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भारत की शिक्षा व्यवस्थाः बीमार हाथी की तीमारदारी

भारत की शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर एक नज़र डाले तो कमियों की एक लंबी लिस्ट बनाई जा सकती है। स्कूलों में नामांकन बढ़ा है, लेकिन बच्चों की शिक्षा का स्तर दिनों दिन नीचे गिर रहा है। सरकारी स्कूलों की बात करें तो गुणवत्ता न बच्चों को परोसे जाने वाले एमडीएम में है और न बच्चों को मिलने वाली शिक्षा में। गाँव के बहुत से स्कूलों में 250 बच्चों के स्कूल में मात्र दो अध्यापक काम कर रहे हैं। तो कहीं सौ से ज़्यादा बच्चे सिर्फ़ एक शिक्षक के भरोसे पढ़ाई कर रहे हैं।
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मिशाल के तौर पर एक स्कूल की स्थिति पर ग़ौर कर सकते हैं। इस स्कूल में 213 बच्चों का नामांकन हैं। कुल शिक्षकों की संख्या पांच है। कमरों की संख्या चार है। खेल के मैदान नाम की कोई चीज वहां पर नहीं है। पास के खेत में बच्चे खेल लेते हैं, जब वहां पर कोई फसल नहीं लगी होती है। इस स्कूल के अध्यापकों को बारी-बारी से पास के एक प्राथमिक स्कूल में नियुक्त जा रहा है। एक अध्यापक तीन-चार महीने बिताने के बाद वापस अपने स्कूल में आ गए हैं। लेकिन उनकी वापसी के साथ-साथ प्रधानाध्यापक जी के पास दूसरे शिक्षक को मुक्त (रिलीव) करने का आदेश भी आ गया है। ताकि वे प्राथमिक स्कूल में एकल शिक्षक की भूमिका का निर्वहन कर सकें।
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यह स्कूल पहाड़ी पर स्थित है। स्कूल का भवन बनाने के लिए बज़ट तो मिल सकता है, लेकिन जमीन की व्यवस्था कैसे हो स्कूल दो लोगों के डूंगर के बीच बना हुआ है जो जमीन देने के लिए तैयार नहीं है। अभी स्कूल के सामने से सड़क गुजर रही थी। तो एसएमसी के सदस्यों और प्रधानाध्यापक नें स्कूल के निचले हिस्से में स्थित कमरों के बराबर की जमीन को बराबर करके कमरे बनाने की योजना बनाई। लेकिन जेसीबी के जोर से भी वह जगह समतल नहीं हुई। वहां एक पहाड़ का मजबूत हिस्सा है। जिसको तोड़ने की लाख कोशिश के बावजूद वह नहीं टूटा। स्कूल का वह हिस्सा खंडहर की तरह लगता है। अगर बच्चे वहां फिसलते हैं तो उनको चोट भी लग सकती है। भौतिक स्थिति का हाल तो यह है।
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इस स्कूल में प्रधानाध्यापक समेत चार शिक्षक हैं। कक्षाएं आठवीं तक हैं। इससे शैक्षिक स्थिति का थोड़ा-थोड़ा अनुमान लग रहा होगा। यहां के बच्चों की जिज्ञासा की तारीफ करनी पड़ेगी, वे ढेर सारे सवाल पूछते हैं। पढ़ने में दिलचस्पी लेते हैं। सारे अध्यापक चाहते हैं कि उनके स्कूल में गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम अच्छे से मनाया जाय, ताकि समुदाय के लोगों का स्कूल को सहयोग मिले। अधूरे कामों को आगे बढ़ाया जा सके। वहां के प्रधानाध्यापक और अध्यापकों को उत्साहित देखना आश्चर्य से भरता है कि तमाम निराशाओं के बीच में आशा की किरण कौंध रही है। प्रतिनियुक्ति को शिक्षा के अधिकार के तहत प्रतिबंधित किया गया है। लेकिन अध्यापकों को दूसरे स्कूलों में अल्पकालीन व्यस्था शब्द के नाम पर दूसरे स्कूल में नियुक्त किया जा रहा है।
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प्रधानाध्यापक से इस बावत पूछा कि अगर आप उन शिक्षक को वहां नहीं भेजते हैं तो अधिकतम क्या हो सकता है ? तो उन्होनें कहा कि मेरे खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है। मुझे कारण बताओ नोटिस जारी किया जा सकता है। उच्च अधिकारियों के आदेश की अवहेलना और कार्य में शिथिलता का आरोप लग सकता है। इन सारे हालातों से लगता है कि कानून बनाते वक़्त कुछ क्षेत्र छोड़े जाते हैं। ताकि व्यवस्था में बैठे शब्दों के माहिर शब्दों के खेल के सहारे कानून की धज्जियां उड़ा सकें। लोगों की राजनीति में बच्चों का भविष्य दांव पर लग रहा है। उस तरफ अधिकारियों का ध्यान नहीं जा रहा है। वहीं दूसरी तऱफ पांच-छः किलोमीटर पर ऐसे स्कूल भी हैं। जहां आठवीं तक की स्कूल में दस – ग्यारह अध्यापक पढ़ा रहे हैं । ऐसे में शिक्षा के क्षेत्र के  हालात बदलने की मंजिल बहुत दूर नजर आती है। इसमें काम करने वाले लोगों को देखकर लगता है कि सब बीमार हाथी की तीमारदारी में लगे हैं।
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आख़िर में कह सकते हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बीमार हाथी की तरह है। जिसके डॉक्टरों की फौज तरह-तरह का उपचार सुझा रही है। कोई सूंड पकड़कर बैठा है तो कोई पेट का उपचार कर रहा है। तो कोई हाथी के कानों का आयुर्वेदिक उपचार कर रहा है। तो कोई आँखों में एलोपैथी की दवा डाल रहा है। लेकिन शायद  मालिक चाहता है कि हाथी की बीमारी लंबी खिंचे। हाथी का उपचार करने वाले डॉक्टरों की संख्या (संस्थाओं) जितनी बढ़े बढ़ने दो। एक दिन हाथी को स्वस्थ घोषित करके सारे डॉक्टरों की दिहाड़ी मार खाएंगे। अभी तो मजबूरी है। सारे देश को साक्षर बताने के आंकड़ों के सौ फीसदी होने का इंतजार है। शिक्षा में गुणवत्ता की बात कौन करता है ? न सरकार चाहती है। जिनको फिक्र है वे सालाना लाखों की फीस वाले स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बीमार हाथी के उपचार का यह खेल निराला है। अद्भुत है।
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आपकी बात काबिल-ए-गौर है कि सबको बीमारी हाथी की सवारी करवाकर बीमार बना रहे हैं….।

Amrita Tanmay

मज़े की बात है ..सबको बीमार हाथी पर सबारी करवा कर बीमार ही तो बना रहे हैं.

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