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चर्चा मेंः ‘कोविड प्रोटोकॉल को फॉलो करते हुए स्कूल खोलने की करें तैयारी’

पूरे भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर के कारण अप्रैल महीने 2021 के बाद से स्कूल थोड़े समय के लिए खुलने के बाद फिर से बंद हो गए। पिछले डेढ़ साल से पूर्व-प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के साथ-साथ उच्च शिक्षा संस्थान भी बंद हैं।

उच्च शिक्षा संस्थान को खोलने को लेकर ऐसे नियम बनाए गये हैं जिनका पालन किसी भी हाल में संभव नहीं है, ऐसे में हॉस्टल्स में छात्र-छात्राओं की उम्मीद अभी भी निराशा के गहन अंधकार में गोते लगा रही है। कुछ उच्च शिक्षण संस्थाओं ने ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम से और कहीं-कहीं विशेष परिस्थिति में हॉस्टल में छात्र-छात्राओं के रहते हुए ऑनलाइन शिक्षण के माध्यम से शिक्षा को जारी रखने का प्रयास किया है। यह इस दौर में काबिल-ए-ग़ौर है कि शिक्षा की निरंतरता को जारी रखने की उम्मीद ज़िंदा है।

वर्तमान प्रयासों की सीमित पहुंच है चिंता का विषय

माध्यमिक स्तर पर भी ऑनलाइन कक्षाओं का 2-3 घंटे के लिए संचालन सरकारी विद्यालयों व निजी शिक्षण संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। लेकिन ऐसे प्रयास अभी भी उन बच्चों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जिनकी पहुंच स्मार्टफ़ोन तक नहीं है। अगर बच्चों के घर में स्मार्टफ़ोन है भी डेटा का रिचार्ज और एक ही फोन पर पूरे परिवार की निर्भरता बच्चों की पढ़ाई की राह में आड़े आ रही है। अगर परिवार में एक से ज्यादा बच्चे हैं और दोनों बच्चे अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ रहे हैं तो भी ऑनलाइन संचालित हो रही कक्षाओं और ई-पाठशाला जैसे अभिनव प्रयासों का कोई ख़ास लाभ पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है।

हमारे पास विकल्प क्या हैं?

ऐसी परिस्थिति में हमारे पास क्या विकल्प बचते हैं? ई-पाठशाला की निरंतरता और मोहल्ला कक्षाओं का संचालन। इससे ज्यादा बेहतर विकल्प शिक्षकों की राय में सीमित कक्षाओं के बच्चों को बुलाना और उनके लिए कुछ घंटों के लिए कक्षाओं का नियमित संचालन करना बच्चों को पढ़ने की आदत को फिर से हासिल करने की दृष्टि से काफी उपयोगी होगा। रेमेडियल टीचिंग से संभलने वाले हालात अभी नहीं है, वर्तमान परिस्थिति में पूरे पाठ्यक्रम को वर्तमान के अनुसार समायोजित करने और स्कूल रेडिनेस, बुनियादी साक्षरता व अंकगणित पर ध्यान देने की जरूरत है।

इसके साथ ही साथ बच्चों को बदलाव की परिस्थिति में बेहतर समायोजन करने, भावनात्मक रूप से खुद को सुरक्षित रखने और शैक्षिक जरूरतों के लिए नेतृत्व लेकर और पहल करके समाधान खोजने की मनोवृत्ति या नज़रिया विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित करना होगा। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा की बजाय आपसी सहयोग से समस्याओं का समाधान खोजने की तैयारी वास्तव में बच्चों को भविष्य की किसी भी बड़ी चुनौती का सामना करने में सक्षम बनाएगी और यही वास्तव में सच्ची शिक्षा होगी जो बच्चों को पढ़ना-लिखना, तर्क व विश्लेषण करना सिखाने के साथ-साथ जीवन की वास्तविक परिस्थितियों की समझ विकसित करने और बेहतर निर्णय करने का रास्ता देगी।

आख़िर में यही बात कही जा सकती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड प्रोटोकॉल को लेकर जो अनदेखी अभी हो रही है। उसे देखते हुए बच्चों को विद्यालय में बुलाना और उनको व्यक्तिगत स्वच्छता और कोविड-19 से लड़ाई के लिए तैयार करना ज्यादा जरूरी है ताकि हर परिवार को कोविड प्रोटोकॉल को लेकर जागरूक किया जा सके और तीसरी लहर की आशंका वाली स्थिति से निपटने के लिए पूर्व में तैयारी की जा सके।

(आप एजुकेशन मिरर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं। अपने आलेख और सुझाव भेजने के लिए ई-मेल करें mystory@educationmirror.org पर और ह्वाट्सऐप पर जुड़ें 9076578600 )

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