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जरूरी मुद्दाः स्कूल में ठहराव सुनिश्चित करना , बच्चों का खेल नहीं है

प्राथमिक शिक्षा में सुधार को लेकर तमाम प्रयास जारी है। शिक्षक प्रयोगों की बाढ़ से परेशान हैं। शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं प्रयोगों के परिणाम को लेकर उत्साहित हैं। लेकिन बच्चों को स्कूलों से जोड़ने भर से बात बनती नहीं दिखती। नामांकन के साथ-साथ बच्चों का ठहराव सुनिश्चित करने का ठोस कार्यक्रम प्रवेश उत्सव के समकक्ष होना चाहिए।
लेकिन इस तरह के प्रयासों का सूखा बच्चों के ठहराव के लक्ष्य को दूर की कौड़ी बना रहा है। हर साल हजारों बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। उनके शिक्षा के अधिकारों का हनन हो रहा है। ठहराव को लेकर होने वाले प्रयास कोशिशें पर्याप्त नहीं है। ऐसे में हर साल सैकड़ों बच्चे बीच में स्कूल छोड़ देते हैं।

कुछ बच्चे पारिवारिक स्थिति के कारण काम पर चले जाते हैं। जैसे कुछ बच्चों को जानवरों को चराने के लिए जाना होता है। उन्हें घर पर छोटे बच्चों की देख-रेख करनी होती है। तमाम पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उनका स्कूल में आना संभव नहीं हो पाता। अभिभावकों की अपनी व्यस्तताएं होती हैं। वे स्कूल न जाने वाले बच्चों से सवाल नहीं पूछते। उनको टोकते नहीं कि आज स्कूल क्यों नहीं गए ? इस कारण से भी बच्चे स्कूल से अनुपस्थित रहते हैं। बच्चों की पढ़ाई के प्रति संवेदनशील शिक्षक अनियमित रहने पर बच्चों से सवाल पूछते हैं कि स्कूल क्यों नहीं आए थे ? कुछ शिक्षक अभिभावकों के घर भी जाते हैं।

शिक्षा विभाग की एक रिपोर्ट के 465 बच्चों नें अकेले डूंगरपुर जिले में पढ़ाई छोड़ दी है। (श्रोत – दैनिक भास्कर, 19 मार्च)। यह आंकड़े वार्षिक परीक्षा से पूर्व के हैं। डूंगरपुर के पांच ब्लॉकों की स्थिति बताते हुए रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सागवाड़ा से 207, डूंगरपुर से 162, आसपुर से 54, सीमलवाड़ा से 30 और विच्छीवाड़ा ब्लॉक से 12 बच्चों नें पढ़ाई छोड़ दी है। विच्छीवाड़ा के 12 बच्चों में से कुछ बच्चों से मुझे प्रत्यक्ष रूप से मिलने का मौका मिला। उनके अभिभावकों से प्रधानाध्यापकों नें संपर्क किया। व्यक्तिगत कारण जानने की कोशिश करते हुए पूछा कि आखिर वे स्कूल क्यों नहीं आना चाहते ? काबिल-ए-गौर बात है कि दोनों बच्चों के अभिभावक और रिश्तेदार चाहते हैं कि बच्चे स्कूल में पढ़ाई करें। जबकि बच्चे स्कूल आने से साफ इंकार करते हैं। तो कुछ बच्चे पारिवारिक मजबूरियों के कारण काम पर जाने को विवश हैं।
 एक लड़के का साफ तौर पर कहना है कि वह पढ़ाई नहीं नौकरी करना चाहता है। एक दिसंबर को लिखी अपनी ब्लॉग पोस्ट में इसका जिक्र किया है। वहीं दूसरी लड़की का कहना है कि उसे स्कूल में मन नहीं लगता। इसलिए वह स्कूल नहीं आना चाहती। सागवाड़ा के एक छात्र तेजपाल से मेरी मुलाकात अहमदाबाद  में हुई। उसकी उम्र करीब बारह साल है। वह कांकरिया नदी (जो वहां का एक पर्यटन स्थल है) के किनारे बने एक नाश्ते की स्टॉल पर काम करता है। उससे मिलने के पहले बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को कहते सुना था कि पलायन आदिवासी अंचल में एक गंभीर समस्या है, लेकिन तेजपाल से हुई मुलाकात नें मेरे मन में तमाम घटनाओं का चित्र जीवंत कर दिया।
फिनलैण्ड से मानवशास्त्र की पढ़ाई करने वाली सुवी शोध के सिलसिले में डूंगरपुर आयी थीं। उन्होनें शोध के निष्कर्षों के आधार पर बताया कि कुछ बच्चे गर्मी की छुट्टियों में अहमदाबाद काम करने के लिए जाते हैं।ताकि परिवार और पढ़ाई के खर्च के लिए पैसे जुटा सकें। इसके विपरीत कुछ बच्चे हमउम्र साथियों  के दबाव में बड़े शहरों में काम करने के लिए चले जाते हैं ताकि अपने मन पसंद की फैशनेबल चीजें खरीद सकें।  जाते हैं। उन्होनें महिलाओं के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि कुछ बच्चे स्कूलों से अरुचि और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पढ़ाई छोड़ देते है। जमीनी हकीकत को देखते हुए कहा जा सकता है कि बच्चों का ठहराव बच्चों का खेल नहीं है।इसके लिए तमाम तरह के प्रयासों की जरूरत है। जिसमें स्कूली शिक्षा को रोचक बनाने से लेकर, खेल की गतिविधियों को विस्तार देने, कमजोर बच्चों को मदद करने और शिक्षा को आजीविका के कौशलों से जोड़ने तक के तमाम सुझाव काबिल-ए-गौर लगते हैं। जो समय-समय पर शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं, संस्था प्रधानों और शिक्षाविदों द्वारा अनेक अवसरों पर बार-बार दोहराए जाते हैं। बच्चों के नामांकन के बाद ठहराव की चुनौती स्कूलों के सामने हैं। इसके बाद का सवाल गुणवत्ता पर आकर टिकता है। जिसके ऊपर अभी देश में विमर्श होना बाकी है। कुछ रिपोर्टों में केवल न्यून्तम लर्निंग लेबल के नाम पर अक्षर पहचानने और गणित के सवालों को हल करने का जिक्र होता है। लेकिन प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिशें अभी भी सुधारों की राह देख रही हैं।

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