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भारत में प्राथमिक शिक्षाः कैसे बदलेगी तस्वीर?

बच्चों का काबिल-ए-तारीफ प्यार.....21वीं सदी में भारत की प्राथमिक शिक्षा नीतिगत बदलाव के दौर से गुजर रही है. इस नीतिगत बदलाव की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए अनेक कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं. कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए रणनीतियों की शृंखला बनाई जा रही है. इस सभी का उद्देश्य एक है कि शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के संकट (लर्निंग क्राइसिस) का समाधान कैसे खोजा जाए? शिक्षा का अधिकार कानून 2009 लागू होने के बाद से स्कूलों में बच्चों का नामांकन बढ़ा है. स्कूलों में बच्चों का ठहराव सुनिश्चित करने और बच्चों का प्रदर्शन बेहतर करने की रणनीतियों पर अमल की कोशिशें हो रही हैं. शिक्षा को आनंददायक बनाने के प्रयासों को प्रोत्साहित किया जा रहा है.

स्कूलों में भयमुक्त वातावरण बनाने की रणनीतियों पर विमर्श हो रहा है. स्कूल और समुदाय के बीच संवाद शुरू करने के लिए विद्यालय प्रबंधन समिति को सक्रिय बनाने. बच्चों के माता-पिता और अभिभावकों को स्कूल में बुलाने और बच्चों की शैक्षिक प्रगति से उनको अवगत कराने की बात हो रही है. शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार के रूप में देखने की कोशिश हो रहा है ताकि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे. हर बच्चे को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा के दायरे में लाने के लिए सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठनों के तरफ़ से काफ़ी प्रयास हो रहे हैं. सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना शिक्षा के क्षेत्र में संचालित होने वाले तमाम कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य है.

इसे हासिल करने के लिए शिक्षाविद्, शैक्षिक प्रशासन से जुड़े अधिकारी, शिक्षक और शिक्षक प्रशिक्षक अपने-अपने स्तर पर काम कर रहे हैं. बच्चों का मूल्यांकन करने पर जोर दिया जा रहा है ताकि बच्चों के शैक्षिक प्रदर्शन में होने वाले बदलाव की सैद्धांतिक व्याख्या हो सके. बदलाव को आँकड़ों में प्रस्तुत किया जा सके. लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव की कोई भी योजना अल्पकाल में शैक्षिक स्तर बढ़ाने जैसे लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही रणनीति, बेहतर समझ और ज़्यादा समन्वय के साथ काम करने की जरूरत को महत्व देती है. आज बात बच्चों में सीखने की समस्याओं के समाधान में उठाए जा सकने वाले संभावित क़दमों की….

शिक्षकों की संख्याः विद्यालयों में सीखने का माहौल बनाने और बच्चों को प्रेरित करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. अगर सरल शब्दों में कहें तो स्कूल एक ऐसी जगह है जहाँ छात्र-शिक्षक आपस में विभिन्न शैक्षणिक सामग्री का उपयोग करके संवाद और बातचीत के माध्यम से सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं. अध्यापक अपने अनुभवों को समृद्ध करता है. बच्चे पुराने अनुभवों के ज़मीन पर नए अनुभवों को जोड़ते हुए ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया से अवगत होता है. यहाँ वह पढ़ना-लिखना, खुद को अभिव्यक्त करना, बाकी बच्चों के साथ समायोजन करना, खेल और अन्य सामूहिक गतिविधियों में शामिल होने का कौशल विकसित करता है. अगर किसी स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात संतुलित नहीं है तो बच्चों के सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है.

भारत में एकल शिक्षक स्कूलों की स्थिति बताती है कि आने वाले दस-बीस सालों में भी यथास्थिति का यह माहौल टूटने वाला नहीं है. नई नियुक्तियों के लिए सरकार तैयार नहीं है. तमाम पद खाली पड़े हैं. 12वीं पास लोगों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जा रही है, इससे स्थिति ढाक के तीन पात वाली ही बनी रहती है. इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दीर्घकालीन रणनीति में छात्र-शिक्षक अनुपात को बेहतर व संतुलित बनाने की दिशा में सरकारी प्रयासों की गति देने की जरूरत है. इसके अभाव में तमाम रणनीति और कार्यक्रम आधे-अधूरे उद्देश्यों की प्राप्ति में ही सफल होंगे. हम यह कह सकते हैं कि अगर सभी बच्चों को शिक्षित करने का उद्देश्य सामने है तो संभव है कि यह उद्देश्य साक्षरता के दायरे से थोड़ा ही आगे बढ़ पाए. देश के लिए मानव संसाधन की गुणवत्ता और भविष्य में वैश्विक स्तर पर चुनौतियों के समाधान की दिशा में इसे बेहतर रणनीति नहीं माना जा सकता है. इस क्षेत्र में पर्याप्त सुधार की गुंजाइश है.

