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‘भाषायी क्षमताओं का विकास विद्यालय की जिम्मेदारी है’

हिंदी भाषा के शिक्षाक्रम को समझना भाषा कालांश में काम करने में काफी मददगार साबित हो सकता है।  इसी सिलसिले में साल 1984 में मुद्रित राजस्थान के शिक्षाक्रम का प्रमुख अंश आपके लिए पेश है।


प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको अभिव्यक्त करना चाहता है। साथ ही वह दूसरे के विचारों को भी समझना चाहता है। इसके लिए सर्वाधिक प्रचलित और सशक्त माध्यम है- भाषा। भावी जीवन में बालक को अपने दिन-प्रतिदिन के कार्यों में भाषा का अत्यधिक प्रयोग करना पड़ेगा।

वह भाषा के समुचित प्रयोग द्वारा अपना कार्य सुचारु रूप से चला सके, इस बात के लिए उसे सक्षम बनाना शिक्षा का दायित्व है। साथ ही विद्यालय में छात्र, अन्य विषयों में जो कुछ सीखता है, भाषा के माध्यम से ही सीखता है। अतः भाषिक कुशलताओं की उपलब्धि उसकी सामान्य शैक्षिक उपलब्धि को भी प्रभावित करती है।

भाषायी कौशलों का विकास

विद्यालय में प्रवेश पाते समय बालक अपनी भाषा के मौखिक रूप से परिचित होता है। वह अपनी बात कह सकता है और दूसरों की बात सुनकर समझ सकता है किन्तु उसकी भाषिक योग्यता में कई कमियां होती हैं।

एक तो यह कि उसकी बातचीत में उसके घर की बोली का प्रभाव होता है। दूसरे, बालक का शब्द भण्डार सीमित होता है। तीसरे, यह विविध परिस्थितियों में अवसर के अनुकूल भाषा का प्रयोग नहीं कर पाता क्योंकि वह अभी भाषा का प्रयोग केवल घर और पास-पड़ोस की सीमित स्थितियों में ही करता रहा है।

फिर विद्यालय में प्रवेश लेते समय बालक भाषा के लिखित रूप से भी परिचित नहीं होता है। अत: विद्यालय का यह दायित्व है कि वह बालक को भाषा का मौखिक व लिखित प्रयोग कर सकने की दृष्टि से सक्षम करे। इसके लिए सुनना, बोलना, पढ़ना तथा लिखना इन चारों भाषिक कौशलों का विकास करना आवश्यक होता है।

कैसे हासिल होगा यह लक्ष्य?

अगर कोई विद्यालय शिक्षाक्रम की उपरोक्त बातों को ज़मीनी सच्चाई में तब्दील करना चाहता है तो उसे क्या-क्या करना होगा? शायद सबसे पहले स्कूल में लायब्रेरी को सुचारु रूप से संचालित करना होगा ताकि हर बच्चे को पढ़ने का भरपूर अवसर मिले। ऐसे अवसरों से बच्चों का पठन कौशल उन्नत होगा। वे कहानी की किताबों को पढ़ने के दौरान उन्नत होने वाले पठन कौशल का उपयोग पाठ्यक्रम की किताबों के अध्ययन में भी इस्तेमाल करेंगे। इस बारे में दो राय नहीं है। स्कूल में पढ़ने-लिखने का माहौल बनाने के लिए शिक्षकों को भी इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे पुस्तकालय के महत्व को भाषायी कौशलों के विकास से जोड़कर देंखें।

मगर उपरोक्त माहौल की बुनियाद तो पूर्व-प्राथमिक और प्राथमिक कक्षाओं के भाषा कालांश में बनती है। इसलिए उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। यानि भाषा कालांश में बच्चों को अपना शब्द भण्डार विकसित करने और भाषा के इस्तेमाल का अधिक से अधिक अवसर मिलना चाहिए। पढ़ने के कौशलों (डिकोडिंग व समझने) की तैयारी के ऊपर अच्छा ध्यान देकर विद्यालय इस लक्ष्य को सुगमता से हासिल कर सकते हैं। डिकोडिंग और समझने वाले पहलू पर हमने पिछली पोस्ट में विस्तार से चर्चा की है, जिसे आप दोबारा पढ़ सकते हैं।

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