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पड़ोस की चिड़िया भूखी न रहे, इसके लिए क्या करें?

एक दिन हमारे गाँव के सरकारी स्कूल में चिड़ियों को दाना खिलाने के लिए ‘अक्षयपात्र’ रखने की शुरूआत हुई. इसके लिए हर बच्चे को अपने घर से एक मुट्ठी दाना ला करके ‘अक्षयपात्र’ में डालना को कहा गया. हेड मास्टर जी ने बच्चों से कहा, “हमें पशु-पक्षियों से प्रेम करना चाहिए. हम स्कूल में चिड़ियों को दाना खिलाने की शुरुआत कर रहे हैं ताकि स्कूल के आंगन में आने वाली कोई भी चिड़िया भूखी-प्यासी न रहे.” स्कूल की असेंबली के दौरान बच्चों से होने वाली बातचीत मन को छूने वाली थी. मगर जब बच्चों से अगले दिन की असेंबली में पूछा गया कि उस दिन कौन-कौन अपने घर से चिड़ियों के लिए दाना लेकर आया है ? तो जवाब में सारे बच्चे इस उम्मीद में पीछे मुड़कर देख रहे थे कि शायद कोई और बच्चा जरूर चिड़ियों के लिए दाना लेकर आया होगा. लेकिन कोई भी बच्चा उस दिन स्कूल में चिड़ियों के लिए दाने लेकर नहीं आया था।

चिड़ियों को दाना देना क्यों जरूरी है?

ऐसी स्थिति में मुझे लगा कि अगर बच्चों को यह बात समझ आती है कि चिड़ियों के लिए दाना क्यों लाना है? तो फिर वे शायद यह काम ख़ुशी-ख़ुशी करेंगे. लेकिन इसके लिए अध्यापकों की तरफ़ से उनको प्रेरित करने वाला व्यवहार भी होना चाहिए. केवल बातों के माध्यम से सारी बात समझाने की कोशिश शायद सफल नहीं होगी. बच्चे भी तो जानवरों और पक्षियों के काफ़ी करीब हैं. अपने घरों में वे उनको करीब से देखते हैं और आस-पड़ोसी की चिड़ियों के उनके नाम, रंग और आवाज़ से पहचानते हैं. इसलिए मार्निंग असेंबली के बाद बच्चों से बात हुई कि हमें स्कूल में इस तरह के कार्यक्रम की जरूरत क्यों पड़ी?

आठवीं कक्षा के बच्चे आपस में बातचीत कर रहे थे. पहली घंटी में उनसे बातचीत का सिलसिला इस सवाल के साथ शुरू हुआ कि चिड़ियों के लिए दाना लाना क्यों जरूरी है ? तो उन्होनें जवाब दिया चिड़ियों के खाने के लिए…. मैनें कहा बिल्कुल ठीक है. मैंने कहा हम सुबह घर से नाश्ता करके निकलते हैं. स्कूल में आकर दोपहर में सबके साथ खाना खाते हैं. बीच-बीच में बाहर जाकर पानी पीते हैं. इस तरीके से पूरे दिन हमारा काम चल जाता है. चिड़ियों को भी तो भूख लगती होगी? उनको भी तो प्यास लगती होगी? उनकी भूख और प्यास के बारे में कौन सोचेगा? तो उन्होनें कहा कि हम सोमवार से (दो दिन बाद) दाना लेकर आएंगे. तो मुझे लगा कि इस एक पंक्ति से बच्चों को सोचने का मौका दिया जाए.

सूरज की रौशनी के लिए हम कितने पैसे देते हैं?

