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लायब्रेरी फॉर आलः सभी बच्चों के लिए होनी चाहिए अच्छी लायब्रेरी

एक स्कूल की लायब्रेरी में किताब पढ़ते बच्चों की ख़ुशी उनके चेहरों पर साफ़ पढ़ी जा सकती है।

भारत की विशालता और विविधता की मिशाल दी जाती है। मगर देश में सबके लिए पुस्तकालय का मुद्दा कोई पार्टी नहीं उठाती। कोई नेता यह क्यों नहीं कहता कि देश में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देंगे। स्कूल जाने के लिए साइकिल दे रहे हैं, लेकिन केवल साइकिल, स्कूल की ड्रेस और स्कूल की किताबें देना पर्याप्त नहीं है, इन छात्र-छात्राओं को किताबों की दुनिया से भी रूबरू कराना जरूरी है ताकि वे खुले मन से दुनिया को जानने-समझने का प्रयास कर सके।

हमारे देश में बच्चों को किताबों से दोस्ती करने का मौका मिलना चाहिए। मगर उनको तो सवाल रटने वाला तोता बनाने वाली व्यवस्था को पोषित करने का काम हो रहा है। बाकी रही-सही कसर पासबुक और गाइड्स कर देती हैं, इनका करोड़ों का कारोबारा है। उनको आने वाली पीढ़ी की भला क्यों परवाह होगी की उनके भीतर पढ़ने का कौशल और पढ़ने की आदत का विकास हो रहा है या नहीं। उनको तो बस अपने मुनाफ़े से मतलब है।

सरकार बदलने के साथ ही किताबों में बदलाव की कवायद शुरू हो जाती है। कभी इतिहास बदला जाता है। तो कभी भूगोल में बदलाव की कोशिश होती है। तो कभी ख़ास लोगों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है। तो शेष लोगों को महत्वहीन बताकर बाहर का रास्ता दिखाने की कोशिश होती है।

इस दौर की सच्चाई यही है कि बिना पाठ्य किताबों और संदर्भ पुस्तकों के होने वाली पढ़ाई बस डिग्री बटोरने के काम आती है, इस बात को स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं है। अन्य देशों में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिवार में बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। मगर हमारे यहां तो उल्टे लेखकों पर हमला करने की संस्कृति विकसित की जा रही है। उनको अपनी ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुहार लगाते हुए देश की राजधानी में विरोधी प्रदर्शन करना पड़ रहा है।

पढ़ने की संस्कृति का एक डर तो वास्तव में है। अगर लोग पढ़ने-लिखने लगे। अपने पाँवों पर खड़े होकर सोचने लगे। तो उन सड़ी-गली मान्यताओं के लिए सिर छिपाने की जगह खोजनी मुश्किल हो जाएगी जिनके कारण हम एक ऐसा समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जो अफवाहों पर यक़ीन करता है। लिखी हुई बातों को पत्थर की लकीर मानकर चलता है, लोगों की कहीं हुई बातों पर सवाल करने की जरूरत नहीं समझता।

जो सिर्फ़ लोगों से सुनता है। सुनी-सुनायी बातों को दोहराता है। और उनसे बनी राय से अपनी ज़िंदगी को आगे ले जाता है। वह रास्ता सही है या ग़लत है, उसे इस पर विचार करने की जरूरत भी नहीं महसूस होती है। यह एक ऐसे समाज की निशानी है, जो बैसाखियों पर चलने की कला सीख रहा है। एक बार उसे इस कला में महारत हासिल हो गई तो वह अपने पांवों पर खड़ा होकर सोचने और अपनी कल्पनाओं को पंख लगाकर उड़ने का हौसला खो देगा।

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