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दिल्ली में शिक्षक की हत्याः छात्र-शिक्षक रिश्तों में तनाव क्यों है?

आदर्श शिक्षक, शिक्षक प्रशिक्षण, भारत में शिक्षक प्रशिक्षणआमतौर पर एक शिक्षक अपने बच्चों से प्यार करता है। उनके भविष्य की परवाह करता है। उनके बारे में दिन-रात सोचता है। घर पर कड़ी मेहनत करता है ताकि स्कूल में बच्चों को अच्छे से पढ़ा पाए, उनके सवालों के जवाब दे पाए।

एक शिक्षक अपने विद्यालय में शिक्षण कार्य के अतिरिक्त ढेर सारे प्रशासनिक काम भी करता है। जैसे परीक्षाओं का आयोजन, परीक्षा की कॉपियों का मूल्यांकन करना, पास-फेल घोषित करना, कम उपस्थिति होने पर नाम काटना या फिर परीक्षा में बैठने से मना करना।

छात्र-शिक्षक रिश्तों में तनाव

इस पूरी प्रक्रिया में कभी-कभी शिक्षक-छात्र आमने-सामने आ जाते हैं। यह बात 10वीं-12वीं में तो होती ही है, कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर पर भी छात्र-शिक्षक रिश्तों के बीच उपरोक्त कारणों से तनाव वाली परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। छात्रों के मन में इस बात को लेकर आक्रोश होता है कि मुझे परीक्षा में क्यों नहीं बैठने दिया गया? अगर मैंने परीक्षा नहीं दी तो मेरा भविष्य बरबाद हो जाएगा

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नांगलोई के सुल्तानपुरी रोड स्थित राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक मुकेश शर्मा की हत्या के विरोध में प्रदर्शन करते शिक्षक। यह तस्वीर ट्विटर पर अंजुला जी ने शेयर की थी।

कई बार फेल होने वाले छात्रों के मन में कुछ अलग तरह के सवाल भी आते हैं। बहुत हद तक संभव है कि बहुत से छात्रों को अपने सवालों के जवाब न मिलते हों। ऐसे में वे अपना तनाव, गुस्सा और नाराजगी शिक्षकों के ऊपर जाहिर करते हैं।

दिल्ली के नांगलोई में सुल्तानपुरी रोड स्थित राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक मुकेश शर्मा की दर्दनाक हत्या बेहद अफसोसजनक है।

एक समाज के लिए यह खतरे की घंटी है, जिसकी आवाज़ पर उसे अपने कान देने चाहिए। एक समाज जो शिक्षकों के लिए महफूज न हो, उसे किसी भी नज़रिए से ‘स्वस्थ समाज’ नहीं कहा जा सकता है।

हमारे देश और समाज से शिक्षकों के काम और पेशे की कद्र सदैव से रही है। मगर बीते कुछ सालों में शिक्षक की भूमिका पर कैंची चलाने की कोशिश हो रही है, शिक्षकों से बार-बार कहा जा रहा है कि आप शिक्षक नहीं है, आप केवल सुगमकर्ता हैं। बच्चे ज्ञान का निर्माता हैं, इस बात से मेरा विरोध नहीं है। मगर शिक्षक भी इंसान के निर्माण में एक महत्वपूर्ण सृजनात्मक भूमिका निभाते हैं, इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता है।

ऐसे माहौल से निराश हैं शिक्षक

अगर एक शिक्षक समाज में और स्कूल में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है तो फिर वह क्या करेगा? क्या वह पूरे हक़ से बच्चों के साथ संवाद कर पाएगा? क्या वह अगली बार किसी बच्चे को परीक्षा में बैठने से मना करेगा? वह किसी बच्चे को फेल करने की तोहमत अपने सर क्यों लेना चाहेगा? ऐसी परिस्थिति में कोई शिक्षक ही क्यों बनना चाहेगा? जहाँ न पेशे का सम्मान है, न जीवन सुरक्षित है और न काम करने की बुनियादी स्वतंत्रता है।

कृष्णमूर्ति का शिक्षा दर्शन, जे कृष्णमूर्ति के विचारहमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि हमने पूरे शिक्षक समुदाय के बारे में एक राय बना ली है कि वे सोचने-समझने की क्षमता से वंचित है। वे सही-गलत का फैसला नहीं ले सकते। नीति-निर्माताओं को लगता है कि वे ही स्कूलों, शिक्षा और बच्चों के भविष्य को सही दिशा देने वाले विचार पैदा कर सकते हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले शिक्षकों के मन में तो विचार आते ही नहीं है। वे तो ‘विचार शून्य’ हो गए हैं।

बाकी की रही सही कसर पासबुक पूरी कर देती है। कोचिंग सेंटर भी इस काम में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पासबुक और कोचिंग दोनों करोड़ों का कारोबार हैं। इनके बारे में कोई नियम कानून बनाने में नीति-निर्माताओं को पसीने आते हैं।

क्या हैं विकल्प?