फिर मैनें पूछा किस-किस के घर में पालतू जानवर हैं तो जवाब में हर किसी के हाथ ऊपर थे. तो मैनें पूछा कि गाय, भैंस, बकरी को हम चारा क्यों खिलाते हैं क्योंकि हमें उनसे फायदा होता है? वे हमें दूध देती हैं. मुर्गी को हम दाना इसलिए खिलाते हैं क्योंकि मुर्गियां अण्डे देती हैं.  तो क्या इसका मतलब है कि इंसान जहां तक संभव हो हर काम अपने फ़ायदे के लिए करता है. वह उन्हीं जानवरों को दाना-पानी देने का इंतजाम करता है जो पालतू होते हैं. हम तो बाकी सारे जानवरों और चिड़ियों के लिए दो दिन बाद दाना लाना चाहते हैं. क्या हम घर के खूंटे पर बंधी गाय, भैंस को दो-तीन दिन बाद पानी पिलाते हैं ? तो जवाब मिला नहीं, उनको तो हम रोज़ चारा-पानी देते हैं.

इस बातचीत से बच्चों के मन का संवेदनशील कोना सक्रिय हो उठा. उनको लगा कि दो दिन बाद दाना लाने की बात शायद ग़लती से निकल गई है. बस फिर क्या था सबने एक साथ कहा कि कल से हम लोग दाना लेकर आएंगे. यह जवाब देते समय बच्चों का आत्मविश्वास देखने लायक था.

‘प्रकृति के साथ सह-जीवन’ की मूल भावना

बात आगे बढ़ी कि हमें सूरज से क्या-क्या मिलता है तो जवाब मिला रौशनी और उष्मा. इसके बाद मैनें फिर पूछा कि किस-किस के घर में बिजली लगी हुई है. तो कुछ लोगों ने हाथ उठाया तो मैने पूछा कि हर महीने कितने रूपए का बिल आता है तो जवाब मिला दो सौ-तीन सौ. मैने पूछा कि सूरज से मिलने वाली रौशनी और गर्मी के लिए  हमको कितने पैसे देने होते हैं. तो सबने कहा कि यह तो फ्री होता है.

मैंने कहा  मान लो एक दिन सूरज आदमी का भेष धरकर हमारे सामने आए और बोले कि अगले साल से सबको हर साल एक रूपए महीने किराया देना होगा. हमारे देश की जनसंख्या तो एक अरब से ऊपर है तो हमको हर साल एक अरब रुपए सूरज को रौशनी और उष्मा के बदले देना होगा. इस बातचीत से बच्चों को और स्वयं मुझे भी यह एहसास हो रहा था कि प्रकृति हमको कितना कुछ मुफ़्त में उपहार स्वरूप दे रही है.

आख़िर में हम सबको लग रहा था कि शायद हम उस मूल भावना को भूल गए हैं कि हमें भी प्रकृति का हिस्सा होने के नाते कुछ काम निःस्वार्थ भाव से करते रहना चाहिए. ताकि सूरज को रौशनी का किराया वसूलने के लिए धरती पर न आना पड़े. शायद प्रकृति भी चाहती है कि पास की चिड़िया और जानवर भूखे न रहें.

इसलिए हम अक्षय पात्र रखने और उसमें रोज़ना दाना डालने और प्याऊ में पानी रखने की बात कर रहे हैं.

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Vivek Kumar Singh jha

Bahut badhiya aajkal ki siksha ki sabse badi kami yahi hai naitikta aur manavta Ka aabhav.bachche prakriti toh dur apne maa baap Ka ijjat karna bhul gaye hai.hamare pass Jo kuch bhi hai unhi parmatma Ka diya hai.so hamei parmatma Ka ehsanmand hona chahiye.

Virjesh Singh

शुक्रिया विवेक जी, अपनी बात कहने के लिए।

बहुत-बहुत शुक्रिया संगीता जी और अमृता जी। सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए नियोजन और प्रधानाध्यापक नेतृत्व पर काम कर रहा हूं। इसके लिए हमें कुछ स्कूलों में जाना होता है। स्कूल को समझने के लिए बच्चों के साथ बातचीत करना बहुत जरूरी होता है। यह बातचीत भी उसी कड़ी का एक हिस्सा थी। यह बातचीत इतने रोचक मोड़ तक पहुंच जाएगी मुझे भी इस बात का अंदाजा नहीं था।

Amrita Tanmay

काश ! पूरी पृथ्वी पर शिक्षण-कर्म को नैतिक धर्म मानकर आपकी तरह ही किया जाता…

बहुत खूबसूरती से बच्चों को प्रेरित किया

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