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सामाजिक-भावनात्मक विकास और अच्छी सेहत के लिए जरूरी है ‘प्रकृति से जुड़ाव’

रागिनी गुप्ता, प्रधानाध्यापक

‘विश्व ओजोन दिवस’ के अवसर पर बच्चों के साथ असेंबली में संवाद के माध्यम से ‘पर्यावरण संरक्षण’ को लेकर जागरूक किया। प्रकृति संरक्षण के बारे में विस्तार से बताते हुए जब वर्तमान में हो रही विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं से बच्चों को अवगत कराया तो अचानक थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया। कुछ देर बाद एक बच्ची अस्मिला ने पूछा कि ‘मैम जी, क्या हमारे गांव मे भी आपदा आ सकती है?”

पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता 

यह सवाल पूरे समाज का एक साझा सवाल है, जो बहुत से लोगों के मन में आता है लेकिन लोग पूछते नहीं। या इस सवाल की ज्यादा परवाह नहीं करते, क्योंकि प्राकृतिक आपदा का कहर किसी अन्य भौगोलिक क्षेत्र, राज्य के किसी दूसरे हिस्से या अन्य राज्य में हो रहा है। शिक्षा, इंसान को दुनिया के साझी चिंताओं के साथ खड़ा होने और समानुभूति के साथ समाधान को तत्पर होने की राह देती है।

बच्चों के साथ-साथ बड़ों की भी जिम्मेदारी है कि पर्यावरण की चिंताओं के प्रति सजग बनें और अपने छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को एक बड़े अभियान में परिवर्तित कर दें।हमारे बच्चे प्रकृति का महत्व समझें। प्रकृति से जुड़े और उसके साथ मैत्री भाव विकसित करें, इसके लिए विद्यालय परिवेश में बच्चों को ऐसी कार्यों में भागीदारी का अवसर देना चाहिए ताकि बच्चे संवेदनशील ,जिज्ञासु और जिम्मेदार बनें। ऐसे प्रयास बच्चोंको न केवल प्रकृति से जोड़ते हैं, बल्कि उन्हें सामाजिक-भावनात्मक रूप से मजबूत भी बनाते हैं।

प्रकृति और सीखना

प्रकृति और सीखने का एक सच्चा रिश्ता है। प्रकृति में अवलोकन और उस अवलोकन पर विचार करने मात्र से बहुत सी चीजें स्वतः समझ में आने लगती है। बच्चे भी प्रकृति से हर पल सीखते हैं। वे अपने आसपास के पेड़-पौधों, पक्षी, जीव-जन्तुओं, जानवरों, नदी, पहाड़, आसमान को उत्सुकता से देखते हैं।

कई बार बच्चे हमसे ऐसे अनोखे सवाल भी पूछते हैं जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। हमें बच्चों को उनके सवालों पर संवाद का मौका देना चाहिए, जिससे वे उन्हें समझ सकें, खोजी प्रवृत्ति के बनें और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए प्रयास करने को प्रोत्साहित हो सकें।

क्यों जरूरी है प्रकृति से जुड़ाव

प्रकृति के करीब होना हमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखता है। इसलिए भी बच्चों को खेल-खेल में प्रकृति के करीब रहने का अवसर देना चाहिए। इससे उनकी शारीरिक सेहत बेहतर होने के साथ-साथ दोस्तों के साथ संवाद से सामाजिक-भावनात्मक कौशल सीखने के अवसर भी सुलभ होंगे।

बच्चों को प्रकृति- संरक्षण के बारे में छोटे-छोटे उदाहरणों से करके सीखने के अवसर देना जरूरी है कि कैसे हम जल बचाएं, पौधे लगाएं और उनकी देखभाल करें, जब बिजली की जरूरत नहीं हो तो स्विच ऑफ करें, कॉपी का उचित इस्तेमाल करें, ,पॉलिथीन की बजाय कपड़े के थैलों का उपयोग करें। इससे वे अपनी सीख को घर पर भी इस्तेमाल कर सकेंगे। इस प्रक्रिया में नये सवालों को भी सामने लेकर आएंगे, जिनके समाधान की कोशिश पूरी क्लास एक साथ मिलकर कर सकती है।

इसके लिए मैंने अपने विद्यालय में इको कल्ब के माध्यम से एक पहल करते हुए पॉलीथीन इधर-उधर फेंकने वाले व्यवहार में बदलाव को लेकर काम किया। इस संवाद के बाद से मेरे बच्चे पॉलिथीन को बोतल में भरकर इकोब्रिक बनाते हैं और उसका प्रयोग ‘ट्री गार्ड’ के रूप में और क्यारी की ईंट के रूप में करते हैं। इसके साथ ही गीले कचरे को बच्चे नियत जगह पर डालते हैं और उसे जैविक खाद बनाने के लिए भी इस्तेमाल कर रहे हैं।

बच्चों के साथ सीखने और सिखाने की यह प्रक्रिया अभी भी जारी है, अगामी दिनों में आपके साथ कुछ अन्य अनुभव भी साझा करेंगे। प्रकृति के साथ सीखने-सिखाने की मेरी यह सी कोशिश आपको कैसी लगी, कमेंट करके जरूर बताएं। अगर आप भी अपने विद्यालय में ऐसा कोई नवाचार या प्रयास कर रहे हैं तो भी उसके बारे में कमेंट करके बताएं, मुझे भी आपके अनुभवों से सीखने और कुछ नया करने में मदद मिलेगी।

(परिचयः रागिनी गुप्ता, प्राथमिक विद्यालय ककोरगहना जौनपुर में प्रधानाध्यापक हैं। इस लेख में आपने बच्चों को पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूक करने के अपने अनुभव साझा किये हैं। आपके विद्यालय में बच्चे प्रत्येक शनिवार ‘इको क्लब’ के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं, इसे बच्चे खुशी-खुशी करते भी हैं और सीखते भी हैं। आपका विश्वास है कि ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों से भविष्य में हरित और स्वच्छ समाज का बनाने का सपना साकार हो सकेगा।)

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Anonymous

सभी प्रकृति से जुड़ें। स्वच्छ और स्वस्थ जीवन जीएं। सार्थक लेख के लिए धन्यवाद। 👏👏

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