अगर कोई छात्र नियमित स्कूल नहीं आता है तो उसको नियमित से प्रायवेट वाले मोड में शिफ्ट कर दिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया को भी ऑनलाइन किया जा सकता है। अगर कोई छात्र दो से ज्यादा बार फेल होता है तो उसे कांउसिलिंग की सुविधा देनी चाहिए। शिक्षकों को ऐसी परिस्थिति में बच्चों से बातचीत करनी चाहिए ताकि बच्चों में फिर से पढ़ाई के लिए रुचि पैदा की जा सके।

अगर किसी स्कूल में किसी बच्चे का व्यवहार अन्य बच्चों और शिक्षक के प्रति हिंसक है या आपराधिक प्रवृत्ति का है तो उस पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे में बच्चे के परिवार के सदस्यों को भी पूरे मामले से अवगत कराना चाहिए।

मगर यह सारी चीज़ें एक ऐसे माहौल में ही संभव हैं जो शिक्षक और बच्चे दोनों के लिए महफूज हों। वर्तमान का सबसे बड़ा संकट यही है कि इस ‘सुरक्षित माहौल’ में ही शिक्षक की हत्या हो रही है। ऐसे में भला कोई शिक्षक पढ़ाने वाले काम के प्रति अपने समर्पण को कैसे बनाकर रख पाएगा?

शिक्षकों के काम को महत्व देते हैं विकसित देश

अगर शिक्षक खानापूर्ति पर उतर आए तो आप क्या कर लेंगे? शिक्षक कह देंगे कि हम तो पढ़ा रहे हैं। बच्चे नहीं सीख रहे हैं तो हम क्या करें? आप अभिभावक हैं, आप घर पर ध्यान दीजिए। आप अधिकारी हैं रोज़ाना स्कूल विज़िट करिए और देखिए कि हम क्या कर रहे हैं? आप विषय विशेषज्ञ हैं आप का भी स्कूल में स्वागत है आइए और हमारी क्लास में बैठकर देखिए कि हम बच्चों को कैसे पढ़ा रहे हैं, अपने सुझाव सरकार को दीजिए। नीति-निर्माताओं को भी इस परिस्थिति से अवगत कराइए ताकि आपके नज़रिए से होने वाले ‘ शैक्षिक सुधारों’ को गति मिल सके।

education-mirrorशिक्षा, कोई ठेकेदारी का काम नहीं है, विकसित देश में लोग इस बात को समझते हैं। वहां शिक्षकों को सबसे ज्यादा वेतन और सम्मान मिलता है क्योंकि वे शिक्षकों की भूमिका को सूक्ष्मता से समझते हैं। वे उनके योगदान को कम करके नहीं देखते, जैसा कि हमारे यहां होता है।

दुनिया के अनेक विकसित देशों में अभिभावक और नीति-निर्माता शिक्षकों के साथ संवाद करते हैं, उनकी राय को अहमियत देते हैं। स्कूल में बच्चों व शिक्षकों के खिलाफ होने वाली हिंसा को गंभीरता से लेते हैं। उसके ऊपर विभिन्न सामाजिक मंचों पर चर्चा होती है कि ऐसी स्थितियों को सुधारने और बेहतर बनाने के लिए क्या संभव क़दम उठाए जा सकते हैं।

सिर्फ नौकरी का जरिया नहीं है शिक्षा

हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी है कि हम शिक्षा को नौकरी का जरिया मान बैठे हैं। अगर कोई बच्चा फेल हो जाता है तो पूरा समाज उसके ऊपर दबाव बनाता है कि तुम्हारा तो भविष्य चौपट हो गया। अब तुम ज़िंदगी में कुछ नहीं कर पाओगे। वहीं दूसरी तरफ समाज में शिक्षकों के काम को उसको मिलने वाले वेतन व सामाजिक सम्मान के तराजू पर तौलकर देखते हैं।

दिल्ली सरकार में शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया ने एक ग़ौर करने वाली बात कही, “हमारी सरकार शिक्षकों का सम्मान करती है और मानती है कि शिक्षक का योगदान भी सीमा पर खड़े सिपाही जैसा ही महान है।”

अहा ज़िंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव सितंबर माह के संपादकीय में लिखते हैं, “शिक्षा के उद्देश्य के रूप में लगातार आजीविका पर ग़ैर-जरूरी बल दिया जा रहा है, इसका परिणाम यह हुआ है कि शिक्षा से मूल्य और मनुष्यता का विलोप हुआ है। जबकि यह बहुत बड़ा सच है कि शिक्षा का रोजगार से वैसा प्रत्यक्ष संबंध हो ही नहीं सकता, क्योंकि जब अर्थव्यवस्था रोजगार न उत्पन्न कर सके तो आजीविका के लिए शिक्षित होने मात्र से रोजगार कैसे मिल जाएगा? यानि यह मसला ऐसा है कि समस्या की जड़ कहीं है, इलाज कहीं किया जा रहा है।”

शिक्षकों के दुःख-दर्द में साझीदार बनें

दरअसल पूरे समाज में सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों को ‘विलेन’ की तरह पेश करने का एक अघोषित अभियान सा चल रहा है। जिसमें जाने-अंजाने हम लोग भी शामिल हो जाते हैं।हम आँख मूंदकर उनकी आलोचना वाले पोस्ट लाइक करते हैं, शेयर करते हैं, उस पर कमेंट करते हैं, उसको सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बनाते हैं। जबकि गंभीर काम करने वाले शिक्षकों की मेहनत और तैयारी की तरफ ध्यान देने की जहमत भी नहीं उठाते।

हमें एक संवेदनशील इंसान के रूप में शिक्षकों के साथ समानुभूति रखनी चाहिए। उनके दुःख, दर्द व तकलीफ में साझेदार होना चाहिए क्योंकि वे जो योगदान समाज के लिए दे रहे हैं, उसे सिर्फ पैसे से नहीं तौला जा सकता है।

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