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लड़कियों की पढ़ाई के प्रति इतनी बेरुखी क्यों है?

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स्कूल जाती एक लड़की को ग़ौरे से देखती लड़कियां।

यह कहानी राजस्थान के केवल एक स्कूल की नहीं है। यह यहां के बहुत से स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की आपबीती है जो स्कूल में जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए जूझ रही हैं।

लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है। इसके कारण बहुत से लड़के-लड़कियों की पढ़ाई बीच रास्ते में छूट जाती है। जिस उम्र में उनको आगे की पढ़ाई करनी चाहिए, वे घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों में फंस जाते हैं।

सरकारी स्कूल की एक शिक्षिका बताती हैं, “हमारे स्कूल की लड़कियां तो कुछ सोचती ही नहीं। सबसे बड़ी समस्या यही है। कैसे समझाएं कि इनके सोचने की क्षमता वक़्त के साथ कैसे कुंद हो गई? एक आदत जो उनके साथ बचपन में घूमा करती थी, वह बचपन के कपड़ों की तरह कहाँ पीछे छूट गई।”

‘वर चुनने की आज़ादी नहीं’

उन्होंने कहा, “यहां के समाज में इन लड़कियों को अपना वर चुनने तक की आज़ादी नहीं है। जहां इनके भाई की शादी होती है, उसी घर में लड़कियों की भी शादी कर दी जाती है। यानी इनके यहां लड़की के बदले लड़की देने की परंपरा है।”

शादी के बारे में बताते हुए वे आगे कहती हैं, “लड़कियों ने कहां तक पढ़ाई की है। वे आगे पढ़ना चाहती हैं या नहीं, इन सारी बातों से किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ता। हाँ, लोगों को इस बात की परवाह होती है कि लड़की को घर के सारे काम करने जरूर आना चाहिए।”

‘बस टाइम पास के लिए आती हैं स्कूल’

उन्होंने बातचीत के दौरान बताया, “यहां शाम के वक़्त महिलाएं घर के सामने बैठ जाती है। और आपस में बातें करती हैं। ये लड़कियां भी आपस में उसी तरह की मीन-मेख निकालने वाली बातें करती हैं। अगर महिलाएं घर के भीतर बैठें और बच्चों को पढ़ने के लिए कहें तो इससे बच्चों की पढ़ाई में मदद मिलेगी। लेकिन घर पर तो किसी को पढ़ाई का महत्व पता ही नहीं है, ये लड़कियां भी स्कूल बस टाइम पास के लिए आ रही हैं, इसमें से बहुत सी लड़कियों की सगाई हो चुकी है।”

उन्होंने अपने शुरुआती अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा, “जब हम कुछ साल पहले इस क्षेत्र में पढ़ाने के लिए आए तो हमें कहा जाता था कि आप नौकरी पर क्यों जाते हैं? तो हमें भी लोगों के इस तरह के नज़रिये का सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे जाकर पूरी स्थिति सामान्य हुई।”

एक शिक्षिका के अनुभव

एजुकेशन मिरर के लिए आकांक्षा मिश्रा छात्राओं से बातचीत का एक अनुभव साझा करते हुए लिखती हैं, “बेशक हम बड़े हो गए हो लेकिन बच्चों के साथ हमारी जानने की इच्छाएं बढ़ जाती हैं, क्योंकि बच्चों में स्वाभाविक जिज्ञासु प्रवृत्ति होती है। स्कूल विज़िट के दौरान हमने कुछ छात्राओं से पूछा कि शिक्षा में उनकी कितनी रूचि है?”

अधिकांश छात्राओं के जबाब एक से मिले एक छात्रा ने कहा, “पढ़ने की इच्छा है ,पर घरेलू काम की वजह से ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते।” वहीं दूसरी छात्रा का जवाब था, “माँ कहती हैं कि पढ़ाई काम भर की हो जाए बहुत है। बाकी खाना बनाना तो आना ही चाहिए ।”

इन छात्राओं का जवाब सुनकर लगा कि बेशक उन्हें शिक्षा के प्रति प्रेरित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है। लेकिन घर पर बच्चों को पढ़ने का माहौल और समय देना माता-पिता का कर्तव्य है। जिन छात्राओं से मेरी बात हुई वे पढ़ने में अच्छी हैं। स्पष्ट बोलती हैं । उनके भी सपने हैं। कोई शिक्षक बनना चाहता है तो कोई डॉक्टर और इंजीनियर बनना चाहता है। स्कूली दिनों से ही ये छात्राएं अपने सुनहरे भविष्य के लिए मेहनत कर रही। चुनौतियों से जूझते हुए अपने सपनों के पूरा होने की आशा के साथ ये आगे बढ़ रही हैं।

 

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Pawan chauhan

Aisa kyu krte k ldkiyo k sath

ऋषिकेश

प्रिय श्री वृजेश जी, नस्कार !
आपके बेहतरीन लेखों में से यह भी एक बेहतर ही है, मुद्दे आधारित इस लेख को पढ़ते हुए, एक जगह मैं ठहर गया फिर सोचने लगा.., की क्या अभी भी देश के कुछ हिस्सों में ऐसी परम्परा हैं? जहाँ पर मनचाही जीवन साथी का चुनाव न करके लड़की के बदले लड़की की परम्परा का निर्वहन किया जाता है, कुछ इसी प्रकार के घटनाएँ हमारे उत्तर प्रदेश के भी कई जिलों में देखनो को मिल जाती थीं परन्तु अब ये सब गुजरे कल की बात हो गयी है,
अब बहुतेरे परिवारों में लड़कों के साथ ही लड़कियों के न सिर्फ गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है बल्कि उनके सपनो को हकीकत के धरातल पर उतारने में साथ भी दिया जा रहा है, ऐसा भी नहीं है की इसका सभी स्वागत ही कर रहे हैं , बल्कि उस परिवार के ही कई रिश्तेदार और यहाँ तक की गाँव वाले भी माहौल खराब करने की दुहाई देते हैं, पर कहते हैं न की अगर सूर्य उदय हो चुका है तो फिर अँधेरे की क्या बिसात????????
शेष फिर ………..

आपका अपना ही
ऋषिकेश

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