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शिक्षा विमर्शः ‘जो बात क्लासरूम तक पहुंच जाए, वही सफल है’

Thane-Municipal-Corporation-schoolशिक्षा के क्षेत्र में किसी भी विचार या सिद्धांत की एक ही कसौटी हो सकती है वह है उसका क्लासरूम तक पहुंचना और बच्चों के जीवन का हिस्सा बन जाना। बच्चों के अधिगम स्तर को बढ़ाना।

उनमें सीखने के प्रति ललक  को बढ़ाना। किताबों से प्रेम पैदा करना ताकि बच्चे भविष्य में अच्छे पाठक बन सकें।  इसके साथ ही बच्चे और शिक्षक के बीच डरने की बजाय सवाल करने वाले रिश्ते का अंकुरित होना ताकि एक नए समाज के निर्माण की बुनियाद रखी जा सके।

प्रेरणा का स्तर ‘मानइस’ में क्यों है?

आज के दौर में जब इंटरनेट पर लाखों शब्दों के बड़े-बड़े उपयोगी और सार्थक शोध उपलब्ध हैं। न जाने कितने वीडियोज़ उपलब्ध हैं। हमारे देश के बहुत से स्कूल बुनियादी सुविधाओं को मोहताज हैं। बहुत से बच्चे शिक्षकों के क्लास में आने की राह देख रहे हैं। न जाने कितने शिक्षकों के प्रेरणा का स्तर अपने ‘माइनस’ में है, यानि शून्य से भी नीचे। ऐसी स्थिति में शिक्षक साथी अपने बीते दिनों की ढाल का इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे ही एक शिक्षक साथी कहते हैं, “हमारे समय में तो आठ-नौ साल के बच्चे स्कूल आते थे। उनको पढ़ाना-सिखाना आसान था। आज तो 5-6 साल के लड़के-लड़कियां स्कूल चले आते हैं, भला इनको क्या सिखाया जाए। अगर किसी बच्चे को ‘क’ लिखना सिखा भी दिया तो वह तीन दिन तक गेहूं की फ़सल की कटाई में जाने के बाद वह भी भूलकर आता है। उसे फिर नए सिरे से सिखाना पड़ता है।“

जहाँ अभिभावकों की ‘पढ़ाई’ होती है

शिक्षक साथियों की ऐसी बातें सुनकर लगता है कि हम अतीत के ‘मुर्दा विचारों’ की ऐसी कब्र में बैठे हैं, जहाँ ठहरना मुश्किल हैं। वहां से बाहर आना ही पड़ेगा ताकि हम खुली हवा में सांस ले सकें। जीवन को वर्तमान की सच्चाइयों का आँख खोलकर सामना करने के लिए तत्पर होने दें। उसे तूफ़ान से डरे हुए शुतुरमुर्ग सा न बना दें, जो तूफ़ान आने पर अपना सिर बालू में छिपा लेता है।

भारत में शिक्षा, वास्तविक स्थिति, असली सवाल, समस्या और समाधान

निजी स्कूल में पढ़ने के लिए जाती एक बच्ची और परिवार के साथ कूड़ा बीननने वाले बच्चे

सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक साथी अपने अनुभवों की दास्तां कुछ यों सुनाते हैं, “हमारे पड़ोस में पाँच-छह बच्चे कॉन्वेंट में पढ़ने जाते हैं। असल में कॉन्वेंट में बच्चे नहीं अभिभावकों की पढ़ाई होती है। वे सुबह-सुबह उठ जाते हैं। बच्चों को तैयार कराते हैं। उनको नहलाते हैं। जब नहाते समय बच्चे रोते हैं तो मेरी नींद ख़राब हो जाती है। जब शाम को 4-5 साल के बच्चे घर आते हैं तो मम्मी-पापा में से ही कोई उनका होमवर्क पूरा करता है। तो बताइए भला पढ़ाई किसकी हो रही है, इतने छोटे बच्चे भला क्या होमवर्क करेंगे। क्या पढ़ेंगे-लिखेंगे।“

पढ़ाई का ‘बोझ’ कहीं भारी न हो जाए

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एक सरकारी स्कूल में एनसीईआरटी की रीडिंग सेल द्वारा छापी गयी किताबें पढ़ते बच्चे।

आपके स्कूल में बच्चे किताब पढ़ना जानते हैं? इस सवाल के जवाब में शिक्षक साथी कहते हैं, “तीसरी-चौथी के बाद थोड़ा-थोड़ा पढ़ना सीख पाते हैं। एक छोटे  बच्चे को हम क्या-क्या सिखा सकते हैं? उसके सीखने की क्षमता और ग्रहण करने की क्षमता भी तो कम होती है। उसे हिंदी पढ़ाएं, गणित पढ़ाएं और अंग्रेजी भी पढ़ाएं तो भला इतना सारा बोझ वह कैसे झेल पाएगा?”

ऐसे मासूम बहानों को सुनकर लगता है कि हम 21वीं सदी के किसी ऐसे ‘समय काल’ में ठहरे हैं जो 19वीं शताब्दी की गिरफ़्त में क़ैद है, बस वहां से बाहरी दुनिया की झलक दिखाई भर पड़ती है, उसे आप छूने की हिमाकत भी नहीं कर सकते।

स्कूल के पास में गोबर के उपलों के बड़े-बड़े ढेर आपका ध्यान खींचते हैं। निजी स्कूल से लौटते बच्चों की कतारें भी दिखाई देती हैं। मगर सरकारी स्कूल में सन्नाटा पसरा है, क्योंकि बच्चों की परीक्षाएं हो गई हैं। परीक्षाओं के बाद कौन अपने बच्चों को स्कूल भेजता है, बच्चे भी जानते हैं कि स्कूल में कुछ होना-जाना नहीं है, इसलिए वे स्कूल नहीं आते। ये सारे तर्क एक विद्वान शिक्षक साथी के हैं। जिनकी उम्र पचास के पार है और संभवतः अनुभव में उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को अपने कई दशक दान में दिए हैं।

आखिर में एक सुकून की बात

ये सारे अनुभव आपसे इसलिए साझा हैं ताकि ज़मीनी सच्चाइयों की कुछ तपिश आप तक भी पहुंचे, अप्रैल वाली गरमी के चर्चे तो सब जगह हैं। मगर यह सन्नाटा और लूह जो शिक्षा क्षेत्र के आँगन में बेखौफ़ बह रही है, उससे हम अनजान हैं और ‘हिंदी मीडियम’ फ़िल्म का ट्रेलर देखकर दिल को तसल्ली दे रहे हैं कि बड़ी अच्छी फ़िल्म है। कब रिलीज़ हो रही है। पड़ोस के हॉल में लगे तो एक दिन का अच्छा इंतज़ाम हो फिर अगली फ़िल्म का इंतज़ार होगा।

रियल लाइफ़ वाली फ़िल्मों की बोरियत से निजात पाने का भला इससे अच्छा जुगाड़ और क्या हो सकता है कि कोई हमारे मनोरंजन का ठेका ले ले और हमें अपने बारे में सोचने की जहमत उठाने से भी मुक्त कर दें। बच्चों की वर्दी (स्कूल ड्रेस) बदल रही है। इस ख़बर से शिक्षकों के चेहरे पर थोड़ी रौनक नज़र आई। ऐसा लगा जैसे वर्दी नहीं, पूरा कलेवर बदल रहा हो। शेष फिर। अगली पोस्ट में।

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