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एजुकेशन मिरर के फेसबुक पेज पर क्या लिखा गया?

भारत में शिक्षा का अधिकार क़ानून एक अप्रैल 2010 से लागू किया गया।

एजुकेशन मिरर का फेसबुक पेज़ पाठकों के साथ संवाद कायम करने का अच्छा जरिया है। इस साल फे़सबुक लाइक्स ने पहले 500 फिर 600 का सफर पूरा किया। दोस्तों के जुड़ने का सिलसिला सतत जारी है। यह पोस्ट लिखे जाने तक फेसबुक पेज़ से जुड़ने वाले दोस्तों की संख्या 671 है।

ये दोस्त शिक्षा के क्षेत्र में गहरी रुचि रखते हैं। इससे जुड़े मुद्दों पर पढ़ना, लिखना, विचार-विमर्श करना पसंद करते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है ऐसे लोगों को साथ लाने में इस पेज़ की अच्छी भूमिका होगी। इस पोस्ट में पढ़िए एजुकेशन मिरर के फेसबुक पेज़ पर प्रकाशित कुछ पोस्ट्स।

भारत में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है। बच्चों के अधिगम का स्तर कक्षा के अनुरूप हो, यह स्थिति अभी नहीं बन पा रही है। आठ करोड़ से ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं। यानि बेहतरी और बदलाव का सफर बहुत लंबा है।

एजुकेशन मिरर के फेसबुक पेज़ पर एक पोस्ट लिखी, “आने वाले समय में ऐसा भी हो सकता है कि सरकारी स्कूलों में नर्सरी से पढ़ाई शुरू हो जाए ताकि ‘स्कूल रेडिनेस’ वाले मुद्दे पर अच्छा काम हो। इसका उद्देश्य बिल्कुल साफ होगा कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों के अधिगम स्तर में अपेक्षित सुधार हो सके।”

हर बच्चे का सीखना सुनिश्चित हो। इस पर भी एक अपडेट थी, “बेहतर स्कूली शिक्षा के मूल में एक विचार है कि कोई भी बच्चा सीखने के मामले में पीछे नहीं छूटना चाहिए। यानि किसी भी स्कूल में पहली से आठवीं तक के सभी बच्चों के ऊपर ध्यान दिया जाना चाहिए।”

ताकि पूरे स्कूल का रिजल्ट बेहतर हो। पूरे स्कूल का अधिगम स्तर (लर्निंग लेवल) बेहतर हो। केवल भाषा ही नहीं। बल्कि गणित और अंग्रेजी में भी। विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में भी। कला और संगीत और संगीत में भी।

साल 2016 की पॉपुलर फेसबुक अपडेट

जब शिक्षकों की तरफ से बात आती कि हमें बच्चों के सीखने की परवाह है। इसके लिए हम नए तरीके आजमाने और चीज़ों को बदलने के लिए तैयार हैं तो मन खुश हो जाता है।

एक दिन क्लास में इस बात के ऊपर चर्चा हो रही थी कि मरने के पहले कौन सी तीन चीज़ें हैं जो आप करना चाहते हैं। इस चर्चा में अपनी बात रखते हुए एक बच्चे ने कहा, “मैं किसी से प्रेम करना चाहता हूँ।”

‘यथास्थिति से प्रेम’

शिक्षा में बदलाव की राह में सबसे बड़ी बाधा ‘यथास्थिति से प्रेम’ है।

हम पुराने तरीकों, नियमों और जड़ों से जब जोंक की तरह चिपक जाते हैं तो स्थिति ऐसी हो जाती है कि जिन जड़ों को हमें पोषित करना चाहिए, हम उसी से रक्त चूस रहे होते हैं।

यह अहसास हमें आमूल चूल बदलाव की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करे, इसलिए ऐसे विचारों पर भी ग़ौर करना जरूरी है।

उदाहरण के लिए, “निजी स्कूलों में क से कबूतर और ख से खरगोश वाली विधि से शिक्षण जारी है।” यानि भाषा शिक्षण के नए तरीकों को आजमाने और क्रियान्वित करने पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है।

किसी से होने वाली बातचीत को कैसे लिखें?

