Advertisements
News Ticker

अगर हम बच्चों को ‘क’ सिखाएंगे तो बच्चा ‘क’ ही सीखेगा?

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

बच्चों का शब्द भण्डार कैसे विकसित होता है।

“अगर हम बच्चों को ‘क’ सिखाएंगे तो बच्चा ‘क’ ही सीखेगा।” आठवीं कक्षा के बच्चों के सामने किसी शिक्षक को ये बात कहते सुना। इसके मायने हैं कि हम बच्चे आप को जितना सिखाएंगे बच्चा उतना ही सीखेगा। इस विचार में इस बात को मानने से इनकार किया जा रहा है कि बच्चा खुद से भी सीखता है, या सीख सकता है।

कोई बच्चा निर्देशों का इतना भी मोहताज नहीं होता कि वह स्कूल गये बग़ैर कुछ सीख ही न सके। कोई भी बच्चा स्वाभाविक ढंग से (बॉय डिफाल्ट) सीखना ही है। वह सीखे बग़ैर, चीज़ों पर हैरान हुए बिना वह रह ही नहीं सकता।

 विज्ञान के चमत्कार

इसी दौरान साइंस के कुछ करिश्मों को देखकर आठवीं कक्षा के बच्चों के बार-बार वाऊ, वाऊ…कर रहे थे। बच्चों की अनुमान लगाने, आपस में बातचीत करने और कौतुक से साथ चीज़ों को देखने वाला अंदाज देखने लायक था। इस दौरान बच्चे विज्ञान की कक्षा से जुड़े अनुभवों को याद कर रहे थे। जैसे चुंबक में दो ध्रुव होते हैं। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। समान ध्रुवों को पास लाएं तो वे दूर जाते हैं। विपरीत ध्रुव आपस में करीब आते हैं। निकिल, कोबाल्ट और लोहा तीन धातुओं को चुंबक अपनी तरफ आकर्षित करता है। ऐसी बातें बहुत सहज और स्वाभावित माहौल में हो रही थीं।

अगर क्लासरूम में भी बच्चों से इसी तरीके से बातचीत हो तो उनके लिए चीज़ों को समझना और उसे लंबे समय तक याद रखना संभव होगा। मगर ऐसी क्लास के लिए एक शिक्षक को पहले से तैयारी करनी होगी। आठवीं कक्षा के बच्चों के लिए ‘भ्रम और वास्तविकता’ जैसी अवधारणा पर सोचने का भी अवसर इस दौरान मिला।

जैसे किसी स्प्रिग में रखी गेंद, स्प्रिंग को घुमाने के दौरान ऊपर या नीचे जाती हुई प्रतीत होती है, जबकि वह अपने स्थान पर स्थिर होती है। जैसे ट्रेन से चलते समय पेड़ पौधे पीछे की ओर भागते प्रतीत होते हैं, जबकि वे अपने स्थान पर खड़े होते हैं। उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं होता है या फिर किसी बदल वाली बस के चलते समय जिस बस में हम बैठे हैं, उसके चलने का आभास होता है, जबकि वास्तव में बगल वाली बस हमारे पास से होकर गुजर रही होती है।

प्रक्रिया पर ध्यान देने की जरूरत

इसी दौरान ‘ज्ञानदास’ का भी जिक्र नौंवी, दसवीं में पढ़ने वाले बच्चों की तरफ से हुआ। वे अपने शिक्षकों द्वारा क्लास में इस्तेमाल किये जाने वाले डंडे को इस नाम से संवोधित कर रहे थे। इस पूरी बातचीत से लगता है कि हमने बहुत तरक्की की है। मगर अभी भी यह सफर मुकम्मल नहीं हुआ है। बहुत आगे जाना है। धीरे-धीरे ही सही। इस सफर को आगे बढ़ने के लिए अपनी तरफ से हर संभव सहयोग देना है। मानसिकता और सोच में बदलाव एक दिन में नहीं होता है। इसमें लंबा समय लगता है।

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि हर शिक्षक अपने रोज़मर्रा के स्कूली अनुभवों के बारे में सोचे, उससे निकले निष्कर्षों को जीवन में उतारे। बच्चों के सामने पेश आने वाली चुनौती को अपनी चुनौती मानते हुए उसे आसान बनाने का रास्ता खोजे। जैसे किसी बच्चे का सीखना केवल गतिविधि के ऊपर निर्भर नहीं करता है। किसी गतिविधि की प्रक्रिया में बच्चे का सीखना संभव होता है। इसलिए जरूरी है कि क्लास में कोई पाठ पढ़ाते समय, किसी विषय के ऊपर बात करते समय एक शिक्षक का ध्यान प्रक्रिया की तरफ जाये। ऐसे बिंदुओं पर फ़ोकस करके एक शिक्षक अपने सिखाने के तरीके को प्रभावशाली बना सकता है। साथ ही साथ सभी बच्चों का सीखना भी सुनिश्चित कर सकते हैं।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: