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मेरी नज़र मेंः बीस साल बाद क्या होगा ?

क्या पता कि बीस साल बाद क्या होगा ? मेरी जिंदगी में क्या बदलाव आएंगे ? समाज में कौन-कौन से बदलाव आएंगे ? इस बारे में सिर्फ कयास लगाए जा सकते हैं। वर्तमान में परिवर्तन की रफ़्तार इतनी तेज है कि आगे के पांच-दस सालों के बारे में भी सोचना कठिन सा लगता है।
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स्कूल में बच्चों के साथ संवाद करते हुए, उनके जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में बात करने के लिए निबंध का विषय चुना गया” बीस साल बाद क्या होगा ?” इस विषय पर सारे लोग अपने मन की बात लिखेंगे। लिखने के प्रति उनकी दिलचस्पी बनाए रखने के लिए मैनें भी पेपर पर अपने मन की बात लिखी। जिसकी शुरुआत कविता की शक्ल में कुछ यों होती है
क्या पता बीस साल बाद
मेरे जीवन में क्या होगा
जब आज का पता नहीं
तो कल के बारे में मैं
कोई कयास कैसे लगाऊं
कुछ चीजें तो निश्चित हैं
मसलन लिखना-पढ़ना
भटकना और किताबों को
अपनी लायब्रेरी में रखना
अपनी किताब के छपने का
बेसब्री से इंतजार करना
किसी अखबार के दफ़्तर में बैठकर
कोई खबर लिखने का दृश्य दिखता है
हो सकता है कि खबरों और अखबार से
दूर-दूर तक का कोई रिश्ता न हो
एक लापरवाह पाठक के सिवा
वैसे भी मीडिया में बीट तय होने के बाद
अपने सेक्टर की खबरों तक सिमट जाते हैं
लेकिन एक बात अभी तय सी लगती है
पत्रिकाओं में लिखने का सिलसिला जारी रहे
इतनी बातों से लगता है कि आगे के सफर में
लेखक होने के लेबलिंग से बचना मुश्किल है
बतौर लेखक-पत्रकार समाज के लोगों से
संवाद के सफर पर आगे निकलना तय है
इसके अतिरिक्त और भी संभावनाएं हैं
हो सकता है कि स्कूल में बच्चों से रूबरू होने
और संवाद करने का मौका न मिले
लेकिन कॉलेज के छात्रों को पढ़ाने की
संभावनाएं अभी भी खुली हुई हैं
भविष्य के बारे में सोचकर
डर सा लगता है कि आगे क्या होगा
कौन जाने आगे फिर से पढ़ने का मौका मिलेगा
या फिर आजीविका के जाल में उलझकर रह जाएंगे
आगे के भविष्य के बारे में सिर्फ कयास लग सकते हैं
चुनावी अटकल बाजियों की तरह से कि वक़्त तेजी से
बदल जाएगा और लोगों की व्यस्तता बढ़ जाएगी
लोगों की व्यक्तिगत  जिंदगी में तनाव बढ़ जाएगा
समाज में आपसी टकराहत और हितों का टकराव
अपने चरम पर और हिंसक रूप लेते दिखाई पड़ेगा
हो सकता है कि
देशों के बीच संघर्ष बढ़ जाएं
सड़कों और गाड़ियों में भीड़ बढ़ जाए
भारत जनसंख्या के आंकड़ों में समूचे विश्व को
पीछे छोड़कर नंबर वन की कुर्सी पर जा बैठे
शांति की तलाश में लोग धर्म और आध्यात्म की शरण लें
हो सकता है लोग निराश हो जाएं
अपने जीवन के संघर्षों से लोग टूटने लगें
लोगों की तकलीफ और पीड़ा के साथ
संवादहीनतासंचार साधनों की बढ़ोत्तरी
 के साथ अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुंचे
शहरों का जीवन और जटिल हो जाएं
संसाधनों की उपलब्धता कम हो जाए
पानी और रहने के लिए घरों की कमी पड़ जाए
गांवों की मानसिकता शहरों सरीखी हो जाय
सब लोगों की सोच और रुचियां एक जैसा
बनाने की तमाम कोशिशों की रफ़्तार तेजी पकड़ें
ग्लोबलाइजेशन का भूत लोगों के सर चढ़कर बोले
अपनी भाषा-बोली-संस्कृति-कपड़ें-रहन-सहन-सोच
अपने ही आंगन में उपेक्षित होने लगे और तकनीक
इंसान से ज्यादा सामानों की बढ़ती कीमतों की रफ़्तार में
इंसानियत पीछे रह जाए और बाज़ार विजयी हो जाए…
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Anonymous

हां! आप एक लेखक जरुर बनोगे हालाकि आप हो| क्योंकि अभी आप काफी कुछ लिख-पढ़-सोच रहे हो| यह सोचने-लिखने-पढने का सिलसिला जारी रहेगा|बाकी आपके जिंदगी के बारे में भी मेरे यही सोच है की वह काफी सुंदर रहेगी|

वृजेश सिंह

बहुत-बहुत शुक्रिया रश्मि जी।

सब होगा….कई चीजें हमारी कल्‍पनाओं से परे भी होंगी 20 साल बाद

आप सब का साथ बनाए हमारे दिन को खास – ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

वृजेश सिंह

कोशिश की है…संभावनाओं के दरवाजे खटखटाने की खिड़की पर दस्तक दे चुका हूं। बाकी देखते हैं। ज़िंदगी के सफर में चलने की हसरत है तो कहीं न कहीं पहुंचेगें ही…अपनी भी कोई मंजिल होगी।

Amrita Tanmay

सारी संभावनाओं को समेट लिया है.

Anonymous

हां! आप एक लेखक जरुर बनोगे हालाकि आप हो| क्योंकि अभी आप काफी कुछ लिख-पढ़-सोच रहे हो| यह सोचने-लिखने-पढने का सिलसिला जारी रहेगा|बाकी आपके जिंदगी के बारे में भी मेरे यही सोच है की वह काफी सुंदर रहेगी|

वृजेश सिंह

बहुत-बहुत शुक्रिया रश्मि जी।

सब होगा….कई चीजें हमारी कल्‍पनाओं से परे भी होंगी 20 साल बाद

आप सब का साथ बनाए हमारे दिन को खास – ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

वृजेश सिंह

कोशिश की है…संभावनाओं के दरवाजे खटखटाने की खिड़की पर दस्तक दे चुका हूं। बाकी देखते हैं। ज़िंदगी के सफर में चलने की हसरत है तो कहीं न कहीं पहुंचेगें ही…अपनी भी कोई मंजिल होगी।

Amrita Tanmay

सारी संभावनाओं को समेट लिया है.

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