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स्कूलः शिकायतें, सवाल, जवाब, परीक्षा और बच्चे

बच्चे, पढ़ना सीखना, बच्चे का शब्द भण्डार कैसे बनता है

सरकारी स्कूलों के बारे में लोगों की ढेर सारी शिकायते होती हैं। जैसे वहां के शिक्षक काम नहीं करते। वहां के शिक्षकों को बहुत ज्यादा वेतन मिलता है। शिक्षक तो खाली-फोकट बैठे रहते हैं। मैडमें स्कूल में स्वेटर बुनती हैं।

अब कहा जा रहा है कि पुरानी मैडमें स्कूल में स्वेटर बुनती हैं, क्योंकि नई पीढ़ी के लोगों के पास शायद यह हुनर सुरक्षित नहीं बचा। स्कूलों के बारे में कितना कुछ निगेटिव कहा जाता है। अगर किसी झूठ को सौ बार बोला जाय तो वह बात सच लगने लगती है। यही बात सरकारी स्कूलो के बारे में व्यक्त किये जाने वाले विचारों के मामले में भी सच है।

संघर्ष के दिन

सरकारी स्कूल संघर्ष के दिनों से जूझ रहे हैं। निजी स्कूलों के साथ होने वाली तुलना का सामना कर रहे हैं। निजी और सरकारी स्कूलों में बहुत सारा अंतर होता है। किसी निजी स्कूल में कोई फ़ैसला तत्काल लिया जा सकता है, मगर एक सरकारी स्कूल में कोई फ़ैसला लेने के लिए कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है। कोई भी बात करने से पहले दो-चार बार सोचा जाता है कि ऐसा करने से हम कहीं फंस तो नहीं जाएंगे। यानि बचाव का हर तरीका आजमाया जाता है। क्योंकि किसी भी छोटी सी बात को समुदाय द्वारा मुद्दा बनाया जा सकता है। किसी भी बात को राजनीति का रंग देकर बड़ा बनाया जा सकता है।

सरकारी स्कूलों की उपेक्षा एक ऐसे भारत का निर्माण कर रही है जिसका असर आने वाले सालों में दिखाई देगा। पास-फेल करने वाली नीतियों के बारे में एक शिक्षक कहते हैं, “अमरीका चाहता है कि कैसे भी करके भारत के छात्रों को पीछे करो। भले ही इसके लिए हमको पैसा खर्च करना पड़े। क्योंकि वहां के बच्चों की प्रतिस्पर्धा यहां के प्रतिभाशाली छात्रों से हैं। आठवीं तक लगातार पास होने वाले बच्चे नौवीं में फेल हो जाते हैं और मजूदरी में लग जाते हैं। इससे केवल पूंजीपति वर्ग को फ़ायदा है। बाकी आम पब्लिक का तो नुकसान ही है।”

केवल ‘साक्षर’ बनाने वाली शिक्षा

उनकी बातों से एक बात निकलती है कि सरकारी स्कूल केवल श्रम शक्ति के स्त्रोत के रूप में देखे जा रहे हैं। एक ऐसी श्रम शक्ति जो साक्षर है। केवल साक्षर बनाने के उद्देश्य वाली कोई भी शिक्षा बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं है। मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि सालभर की अच्छी पढ़ाई किसी को साक्षर बना देने के लिए पर्याप्त है। ऐसा बच्चा अपना नाम लिख सकता है। अपने हस्ताक्षर बना सकता है। छोटे-मोटे संदेश पढ़ सकता है। उसे कुछ हद तक समझ सकता है। वह अपनी कोशिश से सीखना जारी रख सकता है।

मगर सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यही है कि सात-आठ साल की शिक्षा के बाद एक बच्चा पढ़ना-लिखना भी नहीं सीख पाता। ऊपर से सबके साथ ढालने वाली चक्की में पीसकर हम बच्चों को उनकी मौलिकता और स्वाभाविक जिज्ञासा से भी महरूम कर देते हैं। जो बच्चे बहुत से सवाल पूछते हैं? वे क्लास में आकर खामोश हो जाते हैं। जिनको लिखे हुए का अर्थ समझना चाहिए। वो मोटी-मोटी पासबुकों से सवालों का जवाब समझे बिना, उसके अर्थ को जाने बिना बस कॉपी में उतारते रहते हैं। जैसे कोई सिद्ध पुरुष निष्काम भाव से कोई काम करने का डेमो दे रहे हों।

बच्चों की अनदेखी का मुद्दा

ऐसे बच्चों की मौजूदगी को हम अनदेखा करते हैं। इस स्थिति में बदलाव लाने की बजाय हम नियति से हार मान लेते हैं कि अब तो कुछ नहीं किया जा सकता। इन बच्चों की स्थिति में तो कोई भी सुधार संभव नहीं है। क्योंकि हमारे पास ऐसे सवालों के जवाब नहीं है। परीक्षा में जिन सवालों के जवाब नहीं आ रहे हैं, उसके बदले दूसरे सवाल हल कर लेने वाली रणनीति चल सकती है।

मगर ज़िंदगी के असली इम्तिहान में तो हर सवाल का जवाब देना होता है। शिक्षा का एक उद्देश्य इसी ‘बड़ी परीक्षा’ के लिए हर इंसान को तैयार करना है। मगर छोटी-छोटी परीक्षाओं के फेर में बाकी बड़ी परीक्षाएं औऱ बड़े उद्देश्य कहीं गुम से हो गये हैं। अभी तो बस पढ़ाई और परीक्षा का खेल जारी है। जो सीख गये। बहुत अच्छी बात है, जो नहीं सीखे….उनके लिए सोचने की जरूरत है? ऐसा लगता है कि यह सवाल तो अपने निर्माण की प्रक्रिया से ही गुजर रहा है।

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