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भाषा शिक्षण: समझ के साथ पढ़ने में कैसे मदद करते हैं पूर्व ज्ञान और अनुभव?

हमने अबतक पढ़ा कि कैसे एक ही पाठ के अर्थ व्यक्तिगत अनुभवों और पूर्व ज्ञान के कारण अलग होते हैं। इस लेख में हम उस चर्चा को विस्तार देते हुए पूर्व ज्ञान और समझ के साथ पढ़ने के बीच क्या संबंध है, इसको लेकर अपनी समझ बनाएंगे। यह अनुभव आपकों कक्षा-कक्ष में इस प्रक्रिया को जीवंत रूप से देखने और समझने में मदद करेगी। 

गतिविधि-1 बच्चों से कहें कि वे नीचे लिखे वाक्य को पढ़ें और उसमें जिस पेड़ का पाठ में वर्णन किया गया है, उसका चित्र अपनी कॉपी में बनाएँ।

‘एक पेड़ था।  वह पेड़ बहुत सुंदर था। जो भी उस रास्ते से गुज़रता, एक बार रुककर उस पेड़ को ज़रूर देखता।’

 

अब देखें कि बच्चों के बनाए हुए चित्र लगभग एक जैसे हैं या अलग-अलग हैं और फिर सोचकर लिखें कि इसका कारण क्या होगा?

पढ़कर समझने का मतलब है किसी लिखे हुए पाठ में मौजूद जानकारी को अपने मौजूदा पूर्व ज्ञान या पूर्व अनुभवों से जोड़ पाना।

आमतौर पर किसी पाठ को पढ़ते हुए आपको क्या दिखाई देता है – लिखे हुए शब्द , एक वाक्य में उनका अलग-अलग स्थान (जो व्याकरण के नियमों से निर्धारित होता है) और अलग-अलग चिन्ह जो वाक्य के बीच में या आखिर में आते हैं। अपनी आँखों के सामने मौजूद इस जानकारी को आप अपने पूर्व ज्ञान से जोड़ते हैं। जो आपके सामने तो नहीं है लेकिन आपके दिमाग़ में कहीं मौजूद है या आपकी याददाश्त या मेमोरी में है और आप कहते हैं कि हाँ ये बात समझ आ गयी। लेकिन जैसे ही कुछ ऐसा लिखा होता है जिसे आप अपने पूर्व ज्ञान से नहीं जोड़ पाते, तो आप कहते हैं ये बात समझ में नहीं आई।

उदाहरण के लिए ये वाक्य पढ़ें –

वह किसी रेस्तराँ में गया।  उसने चारों तरफ़ देखा और एक सजी-धजी मेज़ पर उसकी नज़र पड़ी। वहाँ कोई नहीं बैठा था इसलिए वह वहाँ जाकर बैठ गए। उसे ज़ोरों की भूख लगी थी, इसलिए वह इंतज़ार में था कि कोई आए और पूछे।

यहाँ तक जो कुछ हो रहा है वह सब आपके पूर्व अनुभव में शामिल है। इसलिए आप जोड़ पा रहे हैं और समझ रहे हैं। अब अगला वाक्य ये है –

तभी एक बैरा आया और उसने पूछा, श्रीमान क्या आप नृत्य करना पसंद करेंगे?

यदि आपके अनुभव में ये बात नहीं है तो आप कहेंगे कि कुछ समझ में नहीं आया। रेस्तराँ में खाने के बारे में पूछने की जगह नृत्य करने के लिए पूछ रहे हैं। लेकिन जब एक बार आपने यह अनुभव कर लिया तो अगली बार से रेस्तराँ के संदर्भ में जो आपका पूर्व ज्ञान है उसमें यह नई बात या नया अनुभव भी शामिल हो जाएगा।

किसी भी पाठ में बहुत कुछ पाठक के पूर्व ज्ञान पर छोड़ दिया जाता है

एक अच्छा लेखक कभी भी पूरी जानकारी आपको नहीं देता। वह सिर्फ़ महत्वपूर्ण जानकारी देता है और बाक़ी चीजें लेखक पढ़ने वाले के पूर्व ज्ञान पर छोड़ देता है। इस बात को समझने के लिए हम नीचे लिखे वाक्य को पढ़ते हैं-

किसान ने शेर से कहा कि अगर तू बैल खा लेगा तो हम लोग भूखे मर जाएँगे।

यहाँ बैल खाने और भूखे मरने के बीच लेखक ने कई वाक्य छोड़ दिए हैं जैसे- तू बैल खा लेगा, तो खेत कौन जोतेगा। और खेत नहीं जुता तो फ़सल कैसे होगी। फ़सल नहीं होगी तो हम क्या बेचेंगे और फिर क्या खाएँगे। यानि हम लोग भूखे मर जाएँगे। यहाँ लेखक पाठक से उम्मीद करता है कि वह अपने पूर्व ज्ञान का इस्तेमाल कर इन दोनों वाक्यों के बीच की खाली जगह को आसानी से भर लेगा।

इस बीच की जगह को हमारा मस्तिष्क क्षण भर में ही भर देता है और हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम इन दोनों वाक्यों का अर्थ समझ गए। लेकिन ये कैसे हुआ कि हमारे दिमाग़ में मौजूद अगणित अनुभवों में से इन दो वाक्यों को पढ़ते वक़्त ठीक वही जानकारी हमें याद आ गयी जो काम की थी और वो भी इतने कम समय में।

‘पूर्व ज्ञान’ हमारे दिमाग़ में किस तरह संगठित रहता है?

ऐसा हम भाषा के ज़रिए करते है – शब्दों और उनके बीच के संबंध बनाकर। जब भी हम लिखे हुए शब्द देखते हैं तो उनसे जुड़ी हुई छवियाँ हमारे दिमाग़ में उभरती हैं। उदाहरण के लिए ऊपर लिखा हुआ वाक्य फिर से लेते हैं

किसान ने शेर से कहा कि अगर तू बैल खा लेगा तो हम लोग भूखे मर जाएँगे।

जब किसान शब्द आपके सामने आया तो इसके साथ और क्या-क्या मन में आया – शायद आपके मन में एक खेत का चित्र उभरा, जिसमें एक तरफ़ किसान और बैल खड़े हैं व एक तरफ़ शेर। आपने लहलहाती फ़सल को भी देखा,पेड़, पौधे व पक्षी भी हो सकता है आपने देखे हों। हाल ही में यदि आप किसी किसान से मिले हों या खेत गए हों तो वे सब दृश्य भी आपके मानस पटल पर उभेरेंगे। हम हमारे ज्ञान और अनुभवों को शब्दों के माध्यम से ही स्मृति में संजोकर रखते हैं। यदि ऐसा ना हो तो क्या आप पढ़कर समझ पाएँगे? नहीं।

पर ज़रा सोचिए कि शब्द पर नज़र पड़ते ही उससे जुड़ी हुई दुनिया हमारे मानस पटल पर कैसे उभर आती है यानि इतने कम समय में ये कैसे हो पाता है। यही हमारे मस्तिष्क का कमाल है। जब भी हमारा मस्तिष्क ये देखता है कि दो घटनाएँ एक साथ घट रही हैं जैसे -जब भी खेत पर गए तो किसान की भी बात हुई या जब भी किसान का ज़िक्र आए तो खेत का भी ज़िक्र आया, तो मस्तिष्क इन दोनों के बीच एक सम्बंध बना देता है, वह मानता है कि ये दोनों चीज़ें एक साथ ही होंगी। और इस तरह अब जैसे ही किसान शब्द वह सुनेगा तो खेत को स्वतः ही आपके मन में जन्म दे देगा और इसी तरह खेत से जुड़े हुए अन्य अनुभवों को भी।

जब नए शब्द हमारी आँखों के सामने आते हैं तो मस्तिष्क तुरंत पहले देखे हुए शब्दों से उनका सम्बंध खोजता है जैसे – बैल शब्द सामने आने पर वह तुरंत पिछले शब्दों से उसका जुड़ाव देखेगा और किसान शब्द तो पहले से ही उसके मस्तिष्क में है। इसी तरह जब वाक्य में आया – हम लोग भूखे मर जाएँगे – तो मस्तिष्क किसान, बैल और भूखे मरने के आपसी संबंध को आपके मानसिक पटल पर उभार देगा। इसके लिए वह बैल व किसान से जुड़े हुए अनुभवों को और आगे बढ़ा कर देखेगा कि इसका भूखे मरने से क्या सम्बंध है? मस्तिष्क यह संबंध आसानी से खोज लेगा।

बैल नहीं – फ़सल नहीं जोतना – फ़सल नहीं  – आमदनी नहीं – भूखों मरना – किसान और उसके बच्चों के दुखी चहरे।

मस्तिष्क की अद्भुत गति

जैसे ही हम कोई नया शब्द पढ़ते हैं, हमारा मस्तिष्क तुरंत यह देखता है कि यह किसी पहले देखे गए शब्द या अनुभव से कैसे जुड़ सकता है। उदाहरण:

“बैल” शब्द आते ही मस्तिष्क किसान और खेत की याद दिलाता है।

“भूखे मरने” का विचार आते ही मस्तिष्क तुरंत उस कारण को खोजने लगता है—किसान → बैल → खेत → फ़सल → आमदनी → भोजन।

यह पूरी प्रक्रिया एक क्षण में हो जाती है और पाठक को यह अहसास भी नहीं होता कि वह इतनी जटिल संरचना में सोच रहा है।

आखिर में हम कह सकते हैं कि पढ़ना केवल शब्दों को देखना नहीं है, बल्कि उन्हें समझना है और यह समझ तभी बनती है जब पाठक अपने पूर्व ज्ञान और अनुभवों को सक्रिय रूप से पाठ से जोड़ पाता है। शिक्षण में यदि हम इस बात को पहचानते हैं और बच्चों के अनुभवों को कक्षा में स्थान देते हैं, तो वे न सिर्फ़ बेहतर समझते हैं बल्कि सीखना भी आनंददायक बनता है।

 

👉 शिक्षकों के लिए कुछ जरूरी सुझाव

  • हर पाठ को पढ़ाने से पहले बच्चों के पूर्व ज्ञान और अनुभवों को सक्रिय करें जो उस पाठ से संबंधित हों
  • बच्चों को अपने विचारों व अनुभवों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित करें
  • चर्चा में आने वाले नए शब्दों और विचारों से पहले उनसे संबंधित दृश्यों पर बात करें
  • बच्चों को पढ़ने के बाद काल्पनिक चित्र बनाने या कहानी बनाने के लिए प्रेरित करें।

(एजुकेशन मिरर से फ़ेसबुकएक्स और यूट्यूब के जरिए भी जुड़ सकते हैं। बच्चों की लिखी सामग्री और उनके बनाये चित्र, अपने मौलिक लेख, पसंदीदा विषय पर कक्षा-शिक्षण के अनुभव और विचार साझा कर सकते हैं educationmirrors@gmail.com पर।)

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