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बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

नज़रियाः 110 बच्चों को एक कालांश में पढ़ाते हैं एक शिक्षक

तीन कक्षाओं को हिंदी पढ़ाने के लिए एक शिक्षक को मात्र एक कालांश मिला है क्योंकि आठवीं तक के इस विद्यालय में मात्र पाँच शिक्षक हैं। मगर इनकी सोच और काम करने का नज़रिया काबिल-ए-तारीफ़ है। पढ़िए पूरी कहानी इस पोस्ट में।

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कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन, जे कृष्णमूर्ति के विचारआज राजस्थान के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक से मुलाक़ात हुई। उनको पहली-दूसरी-तीसरी कक्षा को हिंदी पढ़ाने के लिए केवल एक कालांश मिला हुआ है। तीनों क्लास में इतने बच्चे हैं (110) कि एक नया स्कूल खोला जा सकता है।

पहली कक्षा को रोज़ाना समय देने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मेरे पास तीन कक्षाओं की जिम्मेदारी है। सीसीई के अनुसार योजना बनाकर पढ़ना है, इसलिए हर कक्षा के लिए एक दिन निर्धारित है।

उनसे जब मैंने पहली कक्षा को पढ़ाने का अनुरोध किया तो उन्होंने मना नहीं किया। लेकिन उन्होंने कहा, “हमसे जो बन पड़ेगा जरूर करेंगे।”

उन्होंने जिस तरीके से पहली क्लास को पढ़ाया, मैं बस हैरानी से देख रहा था। उनके क्लास में हर बच्चे की जिम्मेदारी बंटी हुई थी, जो पहले लिख ले रहे थे वे बाकी बच्चों को लिखने में मदद कर रहे थे। और कुछ बच्चे सभी बच्चों की कॉपी कलेक्ट कर रहे थे। इतने व्यवस्थित ढंग से पूरी क्लास चल रही थी कि कोई हडबड़ी नज़र नहीं आ रही थी।

हमारे स्कूलों में ऐसे ही शिक्षकों की जरूरत है जो अपने काम को ईमानदारी से करें। फेलोशिप से मैंने एक बात सीखी है शिक्षकों के ऊपर भरोसा करना। उनकी परिस्थितियों को समझने की कोशिश करना। इस भरोसे को ज़मीनी स्तर पर सच होते हुए देखना अच्छा लगता है। वे यूपी के उस शिक्षक का जिक्र कर रहे थे, जिसे बर्ख़ास्त कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “यह लड़ाई किसी न किसी को तो लड़नी ही थी। वे शिक्षक भी सच कहने की क़ीमत चुका रहे हैं।” अगर स्कूलों में पर्याप्त स्टाफ हो तो कम से कम 110 को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक जैसी स्थिति तो नहीं देखनी होगी। अगर ऐसे में भी कोई शिक्षक मन से काम करता है तो उसके हौसले को सलाम करना ही चाहिए।

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