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स्कूलों की बेहतरी के लिए जरूरी है ‘एकेडमिक लीडरशिप’

पाबुला, तितली, गरासिया भाषा, बहुभाषिकता, एजुकेशन मिरर, बच्चों की भाषा, घर की भाषाअगर किसी संस्थान को सही नेतृत्व न मिले तो उसके पतन की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। ऐसी ही स्थिति स्कूलों के संदर्भ में दिखाई देती है। यथास्थिति को बढ़ावा देने वाली मनोवृत्ति अपने चरम पर है। ऐसे में स्थितियों को बदलने के लिए कौन आगे आये? ये सवाल स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों की तरफ से उछाले जा रहे हैं। मगर उसकी चर्चा कहीं नहीं है।

एक स्कूल के शिक्षक बताते हैं, “जब यह स्कूल पांचवीं तक थी, यहां की स्थिति काफी अच्छी थी। बच्चे खुद से प्रार्थना का नेतृत्व करते थे। खेल में स्कूल आगे था। भोजन के दौरान सारे बच्चे व्यवस्थित ढंग से बैठते थे, मगर क्रमोन्नत होने के बाद पूरी स्थिति बदल गई। नये प्रधानाध्यापक नेतृत्व नहीं करना चाहते। ऐसे में स्कूल की हालत खस्ता है। मगर क्या करिये। अगर मैं कुछ करूं तो लोगों को ऐतराज होगा कि मैं लीडर बन रहा हूँ।”

एकेडमिक लीडरशिप की जरूरत

अच्छे शैक्षिक नेतृत्व (एकेडमिक लीडरशिप) के अभाव में स्कूलों के पिछड़ने वाली बात सही है। मगर इस बात को महत्व देने में अभी कई साल लगेंगे। इसकी जरूरत को कुछ राज्यों में सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया है, मगर इस विचार को ज़मीनी स्तर पर उतरने और नेतृत्व करने वाले लोगों की आम समझ का हिस्सा बनने में अभी लंबा समय लगेगा। अगर निष्क्रियता वाली स्थिति बनी रही तो यह लंबा समय एक दशक या उससे ज्यादा का भी हो सकता है।

क्योंकि आने वाले दिनों में निजीकरण बनाम सरकारी स्कूलों की यथास्थिति वाली मुद्दे पर बहस गरम हो सकती है। ऐसे में चीज़ों में बदलाव की रफ़्तार ठहरेगी, ऐसी किसी बात के होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।

स्कूल स्तर पर फैसलों की जरूरत

लीडरशिप वाले सवाल पर फिर से लौटते हैं। किसी भी स्कूल के प्रधानाध्यापक या एक्टिंग हेडमास्टर को इस बात की परमीशन होनी चाहिए कि वे स्कूल के हित में कुछ फैसले अपने स्तर पर ले सकें। उदाहरण के तौर पर अगर किसी स्कूल में कचरे के विस्तार के कारण जिस कमरे में बच्चे बैठते हैं उसमें गेहूँ की बोरियां रखने की नौबत आती है तो इस समस्या का समाधान प्रधानाध्यापक के स्तर पर किया जाना चाहिए। मगर बहुत ज्यादा नियमों की अधिकता भी व्यवस्था में जड़ता को बढ़ावा देती है।

बहुत से स्कूलों में कमरे केवल इसलिए नहीं बने, क्योंकि संबंधित शिक्षकों को लगता था कि स्कूल के लिए कमरे बनवाने में काफी परेशानी है। इसके लिए कौन ‘भेजामारी’ (दिमाग खपाए) करे। उनका कहना था कि अगर कोई अन्य संस्था इस काम को करवा सके तो करवा दिया जाये, अन्यथा कमरे की राशि को वापस से लिया जाये। कुछ जगहों पर जहां साहसी नेतृत्व मिला और कोई आगे आया वहां कमरे बने। जहाँ इसका अभाव था, वहां यथास्थिति बनी रही। यही बात शैक्षिक मामलों में भी लागू होती है।

बुनियाद पर भी हो नजर

अगर किसी प्रधानाध्यापक की नजर में बच्चों के शैक्षिक स्तर का विशेष महत्व नहीं है तो वे इसे ज्यादा तरजीह नहीं देते। इसके बजाय उनका ध्यान उन चीज़ों की तरफ होता है जिसके कारण स्कूल चर्चा में रहे और उसे पुरस्कार मिले। उदाहरण के तौर किसी स्कूल के सबसे अच्छे रिसोर्स को बड़ी कक्षाओं में लगाकर किसी स्कूल को लंबे समय में अच्छी सफलता की निरंतरता के लिए तैयार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में प्राथमिक कक्षाओं में अच्छे शिक्षकों को पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना। छोटी क्लासों में शिक्षकों का जाना सुनिश्चित करने की कोशिश प्रधानाध्यापक की तरफ से होनी चाहिए। यह सारी कोशिशें ‘एकेडमिक लीडरशिप’ वाले डोमेन में आती हैं, जिसका कमी स्कूलों में अक्सर महसूस होती है।

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