एक स्कूल में 200 के आसपास बच्चे हैं. उस स्कूल में केवल चार शिक्षक हैं. यहाँ आठवीं तक की पढ़ाई होती है. शैक्षिक सत्र के दौरान शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति भी होती है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है. शिक्षकों का उत्साह नीचे गिरता है. बच्चों को लगता है कि शिक्षक पढ़ाते नहीं. अभिभावकों को लगता है कि स्कूल ख़राब है. बच्चे का नाम किसी और स्कूल में लिखवाना चाहिए. आदिवासी अंचल और गाँवों में समस्या है कि कोई अध्यापक वहाँ जाना नहीं चाहता. अगर कोई आता भी है तो स्थानांतरण के बाद उस क्षेत्र से वापस चला जाता है. एक शिक्षके के भरोसे सारी जिम्मेदारी होती है. हाल के दिनों में स्कूलों में आँकड़ों का काम बढ़ा है. शिक्षकों के प्रशिक्षण दिवसों की संख्या बढ़ी है. इस तरह की परिस्थितियों के कारण बच्चों के सीखने की गुणवत्ता और माहौल दोनों प्रभावित होता है. इसलिए स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों का होनवा किसी स्कूल के सफल संचालन की एक आवश्यक शर्त है. संसाधनों के अभाव में शिक्षा के तमाम लक्ष्यों से अध्यापकों को समझौता करना पड़ता है. इसके लिए केवल उनको दोषी मानना ठीक नहीं है. क्योंकि वर्तमान में पाठ्यक्रम को बोझ पहले के तुलना में काफ़ी बढ़ गया है. एक शिक्षक को एक ही कक्षा में ढेर सारे विषय पढ़ाने होते हैं.

भविष्य के संदर्भ में एक बात काबिल-ए-ग़ौर है कि सभी क्षेत्रों में अभिभावकों के पास बच्चों की शिक्षा को लेकर पर्याप्त विकल्प नहीं होते. बड़े शहरों में नर्सरी में प्रवेश के लिए होने वाली मारामारी से पूरी स्थिति की एक झलक मिलती है. दिल्ली में बच्चों के नर्सरी में प्रवेश का मामला पिछले कई महीनों से हाईकोर्टे से सुप्रीम कोर्ट तक अटक रहा है. इससे आने वाले दिनों की जटिलता की थोड़ी सी झलक मिलती है कि जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ बेहतर शिक्षा का माँग और सीमित विकल्पों में हिस्सेदारी के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है. इस तरह की चुनौतियां बताती हैं कि सरकार को पूर्व प्राथमिक शिक्षा (नर्सरी शिक्षा) पर भी पर्याप्त ध्यान देने की जरूरत है ताकि एक मजबूत आधार के साथ बच्चे बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें. अभी नर्सरी के स्तर पर प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति से सरकार पीछे हटती रही है. लेकिन राजस्थान में पिछले साल कुछ शिक्षकों को बालवाड़ी में नियुक्त करने के बाद नर्सरी शिक्षा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की उपयोगिता स्वीकार ली गई है. अब बात पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति और उनके बेहतर प्रशिक्षण की होनी चाहिए ताकि देश के नौनिहालों को बेहतर शिक्षा का अवसर मुहैया कराया जा सके.

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2 Comments on भारत में प्राथमिक शिक्षाः कैसे बदलेगी तस्वीर?

  1. सर क्लास 1 2के बच्चे को कैसे पढ़ाया जाय ????

  2. Pravin Gurav दिक्कत यह है कि हमारा पुरा ध्यान, ऊर्जा और समय सिखाने वाले पर (अध्यापकों) लागया जा रहा है , सीखने वाले पे नही…हम जब तक सीखने की प्रक्रिया पर काम नही करेंगे तब तक कुछ नही होगा… सीखने की मंदी रहेगी ही हमारे देश मे…..किसी को भी सीखने मे मजा नही आता….सिखाने में आनंद मिलना ही हमारा मूल उद्देश्य होना चाहिये……हमारी किताबे देखकर तो ऐसा लगता ही जैसे हम सिर्फ़ बच्चों को शिक्षक बनाना चाहते है. किताबो मे से बच्चा जो भी सिखाता है वह सिर्फ शिक्षक बनकर बच्चो को सिखाने मी काम आ सकता है…बाकी कहीं नहीं….

    दुसरी बडी समस्या यह ही कि हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली क्लास मे जो बच्चे intelligent होते है उनके लिये हि है….शिक्षक का कक्षा में ध्यान भी उन्हीं बच्चो पर होता है…पुरा स्कूल उन बच्चो को और आगे बढाने मे लगा रहता है. जो हर क्लास मे २-३ ही होते है …..तीसरी समस्या यह है कि हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली हर बच्चे को तार्किक बुद्धिमान (logical Intelligent) एवं भाषिक बुद्धिमान(linguistic Intelligent) बनाना चाहती है….जिसमे यह बुद्धिमत्ता ज्यादा है वे सभी स्कॉलर बाकी सभी केवल स्कूल में ही नही बल्कि जिंदगी की परीक्षा में भी फेल हो जाते है…. वास्तविक रूप मे ११-१२ प्रकार की बुद्धिमत्ता (Multiple intelligent) होती है जैसे कि भावनिक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligent), सांगीतिक बुद्धिमत्ता (Musical Intelligent) , काल्पनिक बुद्धिमत्ता और अन्य……जिन बच्चो मे यह बुद्धिमत्ता नैसर्गिक रूप मे है….उनके लिये अपनी शिक्षा व्यवस्था कुछ भी नही कर रही है……यह बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा के साथ बहुत बड़ा अन्याय है.

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