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सरकारी स्कूलों के खिलाफ हमला प्रायोजित है?

स्कूल जाते बच्चे।

स्कूल जाते बच्चे।

अंग्रेजी अख़बार द हिंदू में 26 मार्च 2016 को प्रकाशित एक आलेख ‘ए लेसन इन हिडेन एजेंडाज’ में भारत में प्राथमिक शिक्षा की वर्तमान स्थिति की सटीक समीक्षा की गई है।

इस आलेख के लेखक व शिक्षाविद् रोहित धनकर लिखते हैं, “शिक्षा का अधिकार कानून और सरकारी स्कूलों पर होने वाला हमला प्रायोजित है। निश्चित तौर पर यह भारत के उन बच्चों के हित में नहीं है, जो कम संपन्न तबकों से आते हैं।”

अपने इस आलेख में वे आगे लिखते हैं, ” सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था काफी लंबे समय से आलोचनाओं से घेरे में है। इसका चित्रण एक निष्क्रिय व अनावश्यक व्यवस्था के रूप में हो रहा है जिसमें सुधार की कोई गुंजाइश संभव नहीं है।” इस चित्रण के खतरे से सरकारी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षक भली-भांति परिचित हैं कहना मुश्किल है। वास्तव में वे समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकारी स्कूलों के साथ क्या हो रहा है? ऊपर से आने वाले आदेशों को वे ज्यों का त्यों लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।

शिक्षक से सामने क्या हालात हैं?

आज ही एक शिक्षक से इस मुद्दे पर बात हो रही थी तो उन्होंने कहा, हम 6 साल से कम उम्र वाले किसी बच्चे को स्कूल में एडमीशन से मना नहीं कर सकते। इसके लिए ऊपर से मौखिक निर्देश मिले हुए हैं। अगर आप किसी बच्चे को प्रवेश देने से मना करें तो ऊपर से फोन आ जायेगा, आपके खिलाफ कार्रवाई होगी कि आप बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर रहे हैं। अगर आगे मामला कोर्ट में जाता है तो समाज की नज़रों में हम दोषी होंगे। उन ग़लतियों के लिए जो हम करना ही नहीं चाहते थे।”

अपने आलेख में आगे रोहित धनकर लिखते हैं, “शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) बनाने का मकसद तो इस व्यवस्था को सुधारना था। इसलिए, यह स्वाभाविक है कि शिक्षा का अधिकार कानून भी उन लोगों की आलोचनाओं के केंद्र में होगा, जो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की लंबे समय से आलोचना करते रहे हैं।”

शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की जरूरत स्वीकार करते हुए वे आगे लिखते हैं, ” हालांकि शिक्षा की सार्वजनिक व्यवस्था और शिक्षा का अधिकार कानून में समस्याएं हैं ; उनका समाधान करने की जरूरत है; हमें एक रास्ता खोजने की जरूरत है ताकि सरकारी शिक्षा की व्यवस्था को बेहतर लर्निंग आउटकम के लिहाज से सक्रिय बनाया जा सके।”

शिक्षा के निजीकरण वाली लॉबी

शिक्षा के निजीकरण का सवाल उठाते हुए वे लिखते हैं, “मगर निजी स्कूलों, उनके समर्थकों और निजीकरण समर्थक लॉबी की तरफ से होने वाले हमले अनुचित हैं। स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए जो सुझाव आक्रामक ढंग से उछाले जा रहे हैं वे हमें एक दलदल में ढकेल देंगे।”

निजी व सरकारी स्कूलों पर हुए अध्ययन का हवाला देते हुए वे कहते हैं, “एक झूठ बार-बार बहुत जोर देकर दोहराया जा रहा है कि तथाकथित कम-लागत वाले निजी स्कूलों में अधिगम (लर्निंग) बेहतर है। इस तरह के कुछ अध्ययन हैं जो दावा करते हैं कि निजी स्कूल, सरकारी स्कूलों से बहुत बढ़िया प्रदर्शन कर रहे हैं; जबकि अन्य लोगों का दावा है कि बच्चों के पारिवारिक और सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले पहलू को समायोजित करने के बाद सामने आने वाले आँकड़ों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। इस पर लिखे एक आलेख में कहा गया कि इस बात को साबित करने के लिए बेहतर आँकड़ों की जरूरत है।”

इस आलेख को विस्तार से आप द हिंदू पर पढ़ सकते हैं। इस आलेख में उठे अन्य मुद्दों पर आगे की पोस्ट में चर्चा जारी रहेगी।

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