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फेलोशिप डेजः बच्चों के नाम से दहशत होती है!

बच्चों का काबिल-ए-तारीफ प्यार.....गांधी फेलोशिप के दौरान हर फेलो को इंडक्शन के बाद के एक महीने पहली-दूसरी के बच्चों की कक्षा में जाना होता था। उनके साथ खेल के माध्यम से जुड़ते। बच्चे सीखते कैसे हैं? इस सवाल की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करते। इस दौरान वे रोजाना स्कूल से वापस आने के बाद अपनी डायरी लिखते। अपने अनुभवों और मन में होने वाले उतार-चढ़ाव को भी दर्ज़ करते रहते।

ताकि इमोशन के स्तर पर वे कहाँ हैं, इस बात का भी अहसास उनको होता रहे। फेलोशिप का सबसे मुश्किल पड़ाव विलेज इमर्सन माना जाता है, इसमें फेलो को ख़ुद से कोई घर खोजना होता है। एक महीने वहां रहना होता है। ऑफिस की सारी सुविधाओं से दूर रहकर गाँव के स्कूल में काम करना होता है और घर के काम में भी हाथ बंटाना होता है। इसी दौरान की डायरी आपसे साझा है।

फेलोशिप डायरी

आजकल तो बच्चों के नाम से दहशत होती है। छोटे बच्चों की कक्षा में चार घंटे बिताना बड़ा मुश्किल सा लगने लगा है। क्लास के बच्चे हैं कि अपनी धुन पर थिरकते हैं। भला वे क्यों मेरी बेसुरी तान को सुनने की परवाह करें? उन्हें डर तो लगता नहीं। डर निकलने के बाद से उनके रग-रग में एक बेफिक्री सी दौड़ गई है। वे वही कर रहे हैं जो उनका मन कर रहा है। मैं इस बात से बेहद ख़ुश हूँ।

अब तो बच्चे मजाक भी उड़ाने लगे हैं। सरे राह चिढ़ाने लगे हैं। फुरसत मिलते ही बतियाने लगे हैं। क्लास में कुछ बच्चे तो पाठ की तरफ न देखकर मेरे चेहरे पर ही एकटक नज़र गड़ाए रहते हैं। मानो कोई बगुला मछली की ताक में पानी में ध्यान लगाए बैठा है। वे ड्रम की आवाज़ पर क़दमताल कर लेते हैं, लेकिन लिखे हुए शब्दों पर उंगली फेरना अभी सीख रहे हैं। इस उदाहरण से एक बात मेरी समझ में आई कि कंडीशनिंग, लर्निंग की अपेक्षा तेज गति से होती है। जबकि सीखने की प्रक्रिया स्टेप बाय स्टेप धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।

एक दिन स्कूल से घर वापस जाते समय बच्चे मेरे विलेज इमर्सन वाले घर के सामने रुक गए। शोर मचाने लगे। कमरे में झांकने लगे। शायद उनकी जिज्ञासा थी कि मैं कैसे रहता हूँ? लेकिन यह परिस्थिति मेरे लिए बिल्कुल नई थी। मैंने उनको बताने की कोशिश करी कि अरे भाई स्कूल बंद हो गया है, तेज़ धूप हो रही है, घर के लोग इंतज़ार कर रहे होंगे..अापको घर जाना चाहिए। लेकिन बच्चे भला कहां मानने वाले थे। उनमें से कुछ बच्चे मुझे अपने घर ले जाना चाहते थे।

मैं फ़ोन पर बात कर रहा था तो वे मुझसे जानना चाहते थे कि मैं किससे बातें कर रहा हूँ? जब मैंने उनको बताया कि पापा से बात कर रहा था तो वे बाकी साथियों से उन्होंने कहा, “गुरू जी बापू से बातें कर रहे हैं।” मैं स्कूल में जूता पहनकर क्यों नहीं आया? चुरू में कैसे रहता हूँ? घर में कौन-कौन है? शादी हुई कि नहीं। फ़िल्म कौन सी पसंद है? हीरो के बारे में पूछते थे। अपने घर ले जाने के बाद वे इतने सारे सवालों की लंबी लिस्ट खोलकर एक अजीब सी स्थिति में डाल देते थे। वे खेतों की तरफ घुमाने ले जाते। किस खेत में कौन सी फसल लगी है। बावड़ी कहां है? मतीरी किधर है? सारी चीज़ें बताते थे।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान एक बात सदैव ध्यान में रहती कि मैं कोई स्थाई शिक्षक तो हूँ नहीं। इसलिए बच्चों के साथ सहजता से पेश आऊं। उनके सीखने की प्रक्रिया को समझूं और उनके लिए सीखने के अवसर भी बनाए जाएं। खेल के माध्यम से और कहानी के माध्यम से। उन बच्चों के साथ बिताए लम्हे आज भी याद आते हैं। बहुत सारे बच्चे अभी दसवीं कक्षा में पहुंच गए हैं। बाकी नौंवीं में एडमीशन ले रहे होंगे। पुराने परिचय का एक सिलसिला आज भी छूटा सा लगता है, जिसे वापस जाकर फिर से ज़िंदा किया जा सकता है। स्कूल और बच्चों को नए सिरे से देखनेे का नजरिया फेलोशिप के इस मौके के कारण ही संभव हुआ।

फेलोशिप से पहले असर की रिपोर्ट देखकर लगता था कि अरे हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था को क्या हो गया है? लेकिन अब वैसी हैरानी नहीं होती। ज़मीनी हक़ीक़तों को देखकर लगता है कि शिक्षक बहुत सा अच्छा काम कर रहे हैं, उसकी तारीफ होनी चाहिए। उनकी कोशिशों को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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