन शिक्षा के लिए काम मोबाइल के माध्यम से ज़ारी हो गया। शुरू शुरू में मोबाइल के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने में बहुत उत्सुकता बनी। फिर धीरे धीरे यह उत्सुकता तनाव में बदलने लगी। अब बच्चे और टीचर तो घंटी से पढ़ाई के आदि हो जाते है। हिंदी, इंग्लिश, मैथ, ई वी एस, कंप्यूटर की अलग अलग क्लास चलने लगी। मैम लेशन का पाठ करती, प्रश्नों उत्तर लिख कर देती। फिर उनपर सवाल पूछती और इधर मम्मी, पापा, बुआ, बड़ी बहन, ट्यूशन टीचर में से कोई ना कोई एक दो बच्चे के साथ इस काम में लगा रहता है।

अब ऐसा नहीं है कि सभी बच्चों के माँ-बाप या परिवार के अन्य सदस्य पढ़े लिखे नहीं है। लेकिन पढ़ाई में बदलाव है और स्पीड का भी मामला है। तो एक क्लास का काम उसी क्लास के समय में बच्चे पूरा नहीं का पा रहे है। पाँच मिनट लेट होने पर मैम लोग अपने वाट्सप इनबॉक्स में मैसेज लेना बंद कर देती है। ऐसी देरी कई बार होने से अभिभावकों में बहुत ज्यादा तनाव होने की स्थितियाँ भी बन रही है। जहाँ एक ओर इस मुसीबत के समय में परिवार के भरण पोषण, स्वस्थ्य, सुरक्षा के लिए लोग जद्दोजहद कर रहे है। वहीं ऑनलाइन शिक्षा की वजह से बच्चों की शिक्षा के लिए भी काफ़ी मुश्किल परिवार झेल रहे है।

‘टीवी और मोबाइल से दूर रहने वाली सलाह’ की ज़मीनी सच्चाई

जहाँ एक ओर स्कूलों में बच्चों को टीवी और मोबाइल से दूर रहने की सलाह लगभग हर शिक्षक देता है वहीं आज 4-5 घंटे मोबाइल में देखकर बच्चों को काम करने के लिए कहा जा रहा है। क्या कोरोना काल में अब मोबाइल से देखकर पढ़ने से बच्चों की आँखों और दिमाग पर कोई विपरीत असर नहीं होगा? और तो और बच्चे बच्चे होते है। जब उनके हाथ में मोबाइल होता है तो वो टीचर की बात सुनने की बजाए यूट्यूब देखने या गेम खेलने में लग जाती है। इससे क्लास छूट जाती है और डांट अलग से पड़ती है। अभी तो बच्चों की ऑनलाइन परीक्षा भी ली जा रही है। जहाँ ट्यूशन टीचर, माँ बाप मिलकर बच्चों का एग्जाम दे रहे है। जो एग्जाम ले रहे है उनको भी इस बात का पता है कि बच्चों के साथ और लोग भी लगे है। तब ही तो बच्चा काम कर रहा है। तो भी ना जाने क्यों एग्जाम लिया जा रहा है?

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इस कोरोना काल की ऑनलाइन शिक्षा की क्या बहुत ज़रूरत बच्चों को है? क्या 3-4 महीने बच्चे अपनी स्कूली पढ़ाई से दूर रहने पर पढ़ाई को पुनः पहले की तरह से सुव्यवस्थित नहीं कर पाएंगे? या यह ऑनलाइन पढ़ाई सिर्फ संस्थागत स्कूलों की अपनी मर्जी है। जिससे की उनको मिलने वाली फीस ना रुकने पाए।

विद्यालयों में जो राशि फ़ीस के तौर पर जमा होती थी, उसमें अलग-अलग शैक्षणिक कामों की राशि होती थी। जैसे ट्यूशन फीस, एग्जामिनेशन फीस, रिसोर्सेस फीस, कंप्यूटर फीस, गेम व लाइब्रेरी फीस, क्लासरूम फीस, फैसिलिटेशन फीस यह सारी चीज मिलाकर विद्यालयों की चीज बनती थी। इनमें से ज्यादातर चीजें छात्रों को अभी नहीं मिल रही हैं। तो विद्यालयों को कुछ रियायत देनी चाहिए। अलग-अलग प्राइवेट स्कूल अपनी इन्हीं सुविधाओं की वजह से जाने जाते हैं। किसी स्कूल में प्रोजेक्टर लगा है, इसी में स्मार्ट क्लासेस और उन्होंने अपने छात्रों को ऐसे ही पढ़ाने की आदत डाली हैं। अब अचानक से ऐसे बदलाव होने से जो छात्र हैं उनको चीजें समझ नहीं आ रही हैं।

टेक्नोलॉजी की बात करें तो यह बहुत गैप बढ़ा देती है। जिसको मोबाइल और बाकी चीजें चलाना अच्छे से आता है। वह बहुत आगे पहुंच जाता है और जिसको यह सब चीजें चलानी नहीं आती वह पीछे छूट जाता है। ऐसे में जो माँ-बाप पढ़े-लिखे नहीं है और अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं वह चाहते हुए भी अपने बच्चों की मदद नहीं कर पाते।

सक्षम परिवार बच्चों की फीस जरूर दें

तो मेरा कहना है कि जो परिवार सक्षम है वो बच्चों की फीस ज़रूर दें। क्योंकि उनकी फ़ीस से ही स्कूल चलता है। पर जो लोग दिक्कत में है उनके बारे में स्कूल प्रबंधन थोड़ा विचार करे। क्योंकि इस ऑनलाइन पढ़ाई का बहुत ज्यादा मतलब नहीं है। बहुत सारे छात्र ऐसी भी जगह पर रहते हैं जहां इंटरनेट और मोबाइल की सुविधा नहीं है। बहुत से छात्र अपने गांव चले गए हैं क्योंकि शहर में उनके मां-बाप का काम रुक गया था, और गांव में इतनी व्यवस्था नहीं है कि वह नेटवर्क कनेक्शन ला सकें और ऑनलाइन क्लास ले सकें।

WhatsApp Image 2020-06-25 at 12.55.38 AMबच्चों को कहानी, किस्से सुनाए जाये। कॉमिक्स व किताबें पढ़ने के लिए दी जाएं। कुछ पेंटिंग, आर्ट, प्रोजेक्ट पर काम दिया जाये। इस काम को मज़े के साथ किया जाये। मज़े और ख़ुशी से काम करने में दिमाग और कौशल दोनों का विकास होता है। दबाव में ज्ञान, कौशल नहीं बढ़ता है। बढ़ता है तो सिर्फ और सिर्फ दबाव और तनाव, जो बच्चों के साथ परिवार पर भी हावी हो रहा है। यह किसी भी स्वस्थ्य सामाजिक, शैक्षणिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।

(आफ़ाक़ उल्लाह, फ़ैज़ाबाद में अवध पीपुल्स फोरम संस्था के जरिये स्कूलों के साथ काम करते हैं। शिक्षा से संबंधित लेख, विश्लेषण और समसामयिक चर्चा के लिए आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें। एजुकेशन मिरर अब टेलीग्राम पर भी उपलब्ध है। यहां क्लिक करके आप सब्सक्राइब कर सकते हैं। एजुकेशन मिरर के लिए अपनी स्टोरी/लेख भेजें Whatsapp: 9076578600 पर, Email: educationmirrors@gmail.com पर।)

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