यह सवाल कई बार हमारे मन में होता है। इस सवाल का एक छोटा सा जवाब। जब हम किसी से बात करते हैं तो कोशिश करनी चाहिए कि जवाब को ज्यों का त्यों रखें। शब्द उनके हों ब्रेकेटे में। जैसे B, “A.” ताकि पता चल सके कि B ने A वाली बात कही है। बाद बाकी भाषा को बेहतर बनाया जा सकता है, मगर किसी के कथन को ज्यों का त्यों रखकर। किसी बातचीत को रिकॉर्ड करना या तत्काल लिख लेना भी एक अच्छा विकल्प होता है।

फेसबुक पेज़ पर एक अपडेट थी, “कल एक गाँव में गया था। 12वीं तक का स्कूल है, जहाँ केवल एक शिक्षक हैं। वह भी खेल वाले। लौटते समय वे स्कूल का ताला बंद कर रहे थे। शिक्षा क्षेत्र में ऐसे स्कूलों की मौजूदगी देश की किश्मत बदल देगी। यकीन हो रहा है थोड़ा-थोड़ा। भविष्य में ऐसे स्कूलों की कहानियं पढ़ने के लिए तैयार रहिए। जिसे पढ़कर आप दातों तले अंगुली दबाने की बजाय काट भी सकते हैं कि अरे! अपने देश में ऐसा भी होता है भला। बड़ा पइसा खर्च हो रहा है विज्ञापन के लिए। नीति बदलने के लिए। आँखों देखी तो बदल नहीं पा रहे हैं जाने कौन से बदलाव की रूपरेखा बना रहे हैं।”

सरकार के अभियान में विश्वविद्यालय के छात्रों क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने फेसबुक पर लिखा, “आजादी के बाद ऐसा पहली बार। महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के छात्रों को सरकार के कैशलेस इकोनॉमी कैम्पेन में लगाने का विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है। जिस मुद्दे पर देश में आम सहमति नहीं और जिस सरकारी फैसले की व्यावहारिकता को लेकर शासन की आलोचना हो रही है, उसमें छात्रों को जबरन कैसे झोंका जा सकता है? इस कैम्पेन में शामिल होने के लिये छात्रों को अतिरिक्त क्रेडिट मिलेंगे। क्या यह विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को रौंदने जैसा नहीं है?”

सुझाव आमंत्रित हैं

एजुकेशन मिरर पर अर्ली लिट्रेसी के क्षेत्र में काम करने वाले दोस्तों की कहानियां ‘लिट्रेसी हीरोज़’ नाम की एक सीरीज़ में प्रकाशित की जाएं। ताकि हम जान सकें कि विभिन्न राज्यों में भाषा के कालांश में कैसे काम होता है, वहां की क्या चुनौतियां हैं और उनका समाधान कैसे किया जा रहा है? यह विचार काफी दिनों से मन में था, मगर आपसे साझा अभी कर रहा हूँ। इस बहाने आपका कुछ नए दोस्तों से परिचय भी हो जाएगा, जो शिक्षा के क्षेत्र में धमाकेदार काम कर रहे हैं। इस विषय आपके सुझाव आमंत्रित है।

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यह तस्वीर अभिषेक ने खींची है। इस छात्रा की मुस्कुराहट सहज ही हमारा ध्यान खींच लेती है।

साल 2017 में आपका परिचय शिक्षा के क्षेत्र में रुचि लेने वाले और लिखने वाले नए युवा साथियों से होगा। इनमें से एक नाम अभिषेक पाण्डेय का भी होगा। उनको बच्चों से बहुत लगाव है। उन्होंने एजुकेशन मिरर के लिए लिखने की बात कही है। वे बहुत अच्छी तस्वीरें खींचते हैं। शिक्षा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सतत लिखते हैं।

मिशाल के तौर पर, “बिहार सरकार को नियोजित शिक्षकों की ऐसी फ़ौज मिली है जो विद्यालयों में वेतन पर नहीं बल्कि तोहफों और उपहारों के बदले शिक्षा की पतवार संभाल रही है. चुपचाप, शांतचित और स्वार्थ रहित..भले इसकी कीमत इन सबको राशन-किराशन वालों की झिड़कियां और फब्तियां सुनकर चुकानी पड़ रहीं है..उपहार भी उधार रह जाता है परन्तु शिक्षा बाँटने में कोई शिक्षक उधार नहीं लगाएगा. असंतोष है, पर श्रद्धा भारी पड़ रही है. बिहार सरकार को खुश होना चाहिये….”

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